26 जुलाई भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब भारतीय सेना ने दुनिया को यह दिखा दिया कि यदि देश की संप्रभुता और तिरंगे की आन पर कोई आंख उठाएगा तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। इसी दिन वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम और बर्फीली चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों और सैनिकों को खदेड़कर ऑपरेशन विजय को सफल बनाया था। इसलिए हर वर्ष 26 जुलाई को पूरे देश में कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक सैन्य जीत का उत्सव नहीं, बल्कि उन 527 अमर वीरों को श्रद्धांजलि देने का दिन है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
भारत और पाकिस्तान का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। दोनों देशों के बीच आज तक चार बड़े युद्ध हो चुके हैं। पहला युद्ध 1947-48 में हुआ, जब पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए और भारतीय सेना ने कश्मीर की रक्षा की। लगभग 15 महीने चले इस युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम हुआ, लेकिन कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे आज पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) कहा जाता है।
दूसरा भारत-पाक युद्ध 1965 में हुआ। पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में घुसपैठिए भेजे, लेकिन भारतीय सेना ने करारा जवाब दिया। करीब 17 दिन तक चले इस युद्ध के बाद ताशकंद समझौता हुआ। दुर्भाग्य से समझौते के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया।
तीसरा और सबसे निर्णायक युद्ध 1971 में हुआ। पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे अत्याचारों के कारण लाखों लोग भारत आए। भारत ने मानवीय और सामरिक कारणों से हस्तक्षेप किया। केवल 13 दिनों में पाकिस्तान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए। इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इसे भारत के सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में गिना जाता है।
इसके बाद आया 1999 का कारगिल युद्ध, जिसने पूरे देश को एकजुट कर दिया। यह युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला। इसकी शुरुआत मई 1999 में हुई और 26 जुलाई 1999 को भारत ने विजय की घोषणा की।
कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस समय भारत शांति का हाथ बढ़ा रहा था, उसी समय पाकिस्तान की सेना विश्वासघात की योजना बना रही थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दोनों देशों के रिश्तों में सुधार लाने के लिए 19 फरवरी 1999 को ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की। वे स्वयं बस से पाकिस्तान गए और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की। दोनों देशों ने लाहौर घोषणा (Lahore Declaration) पर हस्ताक्षर किए और पूरी दुनिया ने इसे दक्षिण एशिया में शांति की नई उम्मीद माना। लेकिन बाद में सामने आया कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ और उनकी सैन्य नेतृत्व टीम पहले से ही कारगिल में घुसपैठ की योजना बना चुके थे।
सर्दियों के दौरान अत्यधिक बर्फबारी के कारण भारतीय सेना कुछ ऊंची चौकियों से अस्थायी रूप से नीचे आ जाती थी। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तानी सैनिक आतंकवादियों का भेष बनाकर नियंत्रण रेखा पार कर कारगिल, द्रास, बटालिक और टोलोलिंग की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर बैठे। उनका उद्देश्य श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) को बाधित करना, सियाचिन पर दबाव बनाना और कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालना था।
3 मई 1999 को स्थानीय चरवाहे ताशी नामग्याल ने संदिग्ध गतिविधियां देखीं और भारतीय सेना को सूचना दी। जांच के बाद घुसपैठ का खुलासा हुआ और भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू कर दिया। भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर के तहत दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए, जबकि भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन तलवार के माध्यम से अरब सागर में पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बनाया।
यह युद्ध भारतीय सेना के लिए बेहद कठिन था। सैनिकों को 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई, माइनस तापमान, ऑक्सीजन की कमी और सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए लड़ाई लड़नी पड़ी। दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था और भारतीय सैनिक नीचे से चढ़ाई कर रहे थे, फिर भी उन्होंने अद्भुत साहस और रणनीति के दम पर एक-एक कर सभी चोटियों पर कब्जा वापस हासिल कर लिया।
कारगिल युद्ध का सबसे निर्णायक क्षण टाइगर हिल पर तिरंगा फहराना था। जुलाई 1999 की शुरुआत में भारतीय सैनिकों ने असंभव माने जाने वाले अभियान को सफल बनाते हुए टाइगर हिल पर कब्जा कर लिया। इसके बाद पाकिस्तान की हार लगभग तय हो गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिला। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर सैनिकों को वापस बुलाने का दबाव बनाया। अंततः पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा।
26 जुलाई 1999 को भारत ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि कारगिल की सभी प्रमुख चोटियां दुश्मन से मुक्त करा ली गई हैं। इसी दिन को हर वर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
कारगिल युद्ध में 527 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि 1,300 से अधिक जवान घायल हुए। पाकिस्तान ने अपने सैनिकों के हताहत होने के आधिकारिक आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए, लेकिन विभिन्न आकलनों के अनुसार उसके 700 से 1,000 सैनिक मारे गए।
इस युद्ध में अनेक वीर सैनिकों ने इतिहास रच दिया। कैप्टन विक्रम बत्रा, जिनका प्रसिद्ध नारा “ये दिल मांगे मोर” आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है; लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और राइफलमैन संजय कुमार को उनके अद्वितीय साहस के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अलावा कैप्टन विजयंत थापर, मेजर पद्मपाणि आचार्य, कैप्टन अनुज नैय्यर और सैकड़ों वीर सैनिकों का बलिदान देश कभी नहीं भूल सकता।
कारगिल युद्ध के बाद भारत ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए। सीमाओं पर निगरानी बढ़ाई गई, आधुनिक हथियार खरीदे गए, खुफिया तंत्र को मजबूत किया गया, पर्वतीय युद्ध क्षमता विकसित की गई और रक्षा सुधारों के लिए कारगिल समीक्षा समिति की सिफारिशों को लागू किया गया।
कारगिल विजय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शांति की इच्छा हमारी ताकत है, लेकिन यदि कोई भारत की संप्रभुता को चुनौती देगा तो भारतीय सेना उसका जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर बहा हर रक्त का कतरा आने वाली पीढ़ियों को हमेशा यह संदेश देता रहेगा कि तिरंगे की रक्षा के लिए भारत के वीर जवान हर बलिदान देने को तैयार हैं।
कारगिल विजय दिवस पर देश के सभी अमर शहीदों को शत-शत नमन।
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।”







