वर्ष भर हम दूसरों के व्यवहार का हिसाब रखते रहते हैं—किसने क्या कहा, किसने हमारा सम्मान किया और किसने हमें दुख पहुँचाया। लेकिन पर्युषण का पर्व हमें कुछ क्षण ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। तब सवाल यह नहीं रहता कि दूसरों ने हमारे साथ क्या किया, बल्कि यह होता है कि हमारे शब्दों, व्यवहार और कर्मों से किसी दूसरे के मन को कहीं ठेस तो नहीं पहुँची। यदि बीते वर्ष में हमसे जाने-अनजाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी का हृदय दुखा हो, किसी को अपमानित किया हो या हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा मिली हो, तो इस पावन अवसर पर हम विनम्र होकर क्षमा माँगते हैं—मिच्छामि दुक्कडम। उत्तम क्षमा। अपराध क्षमस्व मे।
क्षमा माँगना केवल एक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि अपने अहंकार के सामने खड़े होने का साहस है। मनुष्य जब यह स्वीकार करता है कि “मुझसे भी भूल हो सकती है”, तभी आत्मबोध की शुरुआत होती है। जैन परंपरा में पर्युषण आत्मावलोकन, संयम, तप और क्षमा की साधना का पर्व है। श्वेताम्बर परंपरा में पर्युषण और दिगंबर परंपरा में दशलक्षण धर्म के माध्यम से आत्मशुद्धि पर विशेष बल दिया जाता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के अन्य स्रोतों में भी मनुष्य द्वारा अपने ज्ञात-अज्ञात दोषों के लिए शुद्धि और क्षमा की प्रार्थना दिखाई देती है। मनुस्मृति में क्षमा को धर्म के प्रमुख गुणों में स्थान मिला है और गीता में भी इसे दैवी संपदा का अंग बताया गया है। अलग-अलग परंपराओं के अपने दार्शनिक आधार हैं, लेकिन आत्मसंयम, प्रायश्चित और अंतःशुद्धि का भाव भारतीय चिंतन में गहराई से दिखाई देता है।
सच्ची क्षमा केवल शब्दों में नहीं होती। “यदि मेरी किसी बात से आपको बुरा लगा हो तो क्षमा करें” कहना आसान है, लेकिन वास्तविक क्षमा तब शुरू होती है जब हम साफ-साफ स्वीकार करते हैं—मुझसे भूल हुई, मेरे शब्दों से आपको चोट पहुँची और मुझे इसका खेद है। क्षमा माँगने के बाद अपने व्यवहार में परिवर्तन ही उसकी सबसे बड़ी कसौटी है। इसी तरह क्षमा देना भी अन्याय को सही ठहराना नहीं है। अपराध को अपराध कहना और न्याय की माँग करना आवश्यक हो सकता है, लेकिन अपने भीतर वर्षों तक द्वेष ढोते रहना आवश्यक नहीं। न्याय व्यवस्था का विषय हो सकता है, पर मन का बोझ हमारा अपना होता है। जहाँ संभव हो, क्षमा माँगें; जहाँ उचित हो, क्षमा दें और जहाँ दूरी बनाए रखना आवश्यक हो, वहाँ भी मन में वैर को स्थायी स्थान न दें।
आज जब संदेश कुछ ही क्षणों में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाता है, तब भी कई बार अपने ही किसी करीबी से बात करने में महीनों बीत जाते हैं। हमारे हाथ में आधुनिक उपकरण हैं, लेकिन मन में जमा नाराज़गी कई बार वर्षों पुरानी होती है। शायद मन के लिए किसी ‘रीस्टार्ट’ बटन की जरूरत नहीं; क्षमा ही वह बटन है, जो भीतर जमी कठोरता को धीरे-धीरे पिघला सकती है। इस क्षमावाणी पर केवल एक संदेश भेजकर आगे न बढ़ें। उस व्यक्ति को याद करें जिसे हमने दुख दिया, और उस व्यक्ति को भी जिसने हमें दुख दिया। जहाँ संभव हो, एक कदम आगे बढ़ाएँ। क्योंकि क्षमा का सबसे सुंदर अर्थ सामने वाले को बदलना नहीं, बल्कि अपने भीतर की गाँठ खोलना है। मस्तक झुकता है तो अहंकार टूटता है, और जब ‘मैं’ थोड़ा छोटा होता है, तब ‘हम’ के लिए जगह बनती है। किसी के प्रति मेरे मन, वचन या कर्म से कोई अपराध हुआ हो तो—मिच्छामि दुक्कडम।



















