प्रणय विक्रम सिंह
जब-जब मनुष्य अपने भीतर हारने लगता है, तब-तब राम कथा उसके भीतर एक नया अयोध्या रचती है।
जब विश्वास डगमगाता है, वह संबल बनती है। जब संबंध बिखरते हैं, वह मर्यादा का सेतु बन जाती है। जब स्वार्थ, सत्य पर भारी पड़ने लगता है, तब राम कथा स्मरण कराती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय किसी और पर नहीं, स्वयं पर होती है।
समय बदलता है, युग बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं लेकिन मनुष्य के भीतर उठने वाले प्रश्न कभी नहीं बदलते। सत्य या असत्य? कर्तव्य या सुविधा? त्याग या स्वार्थ? मर्यादा या मनमानी? इन्हीं शाश्वत प्रश्नों का कालजयी उत्तर है…*राम कथा।*
राम कथा इतिहास का आख्यान भर नहीं, मनुष्य के अंतर्मन का दर्पण है।यह मनुष्य के भीतर सोई हुई मर्यादा को जगाने की साधना है। यह हमें भगवान बनने का नहीं, पहले एक श्रेष्ठ मनुष्य बनने का मार्ग दिखाती है। इसलिए राम कथा जितनी अयोध्या की है, उतनी ही प्रत्येक हृदय की भी है।
जब जीवन निर्णयों के दोराहे पर खड़ा होता है, राम कथा विवेक बनकर साथ चलती है। जब संबंध स्वार्थ के बोझ तले टूटने लगते हैं, वह प्रेम, त्याग और समर्पण का अर्थ समझाती है। जब अहंकार मनुष्य को स्वयं से दूर ले जाने लगता है, वह विनम्रता का प्रकाश बनती है। जब अन्याय चुनौती देता है, वह साहस जगाती है। और जब निराशा मन को घेर लेती है, तब राम कथा विश्वास का वह दीप प्रज्वलित करती है, जिसकी लौ कभी नहीं बुझती।
राम कथा इसलिए प्रासंगिक नहीं है कि वह हजारों वर्षों से कही जा रही है, वह इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि हर युग उसमें स्वयं को देख लेता है। परिवार बिखरते हैं तो राम परिवार को जोड़ने की प्रेरणा बनते हैं। समाज विभाजित होता है तो राम निषादराज, केवट, शबरी और वानर सेना को गले लगाकर समरसता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सत्ता जब अधिकार का माध्यम बनती है, तब राम उसे लोकमंगल का दायित्व बना देते हैं। शक्ति जब अहंकार बनती है, तब राम उसे धर्म के अनुशासन में बांध देते हैं।
राम कथा केवल अतीत का स्मरण नहीं, वर्तमान का मार्गदर्शन और भविष्य का निर्माण है। यह बताती है कि किसी राष्ट्र की महानता उसकी संपत्ति से नहीं, उसके चरित्र से मापी जाती है और चरित्र का निर्माण मर्यादा, करुणा, सत्य, न्याय और त्याग से होता है।
इसीलिए राम कथा सुनना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह स्वयं से मिलने की यात्रा है। यह अपने भीतर झांकने का अवसर है। यह स्वयं से पूछने का साहस है कि मैं कैसा पुत्र हूं? कैसा भाई हूं? कैसा मित्र हूं? कैसा नागरिक हूं? कैसा शासक हूं? और सबसे बढ़कर, कैसा मनुष्य हूं?
जब तक मनुष्य रहेगा, उसके भीतर संघर्ष रहेगा। जब तक संघर्ष रहेगा, तब तक राम कथा उसकी सबसे विश्वसनीय पथप्रदर्शक बनी रहेगी। क्योंकि राम कथा कानों से कम, अंतर्मन से अधिक सुनी जाती है। वह शब्दों में नहीं ठहरती, संस्कार बनकर जीवन में उतरती है। वह कथा समाप्त होने पर भी समाप्त नहीं होती। वह मनुष्य के विचारों, व्यवहार और चरित्र में जीवित रहती है।इसीलिए राम कथा सुनिए। प्रभु श्री राम को जानने के लिए नहीं, अपने भीतर छिपे राम को जगाने के लिए। क्योंकि जहां राम कथा हृदय में उतरती है, वहां मनुष्य बदलता है और जहां मनुष्य बदलता है, वहीं से युग बदलने की शुरुआत होती है।







