अमेरिका के आरोप से बढ़ी चिंता, जानिए कैसे सामने आया मामला
वॉशिंगटन/बीजिंग। अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक रिश्तों में नरमी के संकेतों के बावजूद परमाणु हथियारों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। अमेरिका ने आरोप लगाया है कि चीन ने वर्ष 2020 में अपने परमाणु परीक्षण स्थल लोप नूर के आसपास एक गुप्त कम-क्षमता वाला परमाणु विस्फोट किया था। अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी दावा किया है कि चीन भविष्य में सैकड़ों टन क्षमता वाले परीक्षणों की तैयारी कर रहा है।
हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। परमाणु परीक्षणों की निगरानी करने वाली व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO) की अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली ने 22 जून 2020 को लोप नूर के आसपास दो छोटे भूकंपीय घटनाक्रम दर्ज किए थे, लेकिन संगठन ने कहा है कि उपलब्ध आंकड़ों से उनके कारण के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
नमक की गुफा का क्या मतलब है?
परमाणु विस्फोट को जमीन के भीतर गहरी सुरंग या प्राकृतिक गुफा जैसी संरचना में करने पर उसकी भूकंपीय तरंगों को कमजोर किया जा सकता है। इसे ‘डिकपलिंग’ तकनीक कहा जाता है। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि चीन ने इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल करके कथित गतिविधि को अंतरराष्ट्रीय निगरानी से छिपाने की कोशिश की।
लोप नूर चीन के शिनजियांग क्षेत्र में स्थित उसका प्रमुख परमाणु परीक्षण परिसर है। चीन ने 1964 में पहला परमाणु परीक्षण इसी क्षेत्र में किया था। उसका अंतिम घोषित परमाणु विस्फोटक परीक्षण 1996 में हुआ था।
अमेरिका को कैसे पता चला?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण सुराग भूकंपीय निगरानी से मिला। 22 जून 2020 को अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली ने लोप नूर के आसपास दो छोटे भूकंपीय घटनाक्रम दर्ज किए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इनकी प्रकृति सामान्य भूकंप या खनन से होने वाले विस्फोट से अलग थी।
अमेरिकी अधिकारियों ने बाद में दावा किया कि इन घटनाओं का संबंध चीन के गुप्त परमाणु परीक्षण से था। फरवरी 2026 में अमेरिकी अधिकारियों ने पहली बार सार्वजनिक रूप से 2020 की इस घटना को संभावित परमाणु विस्फोट के रूप में पेश किया।
हालांकि CTBTO के मुताबिक घटनाओं का स्तर इतना कम था कि उपलब्ध भूकंपीय आंकड़ों से यह तय नहीं किया जा सकता कि उनका कारण परमाणु विस्फोट था या कुछ और। नॉर्वे की भूकंपीय निगरानी संस्था NORSAR ने भी उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर छोटे प्राकृतिक भूकंप की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है।
सैटेलाइट तस्वीरों ने भी बढ़ाया संदेह
लोप नूर में पिछले वर्षों में निर्माण गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी गई है। सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में नई सुरंगें, ड्रिलिंग गतिविधियां, सड़कें, निर्माण क्षेत्र और भूमिगत सुविधाओं से जुड़े संभावित ढांचे दिखाई दिए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इन गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि चीन अपने परमाणु परीक्षण परिसर का विस्तार कर रहा है। लेकिन केवल नई सुरंगों या निर्माण कार्यों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वहां परमाणु विस्फोट की तैयारी ही हो रही है।
अगर गुप्त परमाणु परीक्षण हुआ तो खतरा क्या है?
परमाणु परीक्षण का सबसे बड़ा रणनीतिक असर यह होगा कि दुनिया की प्रमुख परमाणु शक्तियों के बीच दशकों से चली आ रही परीक्षण-नियंत्रण व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। कम क्षमता वाले परीक्षणों से भी नए हथियार डिजाइन और मौजूदा परमाणु हथियारों की क्षमताओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की जा सकती है।
इसके अलावा, यदि एक देश गुप्त या कम-क्षमता वाले परमाणु परीक्षण शुरू करता है और दूसरे देश भी जवाब में परीक्षण की तैयारी करते हैं, तो इससे परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ने की आशंका पैदा होती है।
हालांकि यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि ‘सब-क्रिटिकल’ प्रयोग और वास्तविक परमाणु विस्फोट एक ही चीज नहीं हैं। सब-क्रिटिकल प्रयोग में ऐसी स्थिति नहीं बनाई जाती जिसमें स्वतः चलने वाली परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया शुरू हो। वहीं कम-क्षमता वाला परमाणु परीक्षण परमाणु विस्फोटक ऊर्जा उत्पन्न करता है।
चीन ने क्या कहा?
अमेरिका के आरोपों को चीन ने खारिज किया है। उपलब्ध विशेषज्ञ विश्लेषणों में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि 2020 की भूकंपीय घटनाओं को अकेले देखकर यह निर्णायक रूप से साबित नहीं किया जा सकता कि चीन ने परमाणु विस्फोट किया था। साथ ही लोप नूर में चल रही निर्माण गतिविधियों को लेकर भी यह स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि उनका उद्देश्य आगामी परमाणु विस्फोटक परीक्षण ही है।
इसलिए फिलहाल इस पूरे मामले को अमेरिकी आरोप, भूकंपीय घटनाओं और लोप नूर में बढ़ती गतिविधियों से जुड़े गंभीर संदेह के रूप में देखा जा रहा है, न कि चीन के नए परमाणु परीक्षण की स्वतंत्र रूप से पुष्ट खबर के रूप में।




















