भूगोल के गोलार्द्ध को नंगे पैर सरपट नापना आखिर है क्या? यह वाक्य सुनने में जितना अनोखा लगता है, इसका अर्थ उतना ही गहरा और व्यापक है। यहां भूगोल का मतलब केवल नक्शे पर खिंची रेखाओं, देशों, सीमाओं, शहरों और महाद्वीपों से नहीं है। भूगोल उस धरती का नाम है, जिस पर मनुष्य अपना जीवन जीता है। इसमें खेत, कारखाने, बस्तियां, विद्यालय, अस्पताल, सड़कें, झोपड़ियां और वे घर भी शामिल हैं, जहां सपने अभावों से संघर्ष करते हुए आकार लेते हैं। वहीं, ‘गोलार्द्ध’ केवल पृथ्वी के आधे हिस्से का प्रतीक नहीं, बल्कि दुनिया की विशालता और मनुष्य की समस्याओं के व्यापक स्वरूप को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि यदि इतिहास बदलने का संकल्प लिया है, तो अपनी छोटी-सी दुनिया में सिमटकर नहीं रहा जा सकता। उस विशाल जीवन-भूमि तक पहुंचना होगा, जहां वास्तविक मनुष्य अपने संघर्षों, चुनौतियों और उम्मीदों के साथ खड़ा है।
इस पूरे रूपक में ‘नंगे पैर’ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। इसका अर्थ केवल जूते उतारकर चलना नहीं, बल्कि सुविधाओं का कवच उतारना, अहंकार की ऊंचाई से नीचे उतरना और जमीन की सच्चाई को सीधे महसूस करना है। दूर बैठकर किसान को ‘कृषि उत्पादक’ कहना आसान है, लेकिन उसके खेत की मिट्टी में उतरकर उसकी चिंताओं को समझना कठिन है। किसी गरीब को रिपोर्ट में ‘लाभार्थी’ लिख देना आसान है, लेकिन उसके घर की चौखट पर बैठकर उसकी जरूरतों को सुनना मुश्किल है। बेरोजगारी को आंकड़ों में पढ़ना आसान है, मगर किसी बेरोजगार युवक की आंखों में उसके अधूरे भविष्य का दर्द देखना कठिन है। नंगे पैर होना इसी दूरी को मिटाने का नाम है। यह उस भावना का प्रतीक है, जिसमें हम केवल लोगों के बारे में जानना नहीं चाहते, बल्कि उनके बीच जाकर उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना चाहते हैं।
अब बात करते हैं ‘सरपट’ शब्द की। इसका अर्थ है पूरी ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और बिना अनावश्यक विलंब के आगे बढ़ना। यह केवल गति का प्रतीक नहीं, बल्कि तत्काल कर्म करने की भावना को भी दर्शाता है। यदि किसी बच्चे को शिक्षा की जरूरत है, तो केवल शिक्षा पर भाषण देने से काम नहीं चलेगा। उस बच्चे तक पहुंचना होगा। यदि कोई बुजुर्ग अकेला है, तो अकेलेपन पर लेख लिखने भर से उसकी समस्या दूर नहीं होगी। उसके पास बैठकर उसकी बात सुननी होगी। यदि कोई परिवार संकट में है, तो केवल संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। जहां तक संभव हो, सहायता का हाथ बढ़ाना होगा। यानी ‘नंगे पैर’ हमें वास्तविकता से जोड़ते हैं और ‘सरपट’ हमें कर्म की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। संवेदना तभी सार्थक होती है, जब वह किसी सकारात्मक प्रयास का रूप लेती है।
इस पूरे रूपक को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहला है ‘भूगोल’, यानी वास्तविक दुनिया और उसके लोगों के बीच पहुंचना। दूसरा है ‘नंगे पैर’, यानी बिना अहंकार और सुविधाओं की दूरी के वास्तविकता को महसूस करना। तीसरा है ‘सरपट’, यानी उस वास्तविकता को समझने के बाद समाधान के लिए कर्म में जुट जाना। इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजधानियों से नहीं बदलता। वह तब भी बदलता है, जब कोई व्यक्ति अपने समय की पीड़ा को पहचानता है और उसके समाधान के लिए खड़ा होता है। जो केवल समस्या देखता है, वह दर्शक है। जो समस्या को महसूस करता है, वह संवेदनशील है। लेकिन जो समाधान के लिए आगे बढ़ता है, वही कर्मयोगी है। दुनिया का हर कोना नापना जरूरी नहीं है। शुरुआत अपनी गली से कीजिए, फिर अपने गांव और शहर तक पहुंचिए। क्योंकि इतिहास बदलने वाले कदम हमेशा किसी विशाल महाद्वीप से शुरू नहीं होते। कई बार उनकी शुरुआत किसी छोटी-सी गली में रहने वाले एक ऐसे इंसान के दर्द को समझने से होती है, जिसे मदद की जरूरत है। यही इस रूपक का मूल संदेश है—धरती को केवल देखना नहीं, उससे जुड़ना। पीड़ा को केवल जानना नहीं, उसे महसूस करना। और महसूस करके रुकना नहीं, बल्कि समाधान के लिए कर्म के रास्ते पर आगे बढ़ना।
लेखक: डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक – आदर्श संस्कार शाला, भारत





















