वैदिक जीवन-दृष्टि, मनोविज्ञान और नागरिक सुरक्षा का संगम — भारत में कब, कहाँ, कैसे और किसलिए आवश्यक है आपदा की तैयारी?
आपदा आने पर तैयारी शुरू करना बुद्धिमानी नहीं, मजबूरी है। असली बुद्धिमानी है कि संकट आने से पहले परिवार, घर और समाज को इतना सक्षम बना दिया जाए कि कठिन समय में घबराहट नहीं, समझदारी काम आए।
दुनिया आज एक महत्वपूर्ण संदेश दे रही है—बी रेडी, अर्थात तैयार रहिए। यूरोपीय आयोग ने 26 मार्च 2025 को अपनी तैयारी रणनीति में नागरिकों को कम से कम 72 घंटे तक अपनी बुनियादी आवश्यकताएँ स्वयं पूरी करने योग्य बनाने पर जोर दिया। इसका अर्थ तीसरे विश्वयुद्ध की घोषणा नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं, महामारी, युद्ध, साइबर हमलों और आवश्यक सेवाओं में व्यवधान जैसी परिस्थितियों के प्रति दूरदर्शी तैयारी है।
भारत के लिए यह विचार नया नहीं होना चाहिए। हमारी पारंपरिक गृहस्थी में अनाज का सुरक्षित भंडारण, वर्षा के लिए जल-संचय, आवश्यक औषधियों की उपलब्धता और कठिन समय में पड़ोसियों की सहायता जीवन का हिस्सा रहे हैं। घर की अनाज वाली बरनी, सुरक्षित पेयजल और सामूहिक सहयोग इसी व्यावहारिक समझ के उदाहरण हैं।
आज आवश्यकता है कि इस परंपरागत दूरदर्शिता को आधुनिक विज्ञान, मनोविज्ञान और नागरिक सुरक्षा के साथ जोड़कर फिर से जीवन का हिस्सा बनाया जाए।
कब करें तैयारी?
उत्तर है—जब परिस्थितियाँ सामान्य हों, तभी।
बाढ़ आने के बाद पानी, भूकंप के बाद सुरक्षित स्थान और बिजली जाने के बाद टॉर्च खोजने का समय नहीं मिलता। आपदा किसी तारीख, मौसम या हमारी सुविधा देखकर नहीं आती।
इसलिए प्रत्येक परिवार प्रतिदिन कुछ मिनट अपनी तैयारी की जाँच करे। पीने का पानी, आवश्यक दवाइयाँ, टॉर्च, मोबाइल चार्ज, पावर बैंक और आपातकालीन संपर्क सूची उपलब्ध हैं या नहीं, यह देखना पर्याप्त शुरुआत है।
मौसम विभाग की चेतावनियों और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों पर ध्यान देना भी इसी तैयारी का हिस्सा है।
कहाँ करें तैयारी?
सबसे पहले अपने घर से।
प्रत्येक परिवार एक निर्धारित स्थान पर आपातकालीन थैला और आवश्यक सामग्री रखे।
पानी और भोजन: सुरक्षित पेयजल, सत्तू, चना, भुना अनाज, बिस्कुट और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले खाद्य पदार्थ रखें। शिशुओं और विशेष आहार लेने वाले सदस्यों की जरूरतों का भी ध्यान रखें।
औषधियाँ: प्राथमिक उपचार पेटी, पट्टियाँ, रुई, ओआरएस और परिवार के सदस्यों की नियमित निर्धारित दवाइयाँ रखें। दवाओं की समाप्ति तिथि जाँचते रहें।
प्रकाश और संचार: टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियाँ, पावर बैंक, बैटरी वाला रेडियो, सीटी और लिखित संपर्क सूची रखें।
दस्तावेज: पहचान पत्र, बीमा, बैंक और चिकित्सा संबंधी महत्वपूर्ण कागजात की प्रतियाँ जलरोधी थैले में सुरक्षित रखें।
विशेष आवश्यकताएँ: बुजुर्गों, दिव्यांग व्यक्तियों, छोटे बच्चों और पालतू पशुओं के लिए अलग व्यवस्था करें।
स्वास्थ्य मंत्रालय की आपातकालीन तैयारी संबंधी सलाह में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पाँच लीटर पानी तथा कम से कम तीन दिन के भोजन और पानी की व्यवस्था का उल्लेख है। चार सदस्यों के परिवार के लिए इस मानक से तीन दिन में 60 लीटर पानी का लक्ष्य बनता है। यह मुख्यतः पेयजल का न्यूनतम भंडार है। खाना पकाने और स्वच्छता के लिए अतिरिक्त पानी चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन आपातकालीन परिस्थितियों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 15 लीटर पानी उपलब्ध कराने को एक सामान्य योजना मानक बताता है। वास्तविक आवश्यकता जलवायु, स्वास्थ्य, उपलब्ध सुविधाओं और आपदा की अवधि के अनुसार बदल सकती है। इसलिए पानी का सुरक्षित भंडारण और शुद्धता दोनों महत्वपूर्ण हैं।
