हरतालिका तीज सनातन परंपरा में महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक मानी जाती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व आमतौर पर अगस्त या सितंबर में पड़ता है। इसे गौरी तृतीया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से रखा जाता है। इस पर्व में व्रत, साधना और भगवान शिव-पार्वती की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। हरतालिका तीज मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं का पर्व है। इस दिन महिलाएं पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं।
हरतालिका नाम कैसे पड़ा?
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठिन तपस्या शुरू की। इसी दौरान उनकी सखियां उन्हें अपने साथ वन में ले गईं, ताकि उनकी तपस्या में कोई बाधा न आए और उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध न हो। ‘हरतालिका’ शब्द को लेकर मान्यता है कि यह ‘हरत’ और ‘आलिका’ दो शब्दों से बना है। ‘हरत’ का अर्थ हरण करना और ‘आलिका’ का अर्थ सखी या सहेली माना जाता है। यानी सखी द्वारा पार्वती को अपने साथ ले जाना ही हरतालिका नाम का आधार माना जाता है।
हरतालिका तीज से जुड़ी मान्यताएं
हरतालिका तीज के व्रत को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में कई लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि व्रत के दौरान नियमों का पालन करना चाहिए और संयम बनाए रखना चाहिए। इस दिन व्रती महिलाओं द्वारा निर्जला उपवास रखने, रात्रि जागरण करने और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करने की परंपरा है। कई स्थानों पर यह भी मान्यता प्रचलित है कि एक बार हरतालिका व्रत शुरू करने के बाद इसे हर साल विधि-विधान से करना चाहिए। हालांकि, ऐसी लोक मान्यताएं क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
हरतालिका तीज व्रत के प्रमुख नियम
हरतालिका तीज का व्रत सामान्य तौर पर निर्जला रखा जाता है। व्रती महिलाएं सूर्योदय से लेकर अगले दिन पूजा और पारण तक अन्न और जल का त्याग करती हैं।
- सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं।
- अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत कर सकती हैं।
- कई परंपराओं में महिलाएं रातभर जागकर भजन-कीर्तन और भगवान शिव-पार्वती का स्मरण करती हैं।
- व्रत के दौरान नए वस्त्र पहनने और सोलह श्रृंगार करने की भी परंपरा है।
- व्रत का समापन अगले दिन पूजा के बाद पारण से किया जाता है।
हरतालिका तीज की पूजा विधि
हरतालिका तीज की पूजा प्रदोष काल में करने की परंपरा है। इस दौरान भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा के लिए कई जगहों पर बालू या गीली मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं स्वयं बनाई जाती हैं। इसके बाद फूलों से फुलेरा सजाकर उसके अंदर चौकी रखी जाती है। चौकी पर सातिया बनाकर पूजा की सामग्री रखी जाती है और केले के पत्ते पर तीनों प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। सबसे पहले कलश स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर श्रीफल रखा जाता है और उसके मुख पर लाल नाड़ा बांधा जाता है। इसके बाद कलश पर कुमकुम, हल्दी, अक्षत और पुष्प अर्पित कर पूजा की जाती है। कलश पूजन के बाद भगवान गणेश, भगवान शिव और माता गौरी की पूजा की जाती है। माता गौरी को सुहाग की सामग्री अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में आरती की जाती है। कई परंपराओं में रातभर जागरण कर अलग-अलग समय पर पूजा और आरती की जाती है। अगले दिन अंतिम पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। प्रसाद के रूप में ककड़ी और हलवे का भोग लगाने की भी परंपरा है।
पूजा सामग्री
हरतालिका तीज की पूजा में सामान्य तौर पर फूल, फल, पत्ते, केले का पत्ता, गीली मिट्टी या बालू, बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आक के फूल, तुलसी, मौली, वस्त्र, कलश, श्रीफल, दीपक, घी, तेल, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अक्षत, चंदन और अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है। माता गौरी के लिए सुहाग सामग्री जैसे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी और मेहंदी आदि भी अर्पित की जाती है। इसके अलावा पंचामृत बनाने के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का प्रयोग किया जाता है।
हरतालिका तीज व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना जारी रखी। लंबे समय तक तप करने के बाद उनकी तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। कथा के अनुसार एक समय भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव हिमालय के सामने रखा गया। हिमालय इस प्रस्ताव से प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को इसकी जानकारी दी। लेकिन पार्वती भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी थीं। वह इस प्रस्ताव से दुखी हुईं और अपनी सखी को अपनी इच्छा बताई। पार्वती की सखी उन्हें वन में ले गईं, जहां उन्होंने छिपकर भगवान शिव की आराधना और तपस्या की। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पति रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में जब हिमालय को पार्वती के मन की बात पता चली तो उन्होंने उनकी इच्छा स्वीकार कर भगवान शिव के साथ उनका विवाह तय किया। इस तरह माता पार्वती को भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुए। इसी प्रसंग से हरतालिका तीज के व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
आचार्य संजय तिवारी





















