वृद्धावस्था! बक बक नही है…सम्मान से सुनो, मुझे भी कुछ कहना है!

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डाक्टर दीपक गोस्वामी

‘वृद्ध’ लोगों का ज़्यादा बोलना हमारे लिए अक्सर झुंझलाहट बन जाता है। हम कह देते हैं “बाबा फिर शुरू हो गए”, “दादी अब चुप भी करो”। पर डॉक्टर जब उसी बात को सुनते हैं तो कहते हैं ये तो आशीर्वाद है। सच ये है कि सेवा निवृत्त होने के बाद जब दुनिया सिकुड़ती है, तो वाणी ही वो डोर है जो वरिष्ठ नागरिक को ज़िंदगी से बांधे रखती है। आज अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी बीमारियों की कोई काट नहीं मिली है। दवाएं सिर्फ़ लक्षण धीमे करती हैं, जड़ नहीं काटतीं। ऐसे में बोलना सबसे सस्ता, सबसे सुलभ और सबसे कारगर न्यूरो-एक्सरसाइज़ बन जाता है। जब एक बुज़ुर्ग बोलता है तो वो सिर्फ़ हवा में शब्द नहीं फेंक रहा होता। उसके मस्तिष्क में एक साथ बिजली दौड़ती है। शब्द चुनना, वाक्य बनाना, पुरानी याद को खंगालना, सामने वाले का चेहरा पढ़कर अगला जवाब तैयार करना – ये पूरा काम दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, हिप्पोकैम्पस, टेम्पोरल लोब को एकसाथ जगा देता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी का सिद्धांत कहता है कि जिस अंग को चलाते रहोगे वो ज़िंदा रहेगा। चुप्पी दिमाग में जंग लगा देती है, जबकि बातचीत उसे रोज़ तेल देती है। तेज़ बोलने में तो विचारों की रफ़्तार भी बढ़ती है, और यही रफ़्तार याददाश्त को धार देती है। जो बुज़ुर्ग कम बोलते हैं, शोध बताते हैं कि उनमें संज्ञानात्मक गिरावट 40% तेज़ होती है।

बोलने का दूसरा पहलू सीधा दिल से जुड़ा है। उम्र के इस पड़ाव पर अकेलापन सबसे बड़ा रोग है। बच्चे नौकरी में, नाती-पोते मोबाइल में, और घर में एक कोने में बैठा बुज़ुर्ग। अगर वो कुछ दिल में दबाकर रखेगा तो वही घुटन धीरे-धीरे डिप्रेशन, एंजाइटी और फिर मानसिक बीमारी का रूप ले लेती है। बात निकाल देना मन का रेचन है। पुराने ज़माने में औरतें पानी भरने पनघट पर जाती थीं और घंटों बतियाती थीं – वो थेरेपी थी। आज के दादा-दादी को वो पनघट चाहिए। जब वो बोलते हैं, किस्सा सुनाते हैं, शिकायत भी करते हैं, तो असल में वो कॉर्टिसोल यानी तनाव हार्मोन को बाहर निकाल रहे होते हैं। चुप रहना बहादुरी नहीं है, घुट-घुट कर बीमार पड़ना है। इसलिए उन्हें मौका देना, टोकने के बजाय सुन लेना, उनके लिए भी और हमारे लिए भी इलाज है।

तीसरी बात पूरी तरह शारीरिक है और हम इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बोलना फेफड़ों का प्राणायाम है। हर शब्द के साथ डायाफ्राम हिलता है, फेफड़े फैलते हैं, ऑक्सीजन का संचार बेहतर होता है। चेहरे की 40 से ज़्यादा मांसपेशियां चलती हैं, जिससे चेहरे पर रौनक बनी रहती है और ‘फेशियल एट्रॉफी’ नहीं होती। गला, वोकल कॉर्ड, निगलने वाली मांसपेशियां – सबकी एक्सरसाइज़ हो जाती है। इसी वजह से जो बुज़ुर्ग ज़्यादा बात करते हैं उन्हें खाना अटकने की समस्या कम होती है, निमोनिया का खतरा घटता है। बातचीत में सिर हिलता है, आंखें घूमती हैं, प्रतिक्रिया में शरीर हिलता है – ये सब मिलकर बैलेंस सिस्टम यानी वेस्टिबुलर सिस्टम को एक्टिव रखता है। इसीलिए बातूनी बुज़ुर्गों में चक्कर आना और गिरने की घटनाएं कम देखी जाती हैं। यहाँ तक कि सुनने की क्षमता भी बेहतर रहती है, क्योंकि जब हम जवाब की उम्मीद में सुनते हैं तो कान और दिमाग ज़्यादा सतर्क रहते हैं।

अब इसे सिर्फ़ शरीर और मन तक सीमित रखना नाइंसाफ़ी होगी। इसका सामाजिक पहलू देखिए। एक बोलने वाला बुज़ुर्ग परिवार की ‘लाइव लाइब्रेरी’ होता है। कुल का इतिहास, रिश्तों के नाम, खेत की मेड़ का किस्सा, शादी-ब्याह के रिवाज़ – ये सब किताबों में नहीं मिलते। अगर वो चुप हो गया तो एक पूरी पीढ़ी की जड़ कट जाएगी। मोहल्ले और गांव के स्तर पर देखें तो चौपाल, मंदिर का चबूतरा, पार्क की बेंच – ये सब बुज़ुर्गों की बातों से ही आबाद रहते थे। जब से वो चुप हुए, मोहल्ले भी खामोश हो गए। वृद्ध की वाणी समाज का गोंद है। उसे चुप कराना मतलब समाज को खंड-खंड करना।

