वाराणसी। प्लास्टिक कचरे की समस्या से निपटने और सड़क निर्माण को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में आईआईटी (बीएचयू), वाराणसी के शोधकर्ताओं ने एक नई स्वदेशी तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के जरिए बेकार प्लास्टिक को सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली उपयोगी सामग्री में बदला जा सकता है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के सहयोग से विकसित इस तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है। इसका प्रायोगिक इस्तेमाल राष्ट्रीय राजमार्ग-44 के झांसी-ललितपुर खंड पर किया गया है।
आईआईटी (बीएचयू) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अंकित गुप्ता और उनकी शोध टीम ने वेस्ट प्लास्टिक मॉडिफाइड बिटुमेन (W-PMB 76-10) तैयार करने के लिए वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित वेट-प्रोसेस तकनीक विकसित की है। इसके तहत अनुपयोगी एलडीपीई प्लास्टिक को पेलेट के रूप में तैयार कर बिटुमेन में मिलाया जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए 24 सितंबर 2026 को एनएच-44 पर करीब एक किलोमीटर लंबी दो लेन की प्रायोगिक सड़क बनाई गई। इसके निर्माण में लगभग 1,350 किलोग्राम अनुपयोगी प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ है।
इस तकनीक का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने के साथ सड़क की मजबूती और टिकाऊपन को बेहतर बनाना है। संशोधित बिटुमेन से अधिक तापमान और भारी वाहनों के दबाव के कारण सड़क पर पड़ने वाले पहियों के निशान और विकृति को कम करने की संभावना है। हालांकि, तकनीक की वास्तविक उपयोगिता का आकलन सड़क पर यातायात और मौसम के प्रभावों की नियमित निगरानी के बाद किया जाएगा। इस परियोजना में एआर थर्मोसेट्स प्राइवेट लिमिटेड ने तकनीक को औद्योगिक स्तर पर विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है।
आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि यह पहल प्रयोगशाला में हुए शोध को वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान में बदलने की संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। वहीं, प्रो. अंकित गुप्ता ने बताया कि एनएच-44 पर किया गया परीक्षण तकनीक के प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराएगा। शोध टीम सड़क की संरचनात्मक स्थिति, टिकाऊपन और अन्य इंजीनियरिंग मानकों की नियमित जांच करेगी। इसके साथ ही उद्योगों और संबंधित संस्थाओं से आगे आकर अतिरिक्त मैदानी परीक्षणों में भाग लेने की अपील की गई है, ताकि अलग-अलग परिस्थितियों में तकनीक की उपयोगिता का आकलन किया जा सके।





















