डाक्टर दीपक गोस्वामी
भाई शब्द केवल चार अक्षरों का मेल नहीं है, यह सृष्टि का वह स्पंदन है जहाँ उपकार का हिसाब नहीं रखा जाता, सहकार की सांस चलती है। उपकार में अहसान का बोझ होता है, सहकार में कंधे का सहारा होता है। भाई उपकार नहीं करता, वह साथ चलता है, गिरने से पहले हाथ थाम लेता है और गिर जाओ तो उठने तक जमीन पर बैठ जाता है। माँ की कोख से जन्मा हो या समय की कोख से जुड़ा हो, भाई का धर्म एक ही है — निभाना।
भगवान जब धरती पर प्रेम भेजना चाहता है तो उसे रिश्तों का नाम दे देता है। उन रिश्तों में सबसे अनमोल उपहार है भाई। यह उपहार दुकान से नहीं मिलता, प्रार्थना से उतरता है। जिसके पास भाई है, उसके पास भगवान का भेजा हुआ जीवित कवच है। अँधेरा जब चारों ओर से घेर ले, तब भाई दिया नहीं बनता, वह खुद अँधेरा चीर कर रास्ता बन जाता है। वह कहता नहीं कि डरो मत मैं हूँ, वह चुपचाप साथ चलता है ताकि तुम्हें लगे कि डरने वाली कोई बात ही नहीं।
भक्त, भगवान और भाई — तीन नाम हैं, पर प्रकृति एक है। तीनों में विश्वास की मिट्टी है और समर्पण का जल। भक्त भगवान से माँगने नहीं जाता, उसे निहारने जाता है। भगवान भक्त की परीक्षा नहीं लेता, उसे संभालता है। भाई भी यही करता है। वह तुम्हारी कमजोरी गिनाता नहीं, उसे ढक देता है। वह तुम्हारी हार पर ताना नहीं मारता, तुम्हारे साथ बैठकर नई जीत की योजना बनाता है। इसलिए ज्ञानी कहते हैं कि ये तीनों एक ही श्रेणी में आते हैं। बुरे वक्त की कसौटी पर ही इनका सोना खरा उतरता है। सुख में तो भीड़ होती है, दुःख में केवल भक्त पुकारता है, भगवान सुनता है, और भाई दौड़कर आता है।
सहकार का अर्थ है साथ मिलकर कार्य करना। भाई वही करता है। वह तुम्हारे सपनों को अपना बस्ता बना लेता है। तुम्हारी जिम्मेदारी को अपनी नींद से पहले रखता है। तुम थक जाओ तो वह तुम्हारे हिस्से का बोझ भी उठा लेता है और उफ़ तक नहीं करता। उपकार में मैं बड़ा, तू छोटा का भाव छिपा होता है। सहकार में हम का भाव है। भाई हम कहकर ही जीता है। उसकी भाषा में मेरा-तेरा कम, अपना ज्यादा होता है। इसलिए भाई के साथ का कर्ज कभी चुकाया नहीं जा सकता, क्योंकि उसने कर्ज दिया ही नहीं, कंधा दिया था।
बचपन की छत पर जब पतंग कटती थी तो भाई ही था जो बिना कहे धागा लपेटने लगता था। माँ की डाँट पड़े तो पीठ पीछे खड़ा होकर आँख से इशारा कर देता था कि रो मत, मैं हूँ। जवानी में जब दुनिया ताने देती है, तब भाई ढाल बन जाता है। वह दुनिया से लड़ नहीं पड़ता, वह तुम्हें इतना मजबूत कर देता है कि दुनिया खुद पीछे हट जाए। बाप की जगह खड़ा होकर जिम्मेदारी ओढ़ लेता है और माँ की जगह बैठकर सिर सहला देता है। भाई एक साथ कई रिश्ते निभा लेता है क्योंकि उसके भीतर भगवान ने ममता, सुरक्षा और मित्रता तीनों का अंश भर दिया है।
विश्वास वह डोर है जिससे भक्त भगवान से बंधा है। वही डोर भाई-भाई के बीच भी है। इस डोर में गाँठ नहीं पड़ती, खिंचाव जरूर आता है। कभी अनबन हो जाए, कभी बात न हो, पर भीतर कहीं अटूट भरोसा रहता है कि आग लगेगी तो पानी लेकर वही दौड़ेगा। बुरे वक्त में यही विश्वास प्राण बन जाता है। नौकरी छूट जाए तो भाई कहता है तू फिक्र मत कर, घर मैं देख लूँगा। बीमारी आ जाए तो रात भर कुर्सी पर बैठकर तुम्हारी साँसें गिनता है। अदालत के दरवाजे पर जब अपने पराए हो जाते हैं, तब भाई वकील से पहले और जमानत से पहले खड़ा मिलता है।
भगवान का होना आस्था है, भाई का होना साक्षात् है। मंदिर में सिर झुकाते हो तो लगता है किसी ने सुना, पर भाई के गले लगते हो तो लगता है किसी ने थाम लिया। भक्त रोता है तो भगवान आँसू नहीं पोंछने आता, हिम्मत भेज देता है। भाई रोने नहीं देता, रोओ तो आँसू अपनी हथेली में ले लेता है। इसलिए कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने भाई बना दिए।
स्वार्थ की इस दुनिया में जहाँ रिश्ते लाभ देखकर बनते हैं, भाई वह पृष्ठ है जहाँ हिसाब नहीं लिखा जाता। वह तुम्हारी सफलता पर सबसे जोर से ताली बजाता है और असफलता पर सबसे पहले तुम्हें भीड़ से निकालकर एक कोने में ले जाता है। वह तुम्हें गिरने से बचाता है, और गिर जाओ तो यह नहीं पूछता कि गिरे कैसे, पूछता है कि चोट कहाँ लगी।
भाई, भगवान और भक्त की श्रेणी एक इसलिए है क्योंकि तीनों देना जानते हैं, माँगना नहीं। तीनों निभाना जानते हैं, जताना नहीं। तीनों समय पर पहुँचना जानते हैं, बहाना नहीं। जब चारों ओर से द्वार बंद हों, तब एक द्वार खटखटाए बिना खुलता है — भाई का। वह द्वार नहीं, दिल है। उस दिल में जगह माँगनी नहीं पड़ती, मिल जाती है।
इसलिए जिस घर में भाई हँसते हैं, उस घर में भगवान बसते हैं। जिस मन में भाई के लिए जगह है, उस मन में भक्ति अपने आप उतर आती है। भाई को संभाल लो, भगवान खुद संभल जाएगा। भाई से बोल लो, प्रार्थना अपने आप पहुँच जाएगी। क्योंकि भाई केवल खून का रिश्ता नहीं, वह भगवान का भेजा हुआ उत्तर है — उन सभी प्रार्थनाओं का जो तुमने बुरे वक्त के लिए कभी की ही नहीं थीं, पर उसने सुन ली थीं।
उपकार एक बार होता है और याद रहता है। सहकार हर दिन होता है और आदत बन जाता है। भाई इसी आदत का नाम है। वह रोज तुम्हारे बिना कहे तुम्हारा हो जाता है। इसलिए भाई को पूजो मत, निभाओ। उसकी आरती नहीं, जरूरत पर हाजिरी लगाओ। क्योंकि भक्त भगवान को पाता है, और भगवान भाई बनकर तुम्हें मिल जाता है।