कैसे करें तैयारी? तीन आधारभूत सूत्र
पहला : वैदिक जीवन-दृष्टि और विवेकपूर्ण संचय
भारतीय जीवन-दर्शन में संयम, दूरदर्शिता, श्रम, प्रकृति के प्रति सम्मान और लोककल्याण को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। संसाधनों का आवश्यकता के अनुसार उपयोग और उनका संरक्षण इसी जीवन-दृष्टि के व्यावहारिक आधार हैं।
लेकिन आवश्यकता का संचय और जमाखोरी अलग-अलग बातें हैं। परिवार के लिए कुछ दिनों का सुरक्षित खाद्य भंडार रखना उचित है, लेकिन बाजार से अनावश्यक सामान खरीदकर दूसरों के लिए संकट पैदा करना अनुचित है।
अन्न का नियमित उपयोग, जल का स्वच्छ भंडारण और औषधियों की समय-समय पर जाँच इस व्यवस्था को प्रभावी बनाते हैं।
दूसरा : मनोविज्ञान और अभ्यास
आपदा के समय भय और भ्रम व्यक्ति की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए परिवार को संकट की परिस्थितियों का अभ्यास कराना चाहिए।
बच्चों को खेल-खेल में भूकंप के समय सुरक्षित रहने, आग लगने पर बाहर निकलने और आपातकालीन संपर्क करने की जानकारी दें। परिवार के सभी सदस्यों को निकासी मार्ग और मिलने का निर्धारित स्थान पता होना चाहिए।
बुजुर्गों तथा दिव्यांग सदस्यों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी पहले से तय करें।
मनोवैज्ञानिक तैयारी का उद्देश्य भय को नकारना नहीं, बल्कि भय के बावजूद सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।
तीसरा : सामाजिक सहयोग
आपदा के समय अकेला परिवार असहाय हो सकता है, लेकिन संगठित समुदाय बेहतर ढंग से सामना कर सकता है।
मोहल्ले और गाँव में यह जानकारी होनी चाहिए कि किस घर में बुजुर्ग अकेले रहते हैं, कहाँ छोटे बच्चे हैं और किसे नियमित चिकित्सा सहायता चाहिए।
स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार जानने वाले व्यक्तियों, वाहन उपलब्ध कराने वालों और जरूरतमंदों की सहायता करने वाले युवाओं की पहचान करें।
ग्राम पंचायत, आवासीय समिति और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर सुरक्षित निकासी मार्ग तथा सहायता समूह तैयार कर सकती हैं।
भारत में यह तैयारी क्यों आवश्यक है?
भारत की भौगोलिक विविधता उसे अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
भारत सरकार के उपलब्ध जोखिम संबंधी आकलनों के अनुसार देश का लगभग 58.6 प्रतिशत भूभाग विभिन्न स्तरों के भूकंपीय जोखिम में है। लगभग 12 प्रतिशत भूभाग बाढ़ एवं नदी कटाव के जोखिम में है। लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी तटरेखा में करीब 5,700 किलोमीटर क्षेत्र चक्रवात और सुनामी के जोखिम से प्रभावित हो सकता है। लगभग 68 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि सूखे के प्रति संवेदनशील बताई गई है।
ये जोखिम संबंधी आकलन हैं, किसी निश्चित समय पर आपदा आने की भविष्यवाणी नहीं।
हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप और भूस्खलन, नदी घाटियों में बाढ़, तटीय क्षेत्रों में चक्रवात तथा अनेक राज्यों में सूखा और लू गंभीर चुनौतियाँ हैं। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र की तैयारी वहाँ के स्थानीय जोखिम के अनुसार होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त तीन परिस्थितियाँ विशेष ध्यान माँगती हैं।
तकनीकी व्यवधान: बिजली, जलापूर्ति, बैंकिंग, परिवहन और संचार व्यवस्था परस्पर जुड़ी हैं। लंबे समय तक बिजली बाधित होने पर इन सेवाओं पर असर पड़ सकता है। इसलिए थोड़ी नकदी, लिखित संपर्क सूची और वैकल्पिक प्रकाश व्यवस्था उपयोगी है।
