अमृत उजाला
जब स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक भाषण की शुरुआत “Sisters and Brothers of America” (मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों) से की थी, तब पूरा सभागार कई मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। वह केवल एक संबोधन नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति, विनम्रता, संवेदनशीलता और संवाद की शक्ति का परिचय था। भारत ने दुनिया को शब्दों की गरिमा, विचारों की स्वतंत्रता और असहमति की सभ्यता सिखाई है।
आज यही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है क्या हम उसी भारत के उत्तराधिकारी हैं?
आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और उसका सम्मान होना चाहिए। उनकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए, क्योंकि असहमति किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। लेकिन इस आंदोलन के दौरान कुछ युवाओं के हाथों में दिखाई दे रही तख्तियों पर लिखे शब्द और कुछ नारों में इस्तेमाल की गई भाषा गंभीर चिंता पैदा करती है। उन तख्तियों पर लिखी अभद्र और अश्लील भाषा भारतीय आंदोलनों की उस परंपरा से मेल नहीं खाती, जिस पर हमें हमेशा गर्व रहा है।
भारत के आंदोलनों का इतिहास कभी ऐसी भाषाई दरिद्रता का साक्षी नहीं रहा। इस देश ने महात्मा गांधी का सत्याग्रह देखा है, जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन देखा है, स्वतंत्रता संग्राम देखा है और अनेक छात्र आंदोलनों का इतिहास देखा है। मतभेद तीखे रहे, संघर्ष भी हुए, लेकिन विरोध की ताकत हमेशा विचारों, तर्कों और नैतिक बल से निकली, गालियों और व्यक्तिगत अपमान से नहीं। असहमति हमारी शक्ति है, लेकिन अश्लीलता कभी हमारी संस्कृति नहीं रही।
लोकतंत्र में सरकारों से सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है। आंदोलन, प्रदर्शन और विरोध किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान हैं। लेकिन जब विरोध की आवाज़ गालियों, अश्लीलता और व्यक्तिगत अपमान में बदलने लगे, तब चिंता केवल एक आंदोलन की नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज की हो जाती है।
भारत की पहचान कभी भाषाई दरिद्रता से नहीं रही। यह वह देश है जहां वाद-विवाद, शास्त्रार्थ और तर्क की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। यहां भगवान बुद्ध ने संवाद किया, आदि शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ किए, महात्मा गांधी ने सत्याग्रह किया और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से असहमति को सम्मानजनक स्थान दिया। किसी ने भी गाली को विचार का विकल्प नहीं बनाया।
आज सोशल मीडिया के दौर में स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। लाइक्स, व्यूज़ और वायरल होने की होड़ में भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसा वातावरण बन गया है जिसमें संयम को कमजोरी और अभद्रता को बहादुरी समझा जाने लगा है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर हिस्से में दिखाई देने लगी है।
सबसे अधिक चिंता इसलिए है क्योंकि यह वही युवा पीढ़ी है, जिसके हाथों में भारत का भविष्य है। आज जो छात्र सड़कों पर हैं, वही कल प्रशासन चलाएंगे, न्याय करेंगे, डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, शिक्षक, सैनिक और जनप्रतिनिधि बनेंगे। यदि उनकी भाषा में सम्मान नहीं होगा, यदि असहमति व्यक्त करने की मर्यादा समाप्त हो जाएगी, तो भविष्य का सार्वजनिक विमर्श कैसा होगा? आज जिन हाथों में ऐसी तख्तियां हैं, कल उन्हीं हाथों में इस देश की बागडोर होगी। इसलिए यह केवल आज का मुद्दा नहीं, आने वाले भारत का प्रश्न है।
यह किसी एक संगठन, किसी एक विचारधारा या किसी एक आंदोलन का प्रश्न नहीं है। गाली किसी भी पक्ष से आए, वह लोकतंत्र को कमजोर करती है। विरोध जितना प्रखर हो, उसकी भाषा उतनी ही परिपक्व होनी चाहिए। क्योंकि विचार से जीती गई लड़ाई स्थायी होती है, जबकि अपशब्द केवल क्षणिक शोर पैदा करते हैं।
परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। विद्यालयों को केवल डिग्री नहीं, संस्कार भी देने होंगे। सोशल मीडिया मंचों और कंटेंट क्रिएटर्स को भी यह समझना होगा कि करोड़ों युवा उन्हें देखकर सीखते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
भारत की आत्मा उसकी सभ्यता में बसती है। हमारी शक्ति हमारे शब्दों में रही है, हमारी संस्कृति हमारी भाषा में रही है। यदि भाषा ही कटुता, अपमान और अश्लीलता का माध्यम बन जाएगी, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही देश है जिसने दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया, जिसने हर मतभेद को संवाद से सुलझाने की परंपरा विकसित की। इसलिए आज आवश्यकता विरोध को दबाने की नहीं, बल्कि उसकी भाषा को ऊंचा उठाने की है।
जंतर-मंतर पर उठ रही आवाज़ों को देश सुने, लेकिन उन आवाज़ों की भाषा भी ऐसी हो जिस पर आने वाली पीढ़ियां गर्व कर सकें। आंदोलन की ताकत उसकी गालियों में नहीं, उसके तर्क, उसके संयम और उसके नैतिक बल में होती है।
क्योंकि भारत की पहचान शोर से नहीं, शब्दों की गरिमा से बनती है। यदि आने वाली पीढ़ी को सचमुच मजबूत बनाना है, तो उन्हें गाली नहीं, तर्क; कटुता नहीं, संस्कृति; और अपमान नहीं, संवाद की भाषा सिखानी होगी।
यही स्वामी विवेकानंद के भारत की पहचान है। यही हमारे लोकतंत्र की असली शक्ति है।
डॉ अखंड प्रताप सिंह







