नई दिल्ली। महानगरों में पढ़ाई और रोजगार की तलाश में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचने वाले हजारों युवा पेइंग गेस्ट (PG), निजी हॉस्टल और किराये के कमरों में रहते हैं। उनके लिए यह आवास महज रहने की जगह नहीं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने का एक पड़ाव होता है। लेकिन क्या ये कमरे और इनके ऊपर बनी छतें वास्तव में सुरक्षित हैं? दिल्ली के सत्य निकेतन में सात सितंबर को छात्र-आवासीय इमारत ढहने की घटना ने इस सवाल को एक बार फिर गंभीर बना दिया है। हादसे में सात लोगों की मौत हुई, जबकि 12 लोगों को मलबे से सुरक्षित बाहर निकाला गया। बताया गया कि इमारत काफी पुरानी थी और उसके निचले हिस्से में निर्माण संबंधी काम चल रहा था। घटना के बाद नगर निकाय के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और भवन स्वामी परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन सवाल केवल गिरफ्तारी और कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए।
छात्रावासों की कमी ने बढ़ाया निजी आवास का बाजार
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, कोटा समेत देश के कई बड़े शहरों में शिक्षा और रोजगार के लिए आने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकारी और विश्वविद्यालयों के छात्रावास सीमित हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में छात्रों के लिए निजी कमरे, PG और हॉस्टल ही सबसे आसान विकल्प बन जाते हैं। समस्या निजी छात्र-आवास के होने में नहीं है। असली समस्या तब शुरू होती है, जब कमाई का लालच सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे। एक भवन में अधिक से अधिक कमरे तैयार किए जाते हैं। कमरों में जरूरत से ज्यादा बेड लगाए जाते हैं और हर अतिरिक्त बेड से किराये की आय बढ़ाने की कोशिश होती है। धीरे-धीरे रहने की जगह इंसान की जरूरत के बजाय कमाई का जरिया बन जाती है।
छात्र कमरे की सुविधा देखता है, सुरक्षा नहीं
घर से दूर रहने वाला छात्र स्वाभाविक रूप से ऐसा कमरा तलाशता है जो कॉलेज या कोचिंग संस्थान के नजदीक हो, किराया बजट में हो और वहां भोजन, बिजली-पानी जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों। अक्सर कमरे की साफ-सफाई और सुविधाएं देखकर ही आवास तय कर लिया जाता है। लेकिन क्या छात्र यह जांच पाता है कि भवन में कितनी मंजिलों की अनुमति है? उसकी क्षमता कितनी है? अग्निशमन व्यवस्था कैसी है? आपात स्थिति में बाहर निकलने का रास्ता कहां है? विद्युत भार भवन की क्षमता के अनुरूप है या नहीं? और सबसे अहम, भवन की संरचनात्मक मजबूती की आखिरी जांच कब हुई थी? अधिकांश मामलों में इन सवालों के जवाब छात्र को पता ही नहीं होते। इसलिए छात्र-आवास का चुनाव केवल कमरे का चुनाव नहीं होना चाहिए। यह जीवन और सुरक्षा से जुड़ा फैसला है।
संकरी गलियां और अव्यवस्थित निर्माण बढ़ाते हैं खतरा
कई महानगरों में छात्र-आवास घनी आबादी वाले इलाकों में संचालित होते हैं। संकरी गलियां, आसपास बने हुए भवन, बिजली के तारों का जाल और सड़कों पर वाहनों का दबाव आपात स्थिति में मुश्किल पैदा कर सकता है। ऐसे स्थानों पर आग लगने, भूकंप आने या भवन का कोई हिस्सा गिरने जैसी घटना होने पर राहत और बचाव कार्य भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सबसे ज्यादा चिंता उन भवनों को लेकर है जिनका मूल इस्तेमाल कुछ और था, लेकिन बाद में उन्हें बड़ी संख्या में छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। कहीं नीचे दुकान या भोजनालय और ऊपर कमरों की भरमार दिखाई देती है। भवन की मूल संरचना वही रहती है, लेकिन उसमें रहने वालों की संख्या और उस पर पड़ने वाला भार काफी बढ़ जाता है।
विद्युत व्यवस्था की भी हो नियमित जांच
छात्र-आवासों में एक साथ बड़ी संख्या में विद्युत उपकरणों का इस्तेमाल होता है। पंखे, कूलर, एसी, गीजर, इलेक्ट्रिक कुकर और दूसरे उपकरण भवन की विद्युत व्यवस्था पर अतिरिक्त भार डाल सकते हैं। यदि वायरिंग पुरानी हो या विद्युत भार क्षमता के अनुरूप न हो तो शॉर्ट सर्किट और आग जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए भवन की संरचनात्मक मजबूती के साथ-साथ विद्युत और अग्नि सुरक्षा की नियमित जांच भी जरूरी है।
सवाल भवन मालिक के साथ प्रशासन से भी
किसी हादसे के बाद भवन मालिक पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जिम्मेदारी केवल उसकी नहीं होनी चाहिए। सवाल यह भी है कि निर्माण की अनुमति देने वाली व्यवस्था कहां थी? भवन की समय-समय पर जांच क्यों नहीं हुई? अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र की स्थिति क्या थी? विद्युत सुरक्षा की जांच कब की गई? यदि किसी भवन में लंबे समय से नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो उसकी जानकारी प्रशासन को पहले क्यों नहीं हुई?
