Shravasti Encounter Case: जिले के इकौना में छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के कथित पुलिस एनकाउंटर मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए CBI जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने प्रथमदृष्टया पुलिस की FIR में दर्ज घटनाक्रम को संदिग्ध मानते हुए कहा कि मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसी से पड़ताल जरूरी है। यह आदेश 13 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने दिया। अदालत ने CBI को FIR संख्या 113/2025 में दर्ज आरोपों और कथित एनकाउंटर की पूरी परिस्थितियों की जांच करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला मई 2025 का है। 9 मई 2025 को इकौना थाने में सात वर्षीय बच्ची को ले जाने के आरोप में FIR दर्ज की गई थी। शुरुआती रिपोर्ट में शफीक नाम के आरोपी और उसके दो अज्ञात साथियों का उल्लेख था। पुलिस के अनुसार, बाद की जांच में छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन का नाम सामने आया। इसके तीन दिन बाद, 12 मई 2025 को तत्कालीन इकौना थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे ने दूसरी FIR दर्ज कराई। पुलिस का दावा था कि अलाउद्दीन नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था। पुलिस के मुताबिक अंधरपुरवा पुल के पास उसे SWAT टीम के साथ घेरा गया। पुलिस की कहानी के अनुसार, आरोपी ने टीम पर गोली चलाने की कोशिश की। इसके जवाब में SHO ने अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्टल से फायर किया और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं। पुलिस ने मौके से तमंचा और कारतूस बरामद करने का भी दावा किया था।
हाईकोर्ट ने पुलिस की कहानी पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस के घटनाक्रम में कई विसंगतियों पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि FIR के मुताबिक 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में थे, तो फिर वही टीम अलग-अलग रास्तों पर तीन हिस्सों में कैसे बंट गई। अदालत ने यह भी सवाल किया कि बाद में मौके पर SWAT टीम समेत कुल 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी बताई गई, लेकिन FIR में दूसरे वाहन का स्पष्ट विवरण क्यों नहीं है। कोर्ट ने इस बात को भी गंभीरता से लिया कि कथित तौर पर 23 पुलिसकर्मियों से घिरे एक व्यक्ति ने गोली चलाई, लेकिन किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं लगी। वहीं, पुलिस के मुताबिक SHO ने करीब 15 मीटर की दूरी से रात के समय दो गोलियां चलाईं और दोनों ही आरोपी के पैरों में लगीं।
मेडिकल रिपोर्ट और शूटिंग क्षमता पर भी सवाल
अदालत ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटों और 9 एमएम गोली के आकार से जुड़े तथ्यों पर भी सवाल किए। SHO की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को अदालत ने प्रथमदृष्टया संतोषजनक नहीं माना। कोर्ट की टिप्पणी में यह बात सामने आई कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि FIR में घटनाक्रम का सही विवरण नहीं दिया गया और अदालत के समक्ष भी मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं की गई। अदालत ने यह भी नोट किया कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को उनके ‘गुड वर्क’ के लिए पुरस्कृत किया गया था।
अलाउद्दीन का पुराना मामला भी चर्चा में
अलाउद्दीन का नाम इससे पहले भी एक गंभीर आपराधिक मामले में सामने आ चुका है। उसे 2012 में छह वर्षीय बच्ची के दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने भी यह सजा बरकरार रखी थी। हालांकि, 28 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। शीर्ष अदालत ने जांच और अभियोजन में गंभीर कमियों का उल्लेख करते हुए कहा था कि पर्याप्त साक्ष्य के बिना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उसके साथ अन्याय है। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने इस पुराने घटनाक्रम का भी उल्लेख किया और संभावना जताई कि सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणियों के कारण पुलिस में आरोपी के प्रति नाराजगी रही हो सकती है।
तीन महीने में जांच पूरी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने CBI निदेशक को जांच के लिए अधिकारी नामित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि जांच को यथासंभव जल्द पूरा किया जाए और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल की जाए। CBI जांच में तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग क्षमता से जुड़े पहलू की भी जांच होगी। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि क्या वह रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज के आधार पर 9 एमएम सर्विस पिस्टल से इतना सटीक निशाना लगा सकते थे। इसके अलावा हाईकोर्ट ने श्रावस्ती के अपर सत्र न्यायाधीश के 2 जुलाई 2026के उस आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है, जिसमें अलाउद्दीन की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। इसके बाद आरोपी को जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह मिलेगा। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।
रिपोर्ट: मनीष श्रीवास्तव





















