हाल ही में अभिनेत्री कैटरीना कैफ एक बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव समारोह में नजर आईं तो उनके अभिनय या करियर की उपलब्धियों से ज्यादा सोशल मीडिया पर उनके चेहरे और लुक्स की चर्चा होने लगी। उम्र के साथ चेहरे में आए स्वाभाविक बदलावों को लेकर उन्हें जिस तरह ट्रोल किया गया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर महिलाओं को हर उम्र में एक तय खूबसूरती के पैमाने पर खरा उतरने की मजबूरी क्यों है? यह सिर्फ एक अभिनेत्री की कहानी नहीं है। यह उस सोच की तस्वीर है, जिसमें महिला की पहचान, उसकी प्रतिभा और उसके अनुभव से पहले उसका चेहरा और शरीर देखा जाता है। ऐसे माहौल में जब कुछ चर्चित सितारे उनके समर्थन में सामने आते हैं, तो राहत जरूर मिलती है, लेकिन सवाल यह भी है कि किसी महिला को अपनी स्वाभाविक उम्र और शरीर के लिए बचाव की जरूरत आखिर क्यों पड़े।
यह समस्या मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं है। फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के लिए भूमिकाओं के विकल्प अक्सर कम होते जाते हैं। कई अभिनेत्रियों को एक निश्चित उम्र के बाद मुख्य भूमिकाओं से हटाकर मां, भाभी या अन्य सहायक किरदारों तक सीमित कर दिया जाता है। दूसरी तरफ पुरुष कलाकार लंबे समय तक मुख्य भूमिकाओं में बने रहते हैं और उम्र का बढ़ना उनके लिए अनुभव, परिपक्वता या व्यक्तित्व का हिस्सा माना जाता है। महिलाओं के लिए वही उम्र अक्सर उनके करियर की सीमा बन जाती है। यह अंतर सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई नहीं देता, बल्कि समाज की सोच में भी गहराई से मौजूद है।
सोशल मीडिया ने इस दोहरे मापदंड को और बढ़ा दिया है। आज किसी तस्वीर के नीचे कुछ सेकंड में ऐसी टिप्पणियां आ जाती हैं, जो किसी के आत्मविश्वास को लंबे समय तक चोट पहुंचा सकती हैं। झुर्रियां, वजन, बालों का रंग, त्वचा या चेहरे की बनावट तक सार्वजनिक बहस का विषय बना दिए जाते हैं। महिलाओं से एक ऐसी ‘परफेक्ट बॉडी’ और ‘हमेशा जवान’ दिखने की उम्मीद की जाती है, जो वास्तविक जीवन से ज्यादा सोशल मीडिया के फिल्टर और दिखावे की दुनिया में मौजूद है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यही मानसिकता धीरे-धीरे किशोरियों और युवा महिलाओं के भीतर भी अपने शरीर को लेकर असुरक्षा पैदा करती है।
बॉडी शेमिंग और एज शेमिंग का असर सिर्फ किसी मशहूर चेहरे तक सीमित नहीं रहता। आम कामकाजी महिलाओं पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्हें अक्सर यह महसूस कराया जाता है कि उनकी कीमत उनकी योग्यता से ज्यादा उनके रूप-रंग से तय होती है। उम्र बढ़ने के साथ कपड़े, वजन, चेहरे और यहां तक कि उनकी जीवनशैली पर भी टिप्पणियां होने लगती हैं। इस तरह महिला का शरीर उसके अपने अस्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा होने के बजाय दूसरों की समीक्षा का विषय बन जाता है। यही वजह है कि सुंदरता के तय मानकों पर सवाल उठाना केवल फैशन या ग्लैमर की बहस नहीं, बल्कि सम्मान और समानता की बहस भी है।
समय आ गया है कि हम महिलाओं को आईने की नजर से नहीं, उनकी पहचान और उपलब्धियों की नजर से देखें। उम्र किसी व्यक्ति की कमी नहीं, बल्कि उसके अनुभवों का हिस्सा है। शरीर समय के साथ बदलता है और यही स्वाभाविक जीवन प्रक्रिया है। किसी महिला को उसके चेहरे की रेखाओं, वजन या उम्र के आधार पर आंकने के बजाय उसके काम, सोच और योगदान को महत्व देना ही वास्तविक समानता की दिशा में कदम होगा। महिलाओं को बराबरी का हकदार बनाने की बात तभी सार्थक होगी, जब उन्हें हर उम्र और हर रूप में सम्मान के साथ स्वीकार किया जाए।
— मालिनी श्रीवास्तव





















