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अमृत उजाला > अन्य खबरें > वसुधैव कुटुम्बकम की अदभुत संकल्पना -अंतरराष्ट्रीय जैविक विविधता दिवस
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वसुधैव कुटुम्बकम की अदभुत संकल्पना -अंतरराष्ट्रीय जैविक विविधता दिवस

amritujala
Last updated: May 22, 2026 10:02 am
amritujala 2 months पहले
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  • डाक्टर दीपक गोस्वामी

हर साल 22 मई को धरती एक त्योहार मनाती है जिसका नाम है अंतरराष्ट्रीय जैविक विविधता दिवस। यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि 22 मई 1992 को नैरोबी में जैविक विविधता संधि का पाठ स्वीकार हुआ था। संयुक्त राष्ट्र ने 2000 में इसे विश्व-दिवस घोषित किया। पर यह कैलेंडर की तारीख नहीं, चेतावनी की घंटी है। जैविक विविधता मतलब धरती पर पाए जाने वाले हर प्रकार के जीवन की रंगोली — सूक्ष्म बैक्टीरिया से लेकर बरगद तक, तितली से लेकर बाघ तक, धान की हजार किस्मों से लेकर समुद्र की मछलियों तक। वैज्ञानिक कहते हैं कि धरती पर करीब 87 लाख प्रजातियाँ हैं और हमने अभी सिर्फ 12 लाख को पहचाना है। हर घंटे तीन प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। यह रफ्तार डायनासोर के युग से 1000 गुना तेज है। इसलिए यह दिन मनाया जाता है कि मनुष्य रुककर देखे कि उसके पैरों तले जीवन की चादर कितनी फट चुकी है।

सामाजिक दृष्टि से देखो तो जैविक विविधता हमारी थाली, दवाई और संस्कृति की जड़ है। भारत में 705 जनजातियाँ हैं जो 7500 पौधों को भोजन और औषधि के रूप में जानती हैं। संथाल महुआ से तेल निकालता है, गोंड कोदो-कुटकी खाता है, तमिल मछुआरा 200 तरह की मछली का नाम जानता है। जब एक प्रजाति मिटती है तो उसके साथ एक भाषा, एक गीत, एक त्योहार मिट जाता है। सिक्किम का ‘लाचुंगपा’ आलू विलुप्त हुआ तो उसके साथ ‘लोसर’ पर बनने वाला विशेष व्यंजन भी गया। शहर का आदमी कहेगा मुझे क्या फर्क पड़ता है। फर्क यह है कि आज तुम जो बासमती खाते हो वह 10,000 साल के जंगली धान के विविध जीन का नतीजा है। अगर धान की सारी किस्में खत्म होकर सिर्फ एक हाइब्रिड बचे और उस पर रोग आए तो एक सीजन में 140 करोड़ लोगों की थाली खाली। कोविड में हमें याद आया कि जंगली जानवरों के वायरस जब जंगल कटने से शहर आते हैं तो लॉकडाउन लगता है। विविधता सामाजिक सुरक्षा-कवच है।

आर्थिक चश्मे से आँकड़े चौंकाते हैं। विश्व बैंक कहता है कि दुनिया की आधे से ज्यादा GDP यानी 44 ट्रिलियन डॉलर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकृति पर टिकी है। परागण करने वाली मधुमक्खी और तितली हर साल 577 अरब डॉलर की फसल बचाती हैं। एक अकेला बरगद का पेड़ जीवन भर में 47 लाख रुपये की ऑक्सीजन, छाया और मिट्टी-संरक्षण देता है। सुंदरवन के मैंग्रोव हर साल 2.5 अरब डॉलर का तूफान-रोधी बांध बनकर कोलकाता बचाते हैं। जब गंगा की डॉल्फिन मरती है तो मछुआरे की जाल खाली होती है। जब गिद्ध खत्म हुए तो पशुओं के शव सड़ने से रेबीज फैला और भारत को 34,000 करोड़ का नुकसान हुआ। जैविक विविधता कोई एनजीओ का शौक नहीं, शेयर बाजार की नींव है। जिस दिन जंगल का हिसाब GDP में जोड़ा जाएगा, उस दिन वित्त मंत्री का बजट-भाषण बदल जाएगा।

राजनीतिक और कूटनीतिक धरातल पर विविधता अब तेल से बड़ी ताकत है। जिसे ‘ग्रीन डिप्लोमेसी’ कहते हैं। ब्राजील अमेजन के बदले कार्बन-क्रेडिट माँगता है। भारत ने ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ बनाकर बाघ-कूटनीति शुरू की। चीन पांडा-डिप्लोमेसी करता है। जो देश जैविक संसाधन बचाएगा, वही कल बीज-बैंक, दवा-पेटेंट और कार्बन-बाजार का राजा होगा। 1992 की जैव विविधता संधि कहती है कि नीम, हल्दी, बासमती पर समुदाय का अधिकार है। अमेरिका ने हल्दी का पेटेंट लिया था, भारत ने लड़कर वापस लिया। यह लड़ाई सीमा की नहीं, डीएनए की है। जलवायु-सम्मेलनों में अब कार्बन के साथ-साथ ‘बायोडायवर्सिटी-क्रेडिट’ की बात होती है। कल को अगर भारत अपने पश्चिमी घाट बचाता है तो वह विश्व-मंच पर ऑक्सीजन-दाता बनकर खड़ा होगा। युद्ध टैंक से नहीं, परागकण से जीते जाएँगे।

