इस वर्ष नागपंचमी का पर्व शिवभक्तों के लिए खास माना जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, नागपंचमी के दिन सावन सोमवार और सिंह संक्रांति का संयोग बन रहा है। इसे ‘त्रिवेणी महासंयोग’ नाम दिया जा रहा है। बताया जा रहा है कि इससे पहले वर्ष 2003 में नागपंचमी और सावन सोमवार का संयोग बना था, जबकि इस बार सिंह संक्रांति के साथ तीनों पर्वों का मेल इसे और विशेष बना रहा है। धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों के लिए यह दिन शिव आराधना, नागदेवता के पूजन और साधना का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।
सनातन परंपरा में भगवान शिव और नागदेवता का संबंध बेहद गहरा माना गया है। भगवान शिव के गले में विराजमान नागराज वासुकी इसी संबंध के प्रतीक हैं और इसी कारण शिव को ‘नागभूषण’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि सावन सोमवार और नागपंचमी एक साथ पड़ने पर शिव और नागदेवता की आराधना का विशेष महत्व बढ़ जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने के साथ नागदेवता का पूजन कर सुख, शांति और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव अपनी राशि सिंह में प्रवेश करते हैं। सूर्य को आत्मबल, आरोग्य, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का कारक माना जाता है। वहीं, नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा को भय और नकारात्मकता से मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है। पूजन के लिए प्रातः 5:45 से 8:25 बजे तक का समय, अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12:00 से 12:52 बजे तक और प्रदोष काल में शाम 6:40 से 8:15 बजे तक का समय बताया गया है। हालांकि, स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में अंतर संभव है।
ज्योतिर्विद डॉ. प्रीती पवन तिवारी, संस्थापक अध्यक्ष, ज्योतिष सेवा संस्थान के अनुसार, ऐसे अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया शिव पूजन, नागदेवता की आराधना, मंत्र-जप और दान विशेष फलदायी माना जाता है। भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप किया जा सकता है। वहीं नाग गायत्री मंत्र का भी श्रद्धापूर्वक जाप करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन को आत्मचिंतन, पूजा और सेवा के माध्यम से मन की शांति पाने का अवसर माना गया है। आस्था रखने वाले श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजा और दान कर इस विशेष दिन को सार्थक बना सकते हैं।






