स्वास्थ्य संकट: कोरोना महामारी ने बताया कि सामान्य जीवन की व्यवस्थाएँ अचानक बाधित हो सकती हैं। स्वच्छता, सुरक्षित पानी, नियमित दवाइयाँ और प्रमाणित चिकित्सा सलाह ऐसी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हैं।
सूचना संबंधी संकट: आपदा के समय अफवाहें और गलत संदेश तेजी से फैलते हैं। इसलिए केवल अधिकृत सरकारी सूचनाओं पर भरोसा करें और बिना सत्यापन कोई संदेश आगे न भेजें।
72 घंटे का सिद्धांत : जिम्मेदार नागरिकता
यूरोपीय संघ की 2025 की रणनीति में नागरिकों को कम से कम 72 घंटे की बुनियादी आत्मनिर्भरता के लिए तैयार रहने का संदेश दिया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार 72 घंटे तक सहायता नहीं करेगी। इसका आशय है कि बड़ी आपदा में राहत पहुँचने और सामान्य सेवाएँ बहाल होने में समय लग सकता है। उस अवधि में परिवार के पास पानी, भोजन, दवाइयाँ, प्रकाश और संपर्क के साधन होने चाहिए।
72 घंटे की तैयारी एक न्यूनतम आपातकालीन लक्ष्य है। परिवार अपनी परिस्थितियों और स्थानीय जोखिम के अनुसार सात दिन तक की अतिरिक्त व्यवस्था भी बना सकता है। यह अतिरिक्त सावधानी है, कोई सार्वभौमिक सरकारी अनिवार्यता नहीं।
भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की अपनी व्यवस्थाएँ हैं। नागरिकों को अपने जिले की आपदा योजना, सुरक्षित आश्रय स्थलों और चेतावनी व्यवस्था की जानकारी रखनी चाहिए।
भारत का एकीकृत आपातकालीन सहायता नंबर 112 अपने मोबाइल में सुरक्षित रखें।
आपदा के समय कुछ जरूरी सावधानियाँ
– भूकंप के समय झुकें, सिर और गर्दन ढकें तथा मजबूत सहारे को पकड़ें।
– बाढ़ के पानी में पैदल या वाहन लेकर प्रवेश न करें।
– आग लगने पर लिफ्ट का उपयोग न करें और सुरक्षित निकासी को प्राथमिकता दें।
– गैस रिसाव की आशंका हो तो बिजली के स्विच न चलाएँ, आग न जलाएँ और सुरक्षित स्थान पर पहुँचें।
– आकाशीय बिजली के समय खुले मैदान, पेड़ों और जलाशयों से दूर रहें।
– पीने के पानी के संदूषण की आशंका हो तो प्रशासन की सलाह के अनुसार पानी उबालें या प्रमाणित शोधन विधि अपनाएँ।
– किसी भी परिस्थिति में प्रशिक्षित बचावकर्मियों और प्रशासन के निर्देशों की अवहेलना न करें।
बी रेडी : भय नहीं, जीवन का अनुशासन
आपदा की तैयारी केवल घर में सामान रखने का नाम नहीं है। यह परिवार को जागरूक, बच्चों को प्रशिक्षित, युवाओं को जिम्मेदार और समाज को सहयोगी बनाने की प्रक्रिया है।
विद्यालयों में नागरिक सुरक्षा का अभ्यास हो, ग्राम पंचायतों में स्थानीय जोखिम की जानकारी उपलब्ध हो, नगरों में सुरक्षित निकासी मार्ग निर्धारित हों और सामाजिक संस्थाएँ प्राथमिक उपचार तथा जनजागरण का प्रशिक्षण दें।
हमारी संस्कार शिक्षा में भी यह समझ शामिल होनी चाहिए कि स्वयं की रक्षा करना, परिवार की सहायता करना और संकट में जरूरतमंदों के साथ खड़ा होना सामाजिक जिम्मेदारी है।
याद रखिए, आपदा आने के बाद तैयारी का समय नहीं मिलता। इसलिए आज ही अपने घर का आपातकालीन थैला तैयार कीजिए, परिवार को सुरक्षित रहने का अभ्यास कराइए और पड़ोसियों के साथ सहयोग की व्यवस्था बनाइए।
बी रेडी का अर्थ युद्ध की आशंका में जीना नहीं, जीवन की अनिश्चितताओं के लिए विवेकपूर्ण तैयारी करना है। बंकर नहीं, बुद्धि चाहिए; भय नहीं, अभ्यास चाहिए; जमाखोरी नहीं, जिम्मेदारी चाहिए।
आइए, संकल्प लें—
हम स्वयं तैयार रहेंगे, परिवार को सक्षम बनाएँगे, अफवाहों से बचेंगे और जरूरत के समय दूसरों की सहायता करेंगे।
यही सच्ची नागरिकता है, यही सामाजिक धर्म है और यही बी रेडी का भारतीय संदेश है।
लेखक : डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक
समन्वयक — आदर्श संस्कार शाला, भारत
संस्कारवान व्यक्ति, सशक्त परिवार, जागरूक समाज और विश्वकल्याण।





















