अयोध्या: तारुन में कांग्रेस के कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान भोज में मछली परोसे जाने की चर्चा के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इसी को लेकर तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य के उत्तराधिकारी महंत एकनाथ महाराज ने प्रतिक्रिया दी है। महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि सावन में मछली को लेकर राजनीति करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के खान-पान को उसकी धार्मिक पहचान का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
अपने बयान में महंत एकनाथ महाराज ने श्रीराम और निषादराज-केवट के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम ने निषादराज और केवट के प्रेम को स्वीकार किया था। केवट ने प्रभु श्रीराम के चरण पखारे और उन्हें नदी पार कराई। जब श्रीराम ने उसे उतराई देनी चाही तो केवट ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
लोक परंपरा में प्रचलित केवट संवाद का उल्लेख करते हुए महंत ने कहा –
“तुम ही केवट, मैं भी केवट, कैसे तुमसे करूँ चतुराई।
दीजो भव पार प्रभु मोहे, जब मैं आऊँ तुम्हारे द्वारी।”
उन्होंने कहा कि इस प्रसंग का मूल संदेश प्रेम, समर्पण और सामाजिक समरसता है। इसे किसी व्यक्ति के खान-पान को लेकर विवाद खड़ा करने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
खान-पान को राजनीति का मुद्दा न बनाया जाए
महंत एकनाथ महाराज ने कहा कि भारत विविध परंपराओं और संस्कृतियों का देश है। कई क्षेत्रों में लोग सावन के दौरान कठोर व्रत रखते हैं और सात्विक भोजन करते हैं, जबकि कुछ स्थानों पर खान-पान स्थानीय परंपराओं और परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक आस्था के कारण सावन में मछली या किसी अन्य खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहता, तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन इसी आस्था को राजनीतिक मुद्दा बनाकर दूसरे लोगों पर थोपना उचित नहीं है। महंत ने कहा कि “मछली किसी का पेटेंट नहीं है।” सावन में मछली को लेकर बहस करने के बजाय श्रीराम के प्रेम और सामाजिक समरसता के संदेश को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सनातन को मजबूत करने के लिए समाज के सामने कई बड़े विषय हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
राजनीतिक दलों से भी की अपील
महंत एकनाथ महाराज ने राजनीतिक दलों से अपील की कि खान-पान जैसे मुद्दों पर समाज को बांटने वाली बहस से बचें। उन्होंने कहा कि राजनीति का केंद्र जनहित, सामाजिक सद्भाव और समाज के विकास जैसे विषय होने चाहिए। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन किसी की व्यक्तिगत खान-पान की पसंद को लेकर विवाद खड़ा करने के बजाय समाज में प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए।





