आध्यात्मिक और परालौकिक तल पर हमारे वेद कहते हैं ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’। जैन धर्म चींटी तक में आत्मा देखता है। बौद्ध ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ कहते हैं — सब जुड़ा है। जब जंगल कटता है तो मंदिर की घंटी भी उदास होती है क्योंकि फूल चढ़ाने को नहीं बचता। गीता का ‘वासुदेव सर्वम्’ तभी सार्थक है जब बाघ, बरगद और बैक्टीरिया में वही चेतना दिखे। आदिवासी ‘सरना’ धर्म में पेड़ देवता है। यह अंधविश्वास नहीं, इकोलॉजी है। जब हम तुलसी में जल चढ़ाते हैं तो परोक्ष रूप से औषधीय पौधा बचाते हैं। जब नागपंचमी मनाते हैं तो सर्प-संरक्षण करते हैं। विविधता बचाना मोक्ष का मार्ग है क्योंकि प्रकृति का ऋण चुकाए बिना कोई मुक्त नहीं होता।

वैश्विक और लौकिक संकट एक साथ आए हैं। 2019 की IPBES रिपोर्ट कहती है कि 10 लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। 75% भू-भाग बदल चुका, 66% समुद्र प्रभावित। भारत में 2023 तक 220 प्रजातियाँ संकटग्रस्त सूची में। गोडावण राजस्थान से गायब हुआ तो रेगिस्तान का संतुलन डगमगाया। केरल की ‘नीलकुरिंजी’ 12 साल में एक बार खिलती है। अगर जलवायु 2 डिग्री गर्म हुई तो वह हमेशा के लिए सो जाएगी। समुद्र का तापमान बढ़ने से प्रवाल-भित्ति सफेद हो रही है। प्रवाल मरा तो मछली मरी, मछली मरी तो मछुआरा भूखा। यह श्रृंखला दिल्ली के एसी कमरे तक पहुँचती है जब कॉफी 300 रुपये किलो हो जाती है क्योंकि ब्राजील में परागण करने वाली मधुमक्खी मर गई।

आम जन-जीवन पर इसका सीधा असर पड़ता है। सुबह की चाय की पत्ती, दोपहर की दाल, रात की रोटी, बुखार की टेबलेट, बच्चों का टीका, शादी का शहद, हवन की समिधा — सब विविधता की देन है। जिस दिन धरती से केंचुआ मिटा, उस दिन खेत की उर्वरा-शक्ति 30% गिर जाएगी और तुम्हारे खेत में डीएपी की बोरी दोगुनी लगेगी। जिस दिन परागण करने वाले कीट गए, उस दिन सेब 1000 रुपये किलो होगा। अस्पताल में 70% दवाएँ पौधों-जीवों से निकली हैं। पेनिसिलिन फफूंद से, एस्पिरिन विलो पेड़ से, कैंसर की दवा टैक्सोल यू पेड़ से। जंगल खत्म तो फार्मेसी खाली। गाँव का किसान जानता है कि खेत के मेड़ पर नीम, आँवला, बेर क्यों लगाता है — वह बीमा है। शहर का आदमी भूल गया है कि म्यूजियम में रखी तितली और सलाद की टोकरी में रखा टमाटर एक ही डोर से बंधे हैं।

तो करना क्या है। पहला, उपभोक्ता से संरक्षक बनो। स्थानीय, मौसमी, विविध भोजन खाओ। एक ही कंपनी का एक ही बीज नहीं, 10 तरह की दाल घर लाओ। दूसरा, हर जन्मदिन पर पौधा नहीं, जंगली देशी पौधा लगाओ — पीपल, पाखर, कदंब। तीसरा, बच्चों को चीता नहीं, चींटी दिखाओ। जब बच्चा गोबर में केंचुआ देखकर डरेगा नहीं, तब बड़ा होकर जंगल नहीं कटवाएगा। चौथा, पंचायत स्तर पर ‘बीज-उत्सव’ मनाओ। बुजुर्ग किसानों के पास 50 साल पुराने बीज हैं, उन्हें बैंक से ज्यादा सुरक्षित रखो। पाँचवाँ, त्योहारों को इको-फ्रेंडली बनाओ। गणेश मिट्टी के, होली फूल की, दीवाली दीये की। छठा, सरकार से पूछो कि विकास परियोजना में ‘बायोडायवर्सिटी इम्पैक्ट असेसमेंट’ हुआ या नहीं। सड़क जरूरी है, पर सड़क के किनारे लगे 100 साल पुराने पेड़ की कीमत भी जोड़ो।

अंतिम सच यह है कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, मात्र एक धागा है। जब एक धागा टूटता है तो पूरी चादर कमजोर होती है। जैविक विविधता दिवस हमें याद दिलाता है कि हम ऑक्सीजन उधार लेते हैं, और किराया प्रजातियों की रक्षा करके चुकाना है। जिस दिन अंतिम नदी सूखेगी, अंतिम मछली मरेगी, अंतिम पेड़ कटेगा, उस दिन मनुष्य समझेगा कि पैसा खाया नहीं जाता। पर तब तक देर हो चुकी होगी। इसलिए 22 मई को भाषण नहीं, संकल्प चाहिए। संकल्प कि मेरी थाली, मेरी साँस, मेरी दवाई और मेरी प्रार्थना — सब में जंगल जिंदा रहेगा। तभी विश्व बंधुत्व, शांति और विकास का पहिया चलेगा। वरना पहिया रुक जाएगा, और हम सब उसके नीचे।

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