औरैया। सेंगर नदी में तीन बच्चों की मौत के मामले में फांसी की सजा पाने वाली प्रियंका को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने बुधवार को सेशन कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए प्रियंका और उसके साथ आरोपी आशीष उर्फ डैनी को बरी कर दिया। अदालत ने मामले में अभियोजन पक्ष की कहानी, आठ वर्षीय जीवित बचे बेटे की गवाही और पुलिस की विवेचना में कई खामियां पाईं। वहीं, फैसले के बाद जब प्रियंका के मायके में उसके पिता प्रमोद से बात की गई तो उन्होंने बेटी को अपनाने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना है कि भले ही प्रियंका बरी हो गई हो, लेकिन उनके घर में उसके लिए कोई जगह नहीं है।
मामला 27 जून 2024 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रियंका अपने चार बच्चों को लेकर सेंगर नदी पहुंची थी, जहां बच्चों को पानी में डुबोने का आरोप लगा था। इस घटना में तीन बच्चों सोनू, आदित्य, माधव और मंगल में से आदित्य, माधव और मंगल की मौत हो गई, जबकि आठ वर्षीय सोनू बच गया था। सोनू ने अदालत में अपनी मां के खिलाफ गवाही दी थी। इसके आधार पर 10 जुलाई 2025 को सेशन कोर्ट ने प्रियंका को फांसी और आशीष उर्फ डैनी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
हाईकोर्ट ने फैसले में सोनू की गवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसके बयान में कई विरोधाभास थे और उस पर सिखाए-पढ़ाए जाने का प्रभाव दिखाई देता है। अदालत ने यह भी सवाल किया कि यदि प्रियंका तीन बच्चों की हत्या करना चाहती थी तो उसने सबसे बड़े बेटे को जीवित क्यों छोड़ा। इसके अलावा पुलिस की विवेचना में भी कई कमियां सामने आईं। घटना की पहली सूचना देने वाले ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया और सोनू का बयान घटना के दिन के बजाय आठ दिन बाद दर्ज किया गया। अदालत ने बच्चों के चाचा की गवाही को भी पर्याप्त विश्वसनीय नहीं माना।
प्रियंका की शादी 2009 में इटावा के लुईया गांव निवासी अवनीश से हुई थी और उनके चार बेटे थे। वर्ष 2020 में करंट लगने से अवनीश की मौत हो गई थी। इसके बाद प्रियंका अपने चचेरे देवर आशीष उर्फ डैनी के साथ रहने लगी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, बच्चों की परवरिश को लेकर दोनों के बीच विवाद होता था। प्रियंका की चाची गीता देवी ने बताया कि उन्होंने करीब डेढ़ साल की उम्र से प्रियंका की परवरिश की थी और वह जेल में उससे मिलने भी गई थीं। वहीं, एसपी अभिषेक भारती ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले की आदेश प्रति मिलने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा। यदि विवेचना में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।





















