डाक्टर दीपक गोस्वामी
मां बाप हमारी अदृश्य सुरक्षा छत कवच है, जो घर की बुनियाद थे, आज उसी घर की दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर हो गए हैं। फ्रेम है, माला है, पर बात करने वाला कोई नहीं। वृद्धावस्था अब उम्र का पड़ाव नहीं रही, तिरस्कार का टिकट बन गई है। वृद्धाश्रम की देहरी पर बढ़ती भीड़ किसी भूकंप से कम नहीं। कौन जिम्मेदार है, यह सवाल जहर की तरह फैल गया है, और हर कोई दूसरे के गिलास में देख रहा है।
पहले आंगन था, अब बालकनी है। पहले दालान में चारपाई थी, अब फ्लैट में बेडरूम की कुंडी है। बेटा कमाने निकला, बहू करियर बनाने निकली, पोता कोचिंग में फंसा। पीछे रह गए दो बूढ़े हाथ जो कभी पालना झुलाते थे। आर्थिक गणित ऐसा बदला कि रिश्ते बैलेंस शीट बन गए। मां बाप की दवाई, डाक्टर, थरमामीटर, सब खर्च की लाइन में लिखे जाने लगे। पेंशन है नहीं, जमा पूंजी बच्चों की फीस में बह गई, खेत बिक गए, मकान गिरवी हो गया। उधर संपत्ति है तो रिश्ते और सड़ गए। वसीयत की स्याही सूखने से पहले भाई भाई की आंख में खून उतर आता है। बेटा कैलेंडर पर बाप की उम्र गिनता है। यह मौद्रिक लोभ ही असली नकली का फर्क मिटा देता है। चेहरे पर मुस्कान, दिल में हिसाब।
सामाजिक ताना बाना देखो। कभी गांव की चौपाल रोकती थी, मोहल्ले की दादी टोकती थी। आज निजता के नाम पर सबके दरवाजे बंद हैं। बंद दरवाजों के पीछे संवेदना का दम घुट रहा है। रिश्ता अब धर्म नहीं, डील है। फायदे तक साथ, घाटा दिखा तो राम राम। मोबाइल में पांच सौ दोस्त, पर बुखार में माथे पर पट्टी रखने वाला एक नहीं। फेसबुक पर मदर्स डे की कविता, घर में मां की थाली पर से मक्खी उड़ाने वाला कोई नहीं। यह दोहरा चरित्र ही सबसे बड़ा धोखा है।
वैदिक बात करें तो मातृदेवो भव पितृदेवो भव दीवार पर टंगा पोस्टर बन गया। श्रवण कुमार की मूर्ति मंदिर में है, घर में नहीं। कर्म का सिद्धांत जुबान पर है, करनी में नहीं। हमने पढ़ लिया कि जो बोओगे वही काटोगे, पर बोते वक्त आंख बंद कर लेते हैं। परालौकिक डर खत्म हो गया। पहले लगता था कि मां बाप को रुलाएंगे तो अगला जन्म खराब होगा। अब अगला जन्म किसने देखा, इसी जन्म में एसी चाहिए। दैविक भय गया तो नैतिक रीढ़ भी टूट गई। स्कूल से नैतिक शिक्षा निकली, कोचिंग में रैंक घुसी। नंबर लाओ, इंसानियत गई तेल लेने।
मनोविज्ञान की खिड़की खोलो। रिटायर होते ही आदमी की कीमत गिर जाती है। दफ्तर की कुर्सी गई, घर की खाट पर भी जगह नहीं मिलती। बोलो तो दखल, चुप रहो तो बोझ। धीरे धीरे जुबान पर ताला पड़ जाता है। अवसाद, भूलने की बीमारी, अकेलापन, ये सब शरीर से पहले आत्मा को खाते हैं। विज्ञान कहता है कि बुजुर्ग को छुअन चाहिए, बात चाहिए, आंखों में इज्जत चाहिए। हमारे पास वक्त कहां। फ्लैट में दो कमरे हैं, तीसरा कमरा दिल में होना चाहिए था, वह बन ही नहीं पाया।
