Parliament Session 2026: संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच माना जाता है, जहां देश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा होती है, कानून बनाए जाते हैं और सरकार से सवाल पूछे जाते हैं। लेकिन जब संसद की कार्यवाही लगातार बाधित होती है तो इसका असर सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश के खजाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी पड़ता है। संसद के मानसून सत्र 2026 के शुरुआती तीन दिन इसी तरह के गतिरोध के गवाह बने। सत्र शुरू होते ही विपक्ष के विरोध, नारेबाजी और हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में सामान्य कामकाज नहीं हो सका। बार-बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी और तय एजेंडे के कई महत्वपूर्ण काम आगे नहीं बढ़ पाए। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सदन में कामकाज नहीं होता है, तब भी क्या खर्च जारी रहता है? और अगर हां, तो इसका भार आखिर किस पर पड़ता है?
संसद नहीं चलने पर भी जारी रहता है करोड़ों का खर्च
संसद की कार्यवाही का खर्च सिर्फ सांसदों की मौजूदगी या उनके वेतन तक सीमित नहीं होता। सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारी, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी सुविधाएं, प्रसारण व्यवस्था, अनुवाद सेवाएं और प्रशासनिक व्यवस्थाएं लगातार काम करती रहती हैं। यानी अगर किसी दिन हंगामे के कारण संसद की कार्यवाही नहीं चल पाती है, तब भी इन सभी व्यवस्थाओं पर खर्च जारी रहता है। यह खर्च सीधे तौर पर देश के सार्वजनिक धन से जुड़ा होता है।
एक मिनट की कार्यवाही पर लाखों रुपये खर्च
बजट सत्र 2026 के दौरान लोकसभा के पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने संसद की कार्यवाही के खर्च को लेकर जानकारी दी थी। उनके मुताबिक, संसद चलाने में लगभग हर मिनट 2.5 लाख रुपये, हर घंटे करीब 1.5 करोड़ रुपये और एक दिन में लगभग 9 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। अगर इसी अनुमान को मानसून सत्र के शुरुआती तीन दिनों पर लागू करें तो करीब 27 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि इन दिनों में प्रश्नकाल, शून्यकाल और विधायी कामकाज पूरी तरह से सामान्य तरीके से नहीं हो सका।
तीन दिनों में क्या हुआ?
पहला दिन: हंगामे के साथ हुई शुरुआत
मानसून सत्र के पहले ही दिन सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। विरोध और नारेबाजी के चलते लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्यवाही प्रभावित हुई और कई बार स्थगन की स्थिति बनी।
दूसरा दिन: गतिरोध नहीं हुआ खत्म
दूसरे दिन भी हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया। लगातार विरोध के कारण प्रश्नकाल सहित कई जरूरी संसदीय गतिविधियां प्रभावित रहीं और तय कार्यक्रम के अनुसार काम आगे नहीं बढ़ सका।
तीसरा दिन: विरोध के बीच ठप रहा कामकाज
तीसरे दिन भी विपक्ष ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। हंगामे के कारण सदन की सामान्य कार्यवाही प्रभावित रही और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी।
नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी प्रभावित
संसद की कार्यवाही रुकने का नुकसान केवल आर्थिक नहीं होता। इससे लोकतंत्र की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती हैं।
- सांसदों को सरकार से सवाल पूछने का अवसर नहीं मिल पाता।
मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा प्रभावित होती है।
नए विधेयकों और नीतियों पर चर्चा में देरी होती है।
जनता से जुड़े मुद्दों को सदन में उठाने का मौका कम हो जाता है।
भविष्य की नीतियों के लिए जरूरी बहस और सुझावों की प्रक्रिया कमजोर होती है।
संसद के खर्च में किन चीजों पर जाता है पैसा?
कई लोगों को लगता है कि संसद का खर्च मुख्य रूप से सांसदों के वेतन और सुविधाओं पर होता है, लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। संसद के संचालन के लिए कई तरह की व्यवस्थाओं पर नियमित खर्च किया जाता है।
इनमें शामिल हैं:
- लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय का संचालन।
अधिकारियों और कर्मचारियों का वेतन।
संसद भवन की सुरक्षा व्यवस्था।
दस्तावेज तैयार करने और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया।
लाइव प्रसारण और तकनीकी सेवाएं।
बिजली, रखरखाव और साफ-सफाई जैसी सुविधाएं।
इन सभी व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए लगातार खर्च होता रहता है, चाहे सदन में कामकाज हो या फिर हंगामे के कारण कार्यवाही प्रभावित हो जाए।
संसद चलना क्यों जरूरी है?
संसद केवल बहस करने की जगह नहीं है, बल्कि यह देश के फैसले लेने का प्रमुख केंद्र है। यहां होने वाली चर्चा से सरकार की जवाबदेही तय होती है और जनता से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का मौका मिलता है। ऐसे में संसद में लगातार व्यवधान होने से जहां करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था के काम करने की गति भी प्रभावित होती है। यही वजह है कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी मानी जाती है।






