इमामबाड़ों में सुपुर्द-ए-खाक किए गए ताजिए
गाजीपुर, 26 जून। जनपद में 10वीं मोहर्रम के अवसर पर अकीदत, गम और अनुशासन के माहौल में मोहर्रम के जुलूस निकाले गए। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों ताजिए अपने निर्धारित मार्गों से होते हुए इमामबाड़ों तक पहुंचे, जहां धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। पूरे आयोजन के दौरान जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पूरी तरह मुस्तैद रहा। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने स्वयं संवेदनशील क्षेत्रों में भ्रमण कर सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया।
इस्लामी परंपरा के अनुसार 10 मोहर्रम (यौमे आशूरा) का दिन कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जब हजरत मुहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने सत्य, न्याय और इंसाफ की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। मुस्लिम समाज इस दिन को शहादत और गम की याद में मनाता है तथा विभिन्न स्थानों पर मातमी जुलूस निकालता है।
गाजीपुर में भी विभिन्न ताजिया समितियों द्वारा परंपरागत रूप से ताजिए निकाले गए। जुलूसों के दौरान अकीदतमंदों ने मातम किया और इमामबाड़ों में पहुंचकर ताजियों को सुपुर्द-ए-खाक किया।
विशेश्वरगंज स्थित इमामबाड़े से निकला ताजिया लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। यहां अपेक्षाकृत छोटे आकार का ताजिया निकाला गया, जिसके आगे ‘दुलदुल’ का प्रतीकात्मक घोड़ा भी चल रहा था। ताजियादार कमेटी के सदस्य डॉ. आजम कादरी ने बताया कि कर्बला की जंग में इमाम हुसैन के साथ उनके घोड़े ‘दुलदुल’ की भी शहादत हुई थी। इसी स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए प्रत्येक वर्ष ताजिए के साथ दुलदुल का प्रतीकात्मक घोड़ा निकाला जाता है।
धार्मिक जानकारों के अनुसार, सुन्नी समुदाय में ताजियों के सुपुर्द-ए-खाक होने के साथ मोहर्रम की प्रमुख रस्में संपन्न हो जाती हैं, जबकि शिया समुदाय में गम और मातम का सिलसिला अगले 40 दिनों तक जारी रहता है।