राजनीति और कूटनीति की फाइल पलटो। कानून है। रखरखाव अधिनियम दो हजार सात कहता है कि बेटा नहीं पालेगा तो जेल जाएगा। हेल्पलाइन एक चार पांच छह सात बनी है। अक्टूबर दो हजार चौबीस से सत्तर पार के सबको पांच लाख का आयुष्मान बीमा मिला। अटल वयो अभ्युदय योजना चल रही है। पर कानून मां के आंसू रोक नहीं पाता। कौन मां बाप अपने जिगर के टुकड़े को कटघरे में खड़ा देखना चाहेगा। इसलिए हजार केस में दस भी दर्ज नहीं होते। वोट बैंक जवानी है, बुढ़ापा नहीं। इसलिए बजट में उनकी लाइन सबसे आखिर में छपती है।
वृद्धाश्रम का सच भी दो रंग का है। सरकारी आंकड़ा कहता है छह सौ तीन आश्रम हैं, चौरासी और खुलेंगे। राजस्थान में इकतीस आश्रमों की जांच हाई कोर्ट ने खुद बैठकर करवाई। नोएडा में छब्बीस जून दो हजार पच्चीस को चालीस बुजुर्ग बिना कपड़े के, गंदे बिस्तर पर मिले। रजिस्ट्रेशन तक नहीं था। यानी सेवा के नाम पर सौदा भी चल रहा है। महीने के तीस हजार लो और बुजुर्ग को कमरे में बंद कर दो। दूसरी तरफ कई बच्चे मजबूर हैं। चौबीस घंटे की नर्स, फिजियो, डाक्टर, घर में रखना उनके बस का नहीं। वे रोते हुए छोड़कर जाते हैं। तो हर वृद्धाश्रम जेल नहीं, और हर बेटा कंस नहीं। असली नकली का फर्क यहां भी है।
तो जिम्मेदार कौन। उंगली एक पर नहीं उठेगी। जिम्मेदार वह सोच है जिसने कामयाबी को सिर्फ बैंक बैलेंस से नापा। जिम्मेदार वह शिक्षा है जिसने डॉक्टर इंजीनियर तो दिए, श्रवण नहीं दिए। जिम्मेदार वह शहर है जिसने मकान तो ऊंचे कर दिए, मन छोटा कर दिया। जिम्मेदार वह सरकार है जो योजना तो बनाती है, निगरानी भूल जाती है। और जिम्मेदार मैं भी हूं, तुम भी हो। हमने सुविधा को पूजा, संबंध को भुला दिया। हमने एलेक्सा से बात कर ली, मां से नहीं की।
अब इलाज क्या है। कानून की लाठी से ज्यादा परिवार की थाली काम आएगी। बुजुर्ग को आर्थिक मजबूती दो। पेंशन, बीमा, उनके हुनर का इस्तेमाल। रिटायर टीचर मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाए, रिटायर फौजी सुरक्षा समिति चलाए। घर में संवाद की मेज फिर बिछाओ। खाना साथ खाओ, टीवी बंद करके बात करो। बच्चों को दादा दादी की गोद दो, कहानी दो, डांट भी दो। इज्जत अपने आप लौट आएगी। वृद्धाश्रम रहें, पर मजबूरी में नहीं, मर्जी में। जब बुजुर्ग खुद कहे कि मुझे अपने जैसे लोगों के साथ रहना है, तब।
रिश्तों की कच्ची कलियां हम रोज मसल रहे हैं। उन्हें पानी दो। वरना कल जब हमारी बारी आएगी, यही सन्नाटा हमारे कमरे में भी उतरेगा। मां बाप कोई चैप्टर नहीं जो कोर्स से निकल जाए। वे पूरी किताब हैं। प्रस्तावना भी वही, उपसंहार भी वही। जिस घर में उनकी जिल्द साबुत है, उस घर की उम्र लंबी है, बरकत गहरी है।
आज नवाचार यही है कि हम लौट चलें। पीछे नहीं, जड़ की तरफ। बटन वाले रिश्तों से दिल वाले रिश्तों की तरफ। वरना तरक्की की लिफ्ट हमें उस मंजिल पर ले जाएगी जहां सब कुछ होगा, पर अपना कहने वाला कोई नहीं होगा। और उस दिन समझ आएगा कि सबसे महंगा नुकसान मुफ्त में मिला था, मां बाप का साथ।




