भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश जरूरी: विशेषज्ञ
सुलतानपुर। महर्षि विद्या मंदिर में आयोजित सीबीएसई इन-हाउस शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन अनुभवात्मक शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक गुरु पूजा और सामूहिक भावातीत ध्यान से हुई, जिसके बाद शिक्षकों ने पूर्व दिवस की समीक्षा प्रस्तुत की।
प्रधानाचार्य जे.एन. उपाध्याय ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 स्वायत्तता, सुशासन और सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि अनुभवात्मक शिक्षा “करके सीखने” की प्रक्रिया है, जिसमें विद्यार्थी वास्तविक जीवन के अनुभवों के माध्यम से ज्ञान अर्जित करते हैं। यह चिंतन और व्यावहारिक अनुभव पर आधारित शिक्षण प्रणाली है।
मुख्य वक्ता जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) के प्रवक्ता डॉ. हरिओम तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक शिक्षा में समावेश समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चिंतन और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की पहचान होते हैं तथा शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो विद्यार्थियों को केवल ज्ञानवान ही नहीं बल्कि उपयोगी और संस्कारवान भी बनाए।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सत्य की खोज, जीवन मूल्यों, संस्कारों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समन्वय है। दया, करुणा और विश्वास भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं, जिन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने बच्चों को भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने पर भी बल दिया।
डॉ. तिवारी ने व्यावसायिक शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि कौशल विकास और रोजगार सृजन का प्रभावी माध्यम है। बढ़ती बेरोजगारी की चुनौती से निपटने के लिए विद्यार्थियों की प्रतिभा और रुचि के अनुरूप कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना आवश्यक है।
प्रधानाचार्य जे.एन. उपाध्याय ने भी कहा कि व्यावसायिक शिक्षा विद्यार्थियों में कार्यकुशलता विकसित करती है और उन्हें रोजगारोन्मुख बनाती है। उन्होंने कहा कि चेतना के विकास और कार्य के प्रति आत्मिक लगाव से ही निर्णय क्षमता तथा दक्षता का विकास होता है, जिसमें भावातीत ध्यान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कार्यक्रम का समापन सामूहिक भावातीत ध्यान और प्राणायाम के साथ हुआ।








