उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 में कठोर संशोधन की आवश्यकता

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“अवैध निर्माण पर केवल बुलडोज़र नहीं, प्रशासनिक लापरवाही पर दण्डात्मक कानून चाहिए।”

उत्तर प्रदेश के नगरों में बढ़ते अवैध निर्माण केवल भवन नियमों के उल्लंघन का विषय नहीं हैं, बल्कि वे शहरी प्रशासन, नियामकीय व्यवस्था तथा सरकारी उत्तरदायित्व की गम्भीर विफलता का दर्पण बन चुके हैं। वर्तमान स्थिति में मुख्य दोष प्रायः केवल निर्माणकर्ता पर डाल दिया जाता है, जबकि अधिकारियों की समयबद्ध निष्क्रियता, निरीक्षण में विफलता, प्रवर्तन में शिथिलता तथा संभावित मिलीभगत पर कानून लगभग मौन दिखाई देता है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कोई भी अवैध निर्माण अचानक खड़ा नहीं हो जाता। वह चरणबद्ध रूप से विकसित होता है— भूमि खुदाई से लेकर नींव, स्तंभ, ढाँचा, मंज़िलें, प्लास्टर, विक्रय और कब्ज़े तक। यदि यह सब विकास प्राधिकरणों, नगर निकायों और सम्बन्धित अधिकारियों की आँखों के सामने होता रहे, तो इसे केवल “चूक” नहीं कहा जा सकता; यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक लापरवाही, नियामकीय विफलता तथा विधिक कर्तव्य के पालन में असफलता का विषय बन जाता है।

फिर भी उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 में ऐसी प्रशासनिक विफलताओं के लिए प्रत्यक्ष, कठोर एवं व्यक्तिगत दण्ड व्यवस्था लगभग अनुपस्थित है।

अब समय आ गया है कि इस अधिनियम में व्यापक और संरचनात्मक सुधार किए जाएँ।

I. अधिनियम में नया अध्याय जोड़ा जाए — “अवैध विकास एवं निर्माण के मामलों में प्रशासनिक उत्तरदायित्व”

अधिनियम में एक पृथक अध्याय जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें स्पष्ट किया जाए—

“जहाँ किसी अवैध विकास, अवैध निर्माण अथवा भूमि उपयोग उल्लंघन को निर्धारित समयावधि के भीतर चिन्हित, रोका अथवा नियंत्रित नहीं किया गया हो, वहाँ सम्बन्धित अधिकारी के प्रशासनिक उत्तरदायित्व की जाँच अनिवार्य होगी।”

इस प्रकार का प्रावधान अधिकारियों पर सतर्कता एवं समयबद्ध प्रवर्तन का वैधानिक दायित्व स्थापित करेगा।

II. नई धारा — “समयबद्ध पहचान एवं निवारक प्रवर्तन का वैधानिक दायित्व”

अधिनियम में नई धारा जोड़ी जानी चाहिए जिसके अनुसार—

प्रत्येक नामित प्रवर्तन अधिकारी पर यह अनिवार्य वैधानिक दायित्व होगा कि वह किसी भी प्रथमदृष्टया अवैध निर्माण की पहचान करे, उसका अभिलेखीकरण करे, निरीक्षण करे तथा निर्धारित समयसीमा में रोकथामात्मक कार्रवाई प्रारम्भ करे।

इस हेतु निम्न समयसीमाएँ निर्धारित की जा सकती हैं—

  • अवैध निर्माण की सूचना, शिकायत या जानकारी प्राप्त होने के 7–15 दिनों के भीतर निरीक्षण अनिवार्य हो।
  • 15 दिनों के भीतर कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए।
  • 30 दिनों के भीतर रोकथाम, सीलिंग या प्रारम्भिक प्रवर्तन कार्रवाई की जाए।

इन समयसीमाओं का उल्लंघन स्वयं में प्रथम दृष्टया प्रशासनिक दुराचरण माना जाए।

III. “प्रशासनिक लापरवाही की विधिक धारणा” लागू की जाए

यदि कोई अवैध निर्माण पर्याप्त रूप से विकसित हो जाता है, तो कानून में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि सम्बन्धित अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक लापरवाही की प्रारम्भिक विधिक धारणा उत्पन्न होगी।

अर्थात् यदि किसी क्षेत्र में विशाल या विकसित अवैध निर्माण पाया जाता है, तो यह मान लिया जाए कि सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा समय पर निगरानी या कार्रवाई नहीं की गई, जब तक कि वे इसके विपरीत पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत न कर दें।

इससे समस्त प्रमाणभार केवल शिकायतकर्ता पर नहीं रहेगा।

IV. अधिकारियों की व्यक्तिगत आर्थिक उत्तरदायित्व व्यवस्था

आज की विडम्बना यह है कि—

पहले अधिकारी समय पर कार्रवाई नहीं करते,
फिर अवैध निर्माण पूर्ण हो जाता है,
और उसके बाद जेसीबी, बुलडोज़र, पुलिस बल, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात नियंत्रण, ईंधन एवं प्रशासनिक संसाधनों पर भारी सार्वजनिक व्यय किया जाता है।

