‘कांतारा’ से मिली प्रेरणा, इंजीनियर से अभिनेता बने मोहित घिल्डियाल बोले- अब पहाड़ की संस्कृति और युवाओं को मिलेगी नई पहचान
अमृत उजाला
देहरादून | विशेष रिपोर्ट
गढ़वाली सिनेमा ने 43 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद इतिहास रच दिया है। फिल्म ‘ढोली’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के साथ ही उत्तराखंड की लोक संस्कृति, बोली और लोककला को देशभर में नई पहचान मिली है। इस उपलब्धि को सिर्फ एक फिल्म की जीत नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ के कलाकारों और युवाओं की उम्मीदों की जीत माना जा रहा है।
इंजीनियर से अभिनेता बने मोहित, निभाया ढोल वादक का किरदार
श्रीनगर (गढ़वाल) के खोला गांव निवासी मोहित घिल्डियाल ने फिल्म में ढोल वादक की भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि शूटिंग के दौरान पूरी टीम ने दिन-रात मेहनत की थी और तभी महसूस हो गया था कि यह फिल्म कुछ बड़ा करने वाली है।
मोहित बताते हैं कि अभिनय उनका बचपन का सपना था, लेकिन परिवार चाहता था कि वे सुरक्षित करियर चुनें। इसी वजह से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और नौकरी के साथ-साथ छोटे-छोटे अभिनय के अवसर तलाशते रहे। धीरे-धीरे उन्होंने अभिनय को ही अपना भविष्य बनाने का फैसला किया।
‘कांतारा’ देखकर बदली सोच, जन्मी ‘ढोली’ की प्रेरणा
मोहित के मुताबिक, दक्षिण भारतीय फिल्म ‘कांतारा’ देखने के बाद उनके मन में सवाल उठा कि जब दूसरी संस्कृतियां दुनिया भर में पहचान बना सकती हैं तो उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति क्यों नहीं?
यहीं से गढ़वाली संस्कृति को बड़े पर्दे तक पहुंचाने का सपना शुरू हुआ। फिल्म के लिए उन्होंने प्रसिद्ध ढोल विशेषज्ञ प्रेमलाल हिंदवाण से विशेष प्रशिक्षण लिया और महीनों तक अभ्यास किया।
नेशनल अवॉर्ड से बदलेगी पहाड़ की सोच
मोहित का मानना है कि अब उत्तराखंड के अभिभावक भी फिल्म और कला के क्षेत्र को करियर के रूप में स्वीकार करना शुरू करेंगे। पहले जहां युवाओं को केवल सरकारी या निजी नौकरी की सलाह दी जाती थी, अब अभिनय और फिल्म निर्माण भी रोजगार का मजबूत विकल्प बन सकता है।
थियेटर की कमी अब भी सबसे बड़ी चुनौती
गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में सिनेमाघरों की कमी के कारण ये फिल्में गांव-गांव तक नहीं पहुंच पातीं। हालांकि सरकार के सहयोग और बढ़ती तकनीक के चलते अब क्षेत्रीय फिल्मों का निर्माण पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रहा है।
युवाओं के लिए नई उम्मीद
‘ढोली’ की सफलता सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उत्तराखंड के युवाओं के लिए एक नई शुरुआत मानी जा रही है। इससे स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और लोक कलाकारों को रोजगार मिलेगा, वहीं गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद भी बढ़ गई है।







