BRICS Summit: राजधानी में हो रहा 18वां ब्रिक्स सम्मेलन सिर्फ कूटनीतिक लिहाज से ही अहम नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी इसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक सुस्ती और कारोबार को लेकर अनिश्चितता के बीच भारत के लिए ब्रिक्स का मंच नए व्यापारिक अवसर पैदा कर सकता है। आर्थिक मामलों के जानकार सुनील शाह और पंकज जैसवाल के मुताबिक, ब्रिक्स के बढ़ते दायरे का फायदा भारत को निर्यात, विदेशी निवेश और ऊर्जा जरूरतों के स्तर पर मिल सकता है। समूह में नए देशों के शामिल होने से भारत के सामने कारोबार के लिए संभावनाओं का दायरा भी पहले की तुलना में बड़ा हुआ है।
भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजार खुलने की उम्मीद
ब्रिक्स के विस्तार से भारतीय कारोबारियों को कई नए बाजारों तक पहुंच बनाने का मौका मिल सकता है। रूस, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और अफ्रीकी देशों में भारतीय उत्पादों और सेवाओं की मांग बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ से सीधे तौर पर ब्रिक्स भारत को राहत दिलाएगा, इसकी उम्मीद नहीं है। लेकिन अगर भारतीय कंपनियां ब्रिक्स के दूसरे देशों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाती हैं तो निर्यात के लिए किसी एक बड़े बाजार पर निर्भरता कम की जा सकती है।
डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं पर बढ़ेगा जोर
ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। खासकर रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार बढ़ने से भुगतान से जुड़ी कुछ मुश्किलों को कम किया जा सकता है। इसका फायदा कच्चे तेल जैसे रणनीतिक आयात में भी मिल सकता है। इसके साथ ही डिजिटल पेमेंट और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC के जरिए अलग-अलग देशों के बीच भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने पर भी जोर है।
खाड़ी देशों से निवेश की बढ़ सकती है रफ्तार
ब्रिक्स में सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों की मौजूदगी भारत के लिए निवेश के लिहाज से खास मायने रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों की कंपनियां भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं तलाश रही हैं। अगर इस दिशा में बड़े समझौते होते हैं तो भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है। इससे औद्योगिक गतिविधियों और रोजगार के अवसरों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
रूस, सऊदी और यूएई से मजबूत होगी ऊर्जा सुरक्षा
ऊर्जा के मोर्चे पर भी ब्रिक्स भारत के लिए काफी अहम है। समूह में रूस, सऊदी अरब और यूएई जैसे बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं। इन देशों के साथ बेहतर रिश्ते भारत को भविष्य में अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ज्यादा विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं। भारत दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आयातकों में शामिल है। ऐसे में तेल और गैस की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। ब्रिक्स का मंच इस क्षेत्र में लंबे समय की साझेदारी मजबूत करने का अवसर दे सकता है।
क्या ब्रिक्स की अपनी करेंसी आएगी?
ब्रिक्स की अपनी साझा मुद्रा को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल इसके जल्द अस्तित्व में आने की संभावना कम है। इस समय ज्यादा जोर सदस्य देशों की अपनी-अपनी मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने और सीमा पार डिजिटल भुगतान की व्यवस्था को मजबूत करने पर है। यानी निकट भविष्य में ब्रिक्स की एक कॉमन करेंसी के बजाय स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और वैकल्पिक भुगतान तंत्र पर ही ज्यादा ध्यान रहने की संभावना है। कुल मिलाकर, ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए सिर्फ वैश्विक कूटनीति का मंच नहीं है। व्यापार बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने, ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिहाज से भी यह भारत के लिए बड़ा अवसर बन सकता है।





















