फिर लिखे ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ और ‘पहला नशा’ जैसे गीत
नई दिल्ली।
‘मैं अकेले ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।’
इन पंक्तियों के रचयिता मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी में जिंदगी, मोहब्बत और बगावत तीनों के रंग दिखाई देते हैं। एक तरफ उनकी कलम ने ‘पहला नशा’, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’, ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’ और ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ जैसे लोकप्रिय गीतों को जन्म दिया, तो दूसरी तरफ वही कलम सत्ता के खिलाफ लिखने से भी पीछे नहीं हटी।
1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार-उल-हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में थे और उन्होंने बेटे को पारंपरिक शिक्षा दिलाई। मजरूह ने अरबी-फारसी और उर्दू की पढ़ाई की और बाद में लखनऊ के तकमील-उत-तिब कॉलेज से यूनानी चिकित्सा की शिक्षा लेकर हकीम के रूप में काम किया। लेकिन उनकी असली पहचान धीरे-धीरे शायरी बनने लगी।
जिगर मुरादाबादी ने पहचानी प्रतिभा
मुशायरों में मजरूह की शायरी को खूब सराहना मिली। मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्हें अपना शागिर्द बना लिया। 1945 में मुंबई के एक मुशायरे में उनकी शायरी ने फिल्म निर्माता एआर कारदार का ध्यान खींचा। शुरुआत में मजरूह फिल्मों के लिए लिखने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन जिगर मुरादाबादी की सलाह पर उन्होंने यह रास्ता अपनाया।
1946 की फिल्म ‘शाहजहां’ से उन्होंने गीतकार के रूप में शुरुआत की। इसी फिल्म में केएल सहगल की आवाज में ‘जब दिल ही टूट गया’ और ‘गम दिए मुस्तकिल’ जैसे गीत आए। ‘जब दिल ही टूट गया’ को सहगल इतना पसंद करते थे कि उनके अंतिम संस्कार में इसे बजाने की इच्छा का उल्लेख कई स्रोतों में मिलता है।
नेहरू की आलोचना की तो जेल गए
मजरूह की पहचान सिर्फ फिल्मी गीतकार की नहीं थी। वह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर भी बेबाकी से लिखते थे। 1940 के दशक के अंत में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना करते हुए कविता लिखी और सुनाई। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उपलब्ध जीवनी स्रोतों के मुताबिक उनसे माफी मांगने को कहा गया, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया और करीब दो वर्ष जेल में रहे।
जेल और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनकी लेखनी नहीं रुकी। बाहर आने के बाद उन्होंने फिल्मों के लिए लगातार लिखा और हिंदी सिनेमा के सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले गीतकारों में शामिल हो गए।
एक गीतकार, कई पीढ़ियों की आवाज
मजरूह ने अलग-अलग दौर के कलाकारों के लिए गीत लिखे। राज कपूर और दिलीप कुमार से लेकर देव आनंद, शम्मी कपूर, ऋषि कपूर और आमिर खान तक कई सितारों की फिल्मों में उनके गीत लोकप्रिय हुए।
‘दोस्ती’ के गीत ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ के लिए उन्हें 1965 में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला। 1993 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वह यह सम्मान पाने वाले पहले गीतकार बने।
बाद के दौर में भी उनकी कलम युवा पीढ़ी के साथ चलती रही। ‘कयामत से कयामत तक’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘अकेले हम अकेले तुम’ जैसी फिल्मों के गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
आखिरी दौर तक सक्रिय रही कलम
मजरूह सुल्तानपुरी ने शाहरुख खान की फिल्म ‘वन टू का फोर’ के लिए भी गीत लिखे। फिल्म 2001 में रिलीज हुई, जबकि मजरूह का निधन इससे पहले 24 मई 2000 को हो चुका था।
लगभग पांच दशक के लंबे फिल्मी सफर के बाद भी उनकी शायरी और गीत आज की पीढ़ी के बीच सुने जाते हैं। 24 मई 2000 को 80 वर्ष की उम्र में फेफड़ों से जुड़ी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ। उनके जाने के बाद भी उनकी लिखी पंक्तियां और गीत हिंदी सिनेमा की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बने हुए हैं।




