यह वस्तुतः प्रशासनिक विफलता से उत्पन्न परिहार्य सार्वजनिक व्यय है।

अतः अधिनियम में यह प्रावधान होना चाहिए कि—

जहाँ प्रशासनिक लापरवाही सिद्ध हो, वहाँ ध्वस्तीकरण, पुलिस तैनाती तथा प्रवर्तन कार्यवाही में हुए सार्वजनिक व्यय का उपयुक्त भाग दोषी अधिकारियों से वसूल किया जा सके।

सरकारी धन असीमित संसाधन नहीं है कि पहले प्रशासन सोता रहे और बाद में जनता के कर से विध्वंस अभियान चलाए जाएँ।

V. विभागीय दण्ड व्यवस्था को वैधानिक रूप दिया जाए

अधिनियम में ही स्पष्ट दण्ड व्यवस्था जोड़ी जानी चाहिए, जैसे—

  • सेवा अभिलेख में प्रतिकूल प्रविष्टि,
  • वेतनवृद्धि रोका जाना,
  • अनिवार्य विभागीय जांच,
  • निलंबन,
  • पदावनति,
  • गंभीर मामलों में सेवा से पृथक्करण।

केवल स्थानांतरण किसी प्रशासनिक विफलता का न्यायोचित उत्तर नहीं हो सकता।

VI. भ्रष्टाचार एवं मिलीभगत के मामलों में आपराधिक उत्तरदायित्व

जहाँ जानबूझकर अनदेखी, अनुचित लाभ, अवैध संरक्षण या भ्रष्ट मिलीभगत के संकेत हों, वहाँ मामला केवल विभागीय कार्यवाही तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, भारतीय दण्ड विधि के प्रासंगिक प्रावधानों तथा लोक न्यास सिद्धान्त के अनुरूप आपराधिक अभियोजन की वैधानिक सम्भावना स्पष्ट रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

VII. नागरिक प्रवर्तन तंत्र की स्थापना

अनेक मामलों में नागरिक शिकायतें फाइलों और कार्यालयी प्रक्रियाओं में दब जाती हैं।

इसलिए कानून में निम्न व्यवस्थाएँ जोड़ी जानी चाहिए—

  • डिजिटल शिकायत पोर्टल,
  • प्रत्येक शिकायत हेतु ट्रैकिंग संख्या,
  • उत्तर देने की अनिवार्य समयसीमा,
  • स्वतः उच्चस्तरीय अग्रसारण व्यवस्था।

नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त होना चाहिए कि प्रशासनिक निष्क्रियता की स्थिति में वे उच्च प्राधिकारी अथवा स्वतंत्र जवाबदेही निकाय के समक्ष अपील कर सकें।

VIII. स्वतंत्र शहरी नियोजन जवाबदेही आयोग की स्थापना

यह व्यवस्था न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती कि कोई विकास प्राधिकरण अपनी ही विफलताओं की स्वयं जाँच करे।

अतः एक स्वतंत्र शहरी नियोजन जवाबदेही आयोग या प्रकोष्ठ की स्थापना की जानी चाहिए, जो—

  • प्रवर्तन विफलताओं,
  • प्रशासनिक लापरवाही,
  • नियामकीय निष्क्रियता,
  • अवैध निर्माण संरक्षण तंत्र

की स्वतंत्र जाँच कर सके।

IX. “लोक पद पर दुरुपयोग एवं कर्तव्य उल्लंघन” की अवधारणा का विधायी समावेशन

यदि कोई अधिकारी अपने विधिक दायित्व का जानबूझकर पालन नहीं करता, अथवा अवैध निर्माण को बढ़ने देता है, तो नागरिकों, खरीदारों तथा राज्य को हुए नुकसान के लिए उसकी उत्तरदायित्व व्यवस्था कानून में स्पष्ट रूप से सम्मिलित की जानी चाहिए।

सार्वजनिक पद अधिकार का स्रोत अवश्य है, परन्तु उससे कहीं अधिक वह उत्तरदायित्व का पद है।

निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश को प्रतिक्रियात्मक बुलडोज़र शासन नहीं, जवाबदेह एवं निवारक शहरी प्रशासन चाहिए

किसी राज्य की शहरी नीति की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसने कितने बुलडोज़र चलाए; बल्कि इससे मापी जानी चाहिए कि उसने अवैध निर्माणों को प्रारम्भिक अवस्था में ही रोकने की कितनी क्षमता विकसित की।

जब तक उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 अधिकारियों की प्रशासनिक लापरवाही, निरीक्षण-विफलता और नियामकीय निष्क्रियता पर कठोर, व्यक्तिगत एवं दण्डात्मक उत्तरदायित्व लागू नहीं करेगा, तब तक अवैध निर्माण, बाद की ध्वस्तीकरण कार्रवाई तथा सार्वजनिक धन की बर्बादी का यह दुष्चक्र समाप्त नहीं होगा।

अब समय आ गया है कि कानून केवल नागरिकों को नियंत्रित करने का माध्यम न रहे, बल्कि सत्ता, प्रशासन और नियामकीय संस्थाओं को भी समान रूप से वैधानिक जवाबदेही के दायरे में लाए।

शिखर
अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।

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