दुर्घटना के बाद जांच करना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है दुर्घटना से पहले खतरे को पहचान लेना।
केवल भवन तोड़ना समाधान नहीं
किसी हादसे के बाद अवैध या खतरनाक भवनों को सील करना या गिराना तत्काल कार्रवाई हो सकती है, लेकिन इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें खतरनाक भवनों की पहचान हादसे से पहले हो और उनमें रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके। इसके लिए प्रत्येक छात्र-आवास का अनिवार्य पंजीकरण किया जाना चाहिए। भवन के बाहर एक ऐसा क्यूआर कोड या सूचना-पट्ट लगाया जा सकता है, जिसे स्कैन करके छात्र भवन से जुड़ी जरूरी जानकारी हासिल कर सकें। इसमें भवन की स्वीकृत मंजिलें, अधिकतम रहने की क्षमता, अग्नि सुरक्षा की स्थिति, विद्युत सुरक्षा, अंतिम संरचनात्मक जांच और पंजीकरण की वैधता जैसी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
छात्र-आवास की सुरक्षा भी सार्वजनिक जानकारी बने
जिस तरह किसी रेस्तरां या होटल की कई जरूरी जानकारियां सार्वजनिक होती हैं, उसी तरह छात्र-आवास की सुरक्षा स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए। छात्र को केवल यह नहीं पता होना चाहिए कि कमरे का किराया कितना है। उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि जिस भवन में वह रहने जा रहा है, वह सुरक्षा मानकों पर कितना खरा उतरता है।
सरकारी छात्रावासों की संख्या बढ़ाना जरूरी
निजी छात्र-आवासों पर बढ़ते दबाव का एक बड़ा कारण सरकारी और संस्थागत छात्रावासों की कमी है। सरकार, विश्वविद्यालयों, नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों को सुरक्षित और किफायती छात्रावासों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। यदि विद्यार्थियों को पर्याप्त और सुरक्षित विकल्प मिलेंगे तो वे मजबूरी में असुरक्षित भवनों में रहने के लिए विवश नहीं होंगे।
छात्रों के लिए दुर्घटना बीमा की व्यवस्था हो
प्रत्येक पंजीकृत छात्र-आवास में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए दुर्घटना बीमा की व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसका खर्च किराये में शामिल किया जा सकता है। किसी दुर्घटना की स्थिति में परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता मिल सकेगी और उसे मुआवजे के लिए लंबे समय तक सरकारी कार्यालयों या अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
किराया समझौते में तय हो सुरक्षा की जिम्मेदारी
किराये के समझौते में भवन की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। किसी छात्र को ऐसा अनुबंध स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें भवन मालिक अपनी मूल सुरक्षा जिम्मेदारी से बच जाए। किसी व्यक्ति को किराये पर कमरा देना केवल किराया लेने का अधिकार नहीं है। उसके साथ वहां रहने वाले व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
शिक्षण संस्थानों की भी हो जिम्मेदारी
जो विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान हजारों विद्यार्थियों को प्रवेश देते हैं, वे उनके आवास की समस्या से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते। कम से कम संस्थानों को अपने विद्यार्थियों के लिए प्रमाणित और सुरक्षित छात्र-आवासों की सूची उपलब्ध करानी चाहिए। इससे छात्रों और अभिभावकों को सुरक्षित विकल्प चुनने में मदद मिलेगी।
निरीक्षण हादसे के बाद नहीं, पहले होना चाहिए
सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बाद कुछ भवनों पर कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन असली सफलता तब होगी जब ऐसी स्थिति दोबारा पैदा ही न हो। महानगरों में पुराने भवनों, अत्यधिक भार वाले निर्माण, अवैध बदलाव और क्षमता से अधिक लोगों को ठहराने वाले छात्र-आवासों की नियमित जांच होनी चाहिए। जहां खतरा नजर आए, वहां समय रहते कार्रवाई की जानी चाहिए।
कमरे में सिर्फ किरायेदार नहीं, किसी परिवार के सपने रहते हैं
किसी माता-पिता के लिए छात्र-आवास का कमरा सिर्फ 10 या 15 हजार रुपये का किराया नहीं होता। उस कमरे में रखी किताबों के साथ परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। मेज पर रखा दीपक बच्चे के भविष्य की रोशनी का प्रतीक होता है और बिस्तर के पास रखा बैग घर से दूर संघर्ष कर रहे एक युवा के सपनों को समेटे होता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि कमरा कितना अच्छा है?
जिस छत के नीचे मेरा बच्चा रह रहा है, क्या वह छत सुरक्षित है?
सत्य निकेतन की घटना में हुई मौतें केवल प्रभावित परिवारों का व्यक्तिगत दुख नहीं हैं। वे महानगरों में तेजी से बढ़ते छात्र-आवास के उस मॉडल पर भी सवाल खड़े करती हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या और किराये का बाजार तो बढ़ता गया, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उसी गति से मजबूत नहीं हो सकी। छात्र देश का भविष्य हैं। उन्हें पढ़ाई के लिए घर से दूर भेजना किसी भी परिवार के लिए भरोसे और उम्मीद से जुड़ा फैसला होता है। इस भरोसे की रक्षा केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन, शिक्षण संस्थानों, भवन मालिकों और समाज की भी साझा जिम्मेदारी है। हमें ऐसे शहर नहीं चाहिए जहां युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर आएं, लेकिन हर रात उन्हें अपनी छत की सुरक्षा की चिंता सताती रहे।
डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक





















