इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी आरोपी पर आत्मसमर्पण के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से पुलिस उसके निर्दोष परिजन को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रख सकती। कोर्ट ने ऐसी हिरासत को व्यक्ति की स्वतंत्रता का अवैध हनन माना और पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने अरविंद कुमार यादव की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि यादव को प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में हिरासत में रखा गया था।
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए अरविंद कुमार यादव को 40 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के आत्मसमर्पण के लिए उसके निर्दोष परिजन की स्वतंत्रता का इस तरह हनन नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक मुआवजे की राशि मामले में जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूली जाएगी। कोर्ट की इस टिप्पणी से पुलिस कार्रवाई के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश गया है।





