आर्थिक कोण से सोचें तो चुप्पी बहुत महंगी है। दुनिया में डिमेंशिया की देखभाल का खर्च 1.3 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका है। भारत में भी एक मरीज़ पर सालाना 3-4 लाख खर्च हो जाते हैं। अगर सिर्फ़ संवाद बढ़ाकर हम 10% केस भी रोक लें, तो हज़ारों करोड़ बचेंगे। दूसरी तरफ़ ‘सिल्वर इकोनॉमी’ खड़ी हो रही है। जापान, यूरोप में 60 पार के लोग सबसे बड़े खर्च करने वाले हैं – घूमना, तीर्थ, हेल्थ प्रोडक्ट, पोते-पोतियों पर खर्च। पर ये तभी होगा जब वो मानसिक रूप से सक्रिय और खुश होंगे। डिप्रेशन में डूबा, चुपचाप बैठा बुज़ुर्ग न बाज़ार जाता है, न पैसा चलाता है। उसका बोलना, हंसना, किस्सा सुनाना – ये सब परोक्ष रूप से अर्थव्यवस्था का पहिया है।

आध्यात्मिक तल पर हमारी संस्कृति ने हमेशा ‘वाक्’ को शक्ति माना है। वेद कहते हैं ‘शब्द ही ब्रह्म है’। वृद्धावस्था वानप्रस्थ आश्रम है – यानी ज्ञान बांटने का समय। अगर इस उम्र में भी बोलने पर रोक लगे तो वो कैसा वानप्रस्थ? लौकिक जीवन में भी जो बोलता है वही ‘मौजूद’ गिना जाता है। चुप को तो लोग ज़िंदा भी मुर्दा समझ लेते हैं। परालोक की दृष्टि से देखें तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अंत समय में सबसे ज़्यादा कष्ट ‘अनकही बातों’ का होता है। बोलने देना मतलब उन्हें बोझ से हल्का करना, ताकि विदाई शांत हो।

पर यहाँ एकतरफ़ा तारीफ़ भी ठीक नहीं। आलोचना ज़रूरी है। ज़्यादा बोलना अगर सिर्फ़ निंदा, अतीत का रोना, या दूसरों को नीचा दिखाना बन जाए तो वो अमृत नहीं ज़हर है। ऐसे शब्द सुनने वाले का भी तनाव बढ़ाते हैं और बोलने वाले के शरीर में भी नेगेटिविटी का केमिकल छोड़ते हैं। डॉक्टर ‘सार्थक संवाद’ की बात करते हैं, ‘बकबक’ की नहीं। दूसरा, संवाद हमेशा दोतरफ़ा होता है। अगर घर के लोग मोबाइल में घुसे रहें और बुज़ुर्ग बोलता रहे, तो वो अकेलापन और बढ़ेगा। सुनना भी उतनी ही बड़ी दवा है जितना बोलना। तीसरा, जो वृद्ध बीमारी या स्ट्रोक की वजह से बोल नहीं सकते, उन पर ‘बोलो-बोलो’ का दबाव बनाना क्रूरता है। उनके लिए इशारा, लिखना, चित्र बनाना, संगीत – अभिव्यक्ति के दूसरे रास्ते खोलने होंगे। असली मुद्दा ‘वाणी’ नहीं ‘अभिव्यक्ति’ है।

तो करना क्या चाहिए? जमीनी स्तर पर हर घर में ‘सुनने का समय’ तय हो। 20 मिनट, बिना टीवी, बिना फोन। मोहल्ले में ‘बुज़ुर्ग अड्डा’ फिर से बनें जहाँ कोई एजेंडा न हो, बस चाय और बात। सरकार ‘टॉक थेरेपी’ को स्वास्थ्य योजना में जोड़े, जैसे जापान में बुज़ुर्गों के कैफ़े हैं जिन्हें वो खुद चलाते हैं। डिजिटल दौर में उन्हें वॉयस नोट भेजना सिखाएं – पोता विदेश में भी हो तो दादी की आवाज़ रोज़ सुन ले, और दादी भी बोलकर हल्की हो जाए।

अंत में बस इतना कि हमने ओल्ड एज होम बना दिए, पर बुज़ुर्गों को ‘सुनने वाले कान’ नहीं दिए। उनकी बात को ‘सठियाना’ कहना बंद करो। जब वो वही किस्सा दसवीं बार सुनाएं तो समझो उनका दिमाग़ अपनी फ़ाइलों का बैकअप ले रहा है। उन्हें टोकना मतलब हार्ड-डिस्क का प्लग निकाल देना। अल्जाइमर की कोई गोली नहीं बनी, पर हर घर में एक मुफ़्त का डॉक्टर बैठा है – बातूनी दादा, बातूनी नानी। उनकी वाचालता का मज़ाक मत उड़ाओ, उसे थाम लो। क्योंकि जिस दिन शब्द चुप हुए, उस दिन यादें मरेंगी, और यादों के बिना इंसान सिर्फ़ सांस लेता शरीर रह जाता है। बोलना ज़िंदा रहने की सबसे बुनियादी शर्त है। उन्हें बोलने दो, ताकि वो भी जिएं और हम भी इंसान बने रहें।

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