वी पी राहुल
पंजाब एक बार फिर सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। जालंधर और अमृतसर में सैन्य और सीमा सुरक्षा बल से जुड़े संवेदनशील इलाकों के पास हुए दो धमाकों ने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि खालिस्तानी उग्रवाद की वापसी को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। इन घटनाओं के बाद खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (केएलए) नामक संगठन ने सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेने का दावा किया है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां अभी इन दावों की पुष्टि में जुटी हैं, लेकिन घटनाक्रम ने पंजाब सहित पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर ला दिया है।
5 मई 2026 की रात जालंधर स्थित बीएसएफ पंजाब फ्रंटियर मुख्यालय के बाहर धमाका हुआ। शुरुआती जांच में सामने आया कि एक स्कूटर के पास विस्फोटक सामग्री रखी गई थी, जिससे जोरदार धमाका हुआ। इस घटना में आसपास की संपत्ति को नुकसान पहुंचा और एक युवक घायल हुआ। लगभग उसी समय अमृतसर के खासा सैन्य क्षेत्र के पास भी विस्फोट की घटना सामने आई। दोनों घटनाओं ने यह संकेत दिया कि ये कोई सामान्य दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि योजनाबद्ध कार्रवाई हो सकती हैं।
घटना के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्टर वायरल हुआ, जिसमें खालिस्तान लिबरेशन आर्मी ने जालंधर धमाके की जिम्मेदारी ली। पोस्टर में कहा गया कि यह हमला “ऑपरेशन नवा सवैर” के तहत किया गया है। संगठन ने दावा किया कि यह कार्रवाई 19 वर्षीय रंजीत सिंह की मौत का बदला है, जिसकी फरवरी 2026 में गुरदासपुर में पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई थी। पुलिस का आरोप था कि रंजीत सिंह ने पाकिस्तान सीमा के पास दो पुलिसकर्मियों की हत्या की थी, जबकि परिवार ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
केएलए द्वारा जारी कथित पोस्टर में वरिष्ठ बीएसएफ अधिकारियों को धमकी भी दी गई। हालांकि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने संगठन के कई दावों को अतिरंजित बताया है। अधिकारियों ने साफ किया कि धमाके में किसी सुरक्षाकर्मी की मौत नहीं हुई। इसके बावजूद, इस तरह का खुला दावा सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
इन घटनाओं के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) भी सक्रिय हो गई है। फोरेंसिक टीमें घटनास्थल से सबूत जुटा रही हैं, सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और संदिग्धों से पूछताछ की जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जालंधर धमाके के बाद एक व्यक्ति को घटनास्थल से भागते हुए सीसीटीवी में देखा गया है। पुलिस ने दो लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की है, जिनमें स्कूटर मालिक भी शामिल बताया जा रहा है।
जांच एजेंसियां इस पूरे मामले में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की संभावित भूमिका की भी जांच कर रही हैं। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि धमाकों का समय और शैली ऐसे संकेत देते हैं कि इसके पीछे सीमा पार से समर्थन प्राप्त नेटवर्क हो सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि पंजाब में ड्रोन, हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी के जरिए कट्टरपंथी नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की कोशिश की जा रही है।
दरअसल, खालिस्तान आंदोलन का इतिहास पंजाब के लिए बेहद दर्दनाक रहा है। 1980 और 1990 के दशक में राज्य ने आतंकवाद का लंबा दौर देखा था। उस समय हजारों लोगों की जान गई थी और पंजाब की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई थी। बाद में पुलिस और सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई से उग्रवाद पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विदेशों, खासकर कनाडा और ब्रिटेन में सक्रिय कुछ कट्टरपंथी समूहों के जरिए खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में फिर तेजी देखी गई है। सोशल मीडिया ने भी इस विचारधारा को प्रचारित करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
हालांकि यह भी सच है कि पंजाब के अधिकांश लोग और सिख समुदाय का बड़ा हिस्सा हिंसा और अलगाववाद का समर्थन नहीं करता। सोशल मीडिया और ऑनलाइन चर्चाओं में भी कई लोगों ने यह कहा कि खालिस्तान आंदोलन को पंजाब में व्यापक जनसमर्थन नहीं है और इसे विदेशों से हवा दी जा रही है। कई यूजर्स ने पाकिस्तान समर्थित तत्वों और विदेशों में बैठे कट्टरपंथी नेटवर्क पर आरोप लगाए। हालांकि इंटरनेट पर मौजूद प्रतिक्रियाओं को पूरी तरह तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन वे सामाजिक माहौल और लोगों की चिंता जरूर दिखाती हैं।
इन धमाकों के बाद पंजाब की राजनीति भी गर्म हो गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इन घटनाओं के पीछे राजनीतिक साजिश की आशंका जताई, जबकि विपक्ष ने राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था संभालने में विफल रहने का आरोप लगाया। राजनीतिक बयानबाजी के बीच आम जनता में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। खासकर इसलिए क्योंकि धमाके बीएसएफ और सैन्य प्रतिष्ठानों के पास हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब की स्थिति को केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। राज्य लंबे समय से बेरोजगारी, नशे की समस्या और युवाओं में बढ़ती निराशा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। कट्टरपंथी संगठन अक्सर ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाकर युवाओं को अपने नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश करते हैं। इसलिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी मजबूत रणनीति की जरूरत है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये घटनाएं केवल अलग-थलग हमले हैं या फिर पंजाब में किसी बड़े नेटवर्क की सक्रियता का संकेत। जांच एजेंसियां अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची हैं, लेकिन यह साफ है कि राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई चुनौती सामने आई है। आने वाले दिनों में एनआईए और पंजाब पुलिस की जांच यह तय करेगी कि इन धमाकों के पीछे वास्तव में कौन लोग और कौन-सी ताकतें सक्रिय थीं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—पंजाब ने आतंकवाद का दर्द पहले भी झेला है और राज्य दोबारा उस दौर में लौटना नहीं चाहता। इसलिए सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और समाज—तीनों के लिए यह समय बेहद सतर्क रहने का है।




