भारत का राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों और एक चक्र से बना वस्त्र नहीं है। वह भारत की स्वतंत्रता, असंख्य बलिदानों, लोकतांत्रिक चेतना और भविष्य के राष्ट्रीय स्वप्न का दृश्य प्रतीक है। जब तिरंगा आकाश में लहराता है, तब उसमें केवल रंग नहीं लहराते, बल्कि उन अनगिनत भारतीयों की आकांक्षाएं भी लहराती हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना देखा और उसके लिए संघर्ष किया।
तिरंगे को समझना वस्तुतः भारत की आत्मा और उसकी राष्ट्रीय चेतना को समझना है। वहीं, उसके मध्य स्थित अशोक चक्र भारत की निरंतर गति, नैतिक दिशा और प्रगति का प्रतीक बनकर सामने आता है।
राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा
भारत में ध्वज और पताका की परंपरा प्राचीन काल से रही है। राजाओं, योद्धाओं और विभिन्न समुदायों के अपने-अपने ध्वज रहे हैं। हालांकि आधुनिक अर्थों में पूरे भारत को एक राष्ट्रीय प्रतीक के सूत्र में बांधने की आवश्यकता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अधिक स्पष्ट हुई।
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में राष्ट्रीय ध्वज के कई स्वरूप सामने आए। सिस्टर निवेदिता, मैडम भीकाजी कामा, एनी बेसेंट और अन्य राष्ट्रवादी प्रयासों ने राष्ट्रीय ध्वज की अवधारणा के विकास में योगदान दिया। इसी क्रम में पिंगली वेंकैया का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। वर्ष 1921 में विजयवाड़ा में महात्मा गांधी के समक्ष प्रस्तुत ध्वज की कल्पना आगे चलकर राष्ट्रीय ध्वज के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बनी।
उस दौर में चरखा स्वावलंबन, श्रम, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वतंत्रता आंदोलन का शक्तिशाली प्रतीक था। वर्ष 1931 में तिरंगे के एक स्वरूप को कांग्रेस ने स्वीकार किया। लेकिन स्वतंत्र भारत के लिए आवश्यकता ऐसे ध्वज की थी जो किसी राजनीतिक दल से ऊपर उठकर पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करे।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज






















