कृषि नीति किस दिशा में जा रही है?

Ankit Awasthi
Ankit Awasthi

एक तरफ सरकारें देशभर में जल संरक्षण का संदेश देती हैं। मंचों से भूजल संकट, जलवायु परिवर्तन और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पानी बचाने की अपील की जाती है। दूसरी तरफ नीतियों पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। कहीं किसानों को धान छोड़ने के लिए प्रोत्साहन राशि दी जा रही है, तो कहीं उसी धान के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले फैसले लिए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कृषि नीति का वास्तविक लक्ष्य क्या है?

यह केवल किसी एक राज्य या किसी एक विभाग का मामला नहीं है। केंद्र और राज्यों की कई नीतियां ऐसी दिखती हैं, जो एक-दूसरे के विपरीत दिशा में जाती नजर आती हैं। परिणाम यह होता है कि किसान भी असमंजस में रहता है और पर्यावरण संरक्षण के दावे भी कमजोर पड़ते हैं।

सबसे बड़ा सवाल: पानी या उत्पादन?

भारत आज विश्व के सबसे बड़े चावल उत्पादक और निर्यातकों में शामिल है। यह उपलब्धि आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ इसके दूसरे पक्ष की ओर भी ध्यान दिलाते हैं।

धान ऐसी फसल है, जिसकी खेती में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, एक किलोग्राम चावल तैयार करने में औसतन लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी खर्च हो सकता है। यही कारण है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में लगातार गिरते भूजल स्तर को लेकर वर्षों से चिंता जताई जाती रही है।

यदि जल संकट को भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है, तो स्वाभाविक प्रश्न है कि क्या अत्यधिक जल-आधारित खेती के वर्तमान मॉडल पर पुनर्विचार नहीं होना चाहिए?

इथेनॉल नीति ने बढ़ाई बहस

सरकार का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोल आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। शुरुआती वर्षों में यह अपेक्षा व्यक्त की गई थी कि इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का और अन्य अपेक्षाकृत कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे किसानों को वैकल्पिक खेती की ओर प्रोत्साहन मिलेगा।

हालांकि हाल के वर्षों में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के भंडार से इथेनॉल उत्पादन के लिए चावल के आवंटन में वृद्धि ने नई बहस को जन्म दिया है। आलोचकों का तर्क है कि यदि जल संरक्षण प्राथमिकता है, तो अत्यधिक पानी वाली फसल का उपयोग ईंधन उत्पादन में बढ़ाना नीति के उद्देश्यों से मेल नहीं खाता। दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह रहा है कि अतिरिक्त भंडार का उपयोग ऊर्जा सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।

यहीं से नीति पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

किसानों को आखिर कौन-सा संदेश दिया जा रहा है?

दिलचस्प स्थिति यह है कि कुछ राज्य सरकारें किसानों को धान की खेती कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देती हैं। पंजाब, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भूजल संरक्षण के उद्देश्य से किसानों को वैकल्पिक फसलें अपनाने के लिए सहायता राशि देने की योजनाएं लागू की गई हैं।

लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में धान की सरकारी खरीद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के अतिरिक्त बोनस भी दिया जा रहा है। कहीं 500 रुपये प्रति क्विंटल, कहीं 700 रुपये से अधिक और कुछ राज्यों में इससे भी अधिक प्रोत्साहन राशि किसानों को मिल रही है।

ऐसी स्थिति में एक किसान के सामने गणित बिल्कुल साफ होता है। यदि धान पर निश्चित सरकारी खरीद, बेहतर मूल्य और बोनस उपलब्ध है, जबकि मक्का, दलहन या तिलहन की खरीद उतनी सुनिश्चित नहीं है, तो वह जोखिम क्यों उठाए?

किसान बाजार नहीं, बल्कि नीतियों के संकेत पढ़ता है। और फिलहाल संकेत एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं।

नीति में विरोधाभास या अलग-अलग प्राथमिकताएं?

यहीं से असली बहस शुरू होती है। एक दृष्टिकोण यह कहता है कि यह अलग-अलग मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र की अलग प्राथमिकताओं का परिणाम है। ऊर्जा मंत्रालय ऊर्जा सुरक्षा देखता है, कृषि मंत्रालय किसानों की आय, खाद्य मंत्रालय सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राज्य सरकारें स्थानीय राजनीति तथा किसानों के हितों को।

दूसरा दृष्टिकोण यह है कि इन अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच पर्याप्त समन्वय का अभाव है। जब एक विभाग पानी बचाने की रणनीति बना रहा हो और दूसरा उसी फसल की मांग बढ़ा रहा हो, तो दीर्घकालिक लक्ष्य कमजोर पड़ सकते हैं।

सबसे बड़ा नुकसान किसका?

इस पूरी बहस में सबसे अधिक चर्चा सरकारों और नीतियों की होती है, लेकिन वास्तविक असर तीन पक्षों पर पड़ता है।

पहला, पर्यावरण, क्योंकि लगातार गिरता भूजल भविष्य की गंभीर चुनौती है।

दूसरा, किसान, जो हर नई नीति के अनुसार अपनी खेती की योजना बदलने के लिए मजबूर होता है।

और तीसरा, देश की खाद्य एवं जल सुरक्षा, जो आने वाले दशकों में विकास की सबसे बड़ी कसौटी बनने वाली है।

भारत को ऐसी कृषि नीति की आवश्यकता है जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और किसानों की आय—चारों उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

यदि सरकार वास्तव में किसानों को धान से दूसरी फसलों की ओर ले जाना चाहती है, तो केवल प्रोत्साहन राशि पर्याप्त नहीं होगी। मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलों के लिए भी धान जैसी सुनिश्चित सरकारी खरीद, मजबूत बाजार, प्रसंस्करण उद्योग और लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने होंगे।

इसी प्रकार इथेनॉल नीति को भी जल उपलब्धता और फसल विविधीकरण के व्यापक लक्ष्य के साथ जोड़ना होगा। अन्यथा एक ओर जल संरक्षण के अभियान चलेंगे और दूसरी ओर उन्हीं नीतियों से पानी पर दबाव बढ़ता रहेगा।

नीतियां तब सबसे प्रभावी होती हैं जब वे एक-दूसरे का समर्थन करें, न कि एक-दूसरे को कमजोर बनाएं। भारत जैसे जल-संकट की ओर बढ़ते देश में कृषि, पानी और ऊर्जा को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा राष्ट्रीय रणनीति के रूप में देखने की आवश्यकता है। यही संतुलन भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।

 

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