डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
मंदिर भारत में सिर्फ पूजा स्थल नहीं रहे। ये राजकोष थे, बैंक थे, समाज की तिजोरी थे। राजा से लेकर किसान तक सोना, चांदी और जमीन मंदिर को दान करता था। यही वजह है कि जब भी कोई आक्रांता आया, लुटेरा आया या लालची हाथ बढ़ा, निशाना मंदिर का चढ़ावा ही बना।
आठवीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम सिंध आया। देबल और नीरून के मंदिरों से मूर्तियां तोड़ीं, सोना लूटा। यह शुरुआत थी। असली कहर ढाया महमूद गजनवी ने। 1000 से 1027 ईस्वी के बीच 17 बार हमले किए। 1025 में सोमनाथ पर हमला किया। अल-बरुनी लिखता है कि मंदिर में करोड़ों का खजाना था। गर्भगृह में हीरे जड़े शिवलिंग, सोने-चांदी की मूर्तियां थीं। महमूद गजनवी ऊंटों पर लादकर धन गजनी ले गया। मथुरा के मंदिरों से 98 हजार 300 मिस्कल सोना मिला। कन्नौज और थानेश्वर के मंदिर भी खाली कर दिए गए।
मकसद सिर्फ दीन नहीं था, दौलत थी। रिचर्ड ईटन जैसे इतिहासकार बताते हैं कि 1192 से 1729 के बीच 80 मंदिरों के तोड़े जाने के पक्के सबूत हैं। मुहम्मद गोरी ने तराइन जीतने के बाद अजमेर और दिल्ली के मंदिर लूटे। अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को दक्षिण भेजा। वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुरै के मंदिरों से इतना सोना-हीरा लूटा कि दिल्ली के बाजार में दाम गिर गए। तैमूर लंग 1398 में आया तो दिल्ली के आसपास के मंदिर और बस्तियां दोनों लूट लीं।
औरंगजेब के दौर, 1658 से 1707 तक, सबसे व्यवस्थित तोड़फोड़ हुई। काशी विश्वनाथ, मथुरा केशवदेव, सोमनाथ और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि, सब कुछ आज हमारे सामने है। मंदिरों की संपत्ति जब्त होती थी। पुजारियों को मार दिया जाता था या भगा दिया जाता था। सतीश चंद्र लिखते हैं कि औरंगजेब ने वही मंदिर तुड़वाए, जो जाट, मराठा और राजपूत विद्रोह के केंद्र थे। बनारस का मंदिर इसलिए तोड़ा गया क्योंकि शिवाजी के भाई को वहां शरण मिली थी।
अंग्रेज आए तो तरीका बदला। 1857 के बाद कई मंदिरों की संपत्ति जब्त की गई। इनाम आयोग बैठाकर लाखों एकड़ देवस्थल जमीन छीन ली गई। 1863 के धार्मिक अक्षय निधि नियम से सरकार ने मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। पुजारी वेतनभोगी कर्मचारी बन गए। चढ़ावा सरकारी खजाने में जाने लगा।
आजादी के बाद लूट का रूप बदल गया। अब तलवार से नहीं, ताले तोड़कर और कलम से डाका पड़ता है। 1980 में चित्रकूट के भरतकूप राम-जानकी मंदिर में चोरी हुई। आज भी हो रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले बाहरी हमलावर थे, अब अंदर के लोग भी मिले हुए हैं।
पिछले 20 साल का रिकॉर्ड देखिए। चित्रकूट का विजय कुमार शुक्ला गिरोह। 2004 में हत्या के मामले में जमानत मिली तो कागजों में खुद को मृत घोषित करवा लिया। फिर 20 साल में 50 मंदिर लूटे। मूर्तियां, चांदी के गहने, पीतल के घंटे। मोबाइल में 300 से ज्यादा मंदिरों की रेकी की फोटो मिलीं। कुत्तों को जहरीली मिठाई खिलाकर रास्ता साफ करता था।
2024 से 2026 के बीच वारदातें तेज हुईं। दिल्ली के चांदनी चौक में 11 मई 2025 की रात शनि देव की अष्टधातु मूर्ति चोरी हुई। 15 साल पुरानी, एक लाख की। चोर निगरानी कैमरे में कैद हुआ। चित्रकूट के भरतकूप में राम परिवार के आठ चांदी के मुकुट गए, जिनका वजन एक किलो 700 ग्राम था। भागलपुर में सोना महंगा हुआ तो दुर्गा मंदिर से मुकुट, गले का हार और दानपेटी साफ कर दी गई। कहलगांव से 125 साल पुरानी दुर्गा मूर्ति और शिवलिंग चोरी हो गए।
बुलंदशहर के साईं मंदिर में 19 अप्रैल 2026 को ढाई सौ ग्राम चांदी का छत्र और पांच हजार रुपये नकद चोरी हो गए। 21 निगरानी कैमरे लगे थे, फिर भी चोर बरसाती और दस्ताने पहनकर आए। सिरसा के दुर्गा मंदिर से 500 ग्राम चांदी का मुकुट, 120 ग्राम सोना और चांदी के छत्र चोरी हो गए। कुल नुकसान 20 लाख रुपये से ऊपर बताया गया।
भीलवाड़ा के स्वस्ति धाम जैन मंदिर से 24 मई 2025 को एक किलो 300 ग्राम सोने का आभामंडल और तीन किलो चांदी का कछुआ चोरी हो गया। कीमत सवा करोड़ रुपये बताई गई। चोर दर्शन के बहाने दिन में घुसा और रात को छत पर छिपा रहा। मऊगंज के नईगढ़ी किला मंदिर से 30 सितंबर 2024 को 32 लाख रुपये के जेवर चोरी हो गए। खंभों पर जड़ी परत तक नोच ली गई। निगरानी कैमरों के तार काट दिए गए। उज्जैन के आशापुरी माता मंदिर से तीन किलो से ज्यादा चांदी के आभूषण चोरी हो गए। तीन चोर थे, जिनमें एक ने तो प्रणाम करके चोरी की।
सबसे बड़ा घाव अयोध्या में लगा। राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का आरोप लगा। जून 2025 में अखिलेश यादव ने सात करोड़ रुपये की हेराफेरी का मुद्दा उठाया। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगी तो आंकड़ा 200 करोड़ रुपये तक पहुंचा। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक अधिकारी विजय विश्वास पंत और पुलिस अधिकारी किरण एस. का विशेष जांच दल बनाया। जांच में निकला कि दान गिनने वाले कर्मचारी लवकुश मिश्रा के घर से 10 लाख रुपये नकद मिले। कुछ अलमारी में, कुछ गोबर के ढेर में छिपे थे। दो कर्मचारियों की तनख्वाह 18 से 20 हजार रुपये थी। एक ने डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन ली, दूसरे ने 40 लाख रुपये का भूखंड खरीदा। नौ कर्मचारी ऐसे मिले, जिन्होंने हाल में महंगे फोन और गाड़ियां खरीदीं। चंपत राय के पूर्व चालक रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू के पास अयोध्या-लखनऊ में 50 करोड़ रुपये की संपत्ति होने का आरोप है। घर से सोना बरामद होने की खबर है। भतीजा मनीष यादव नोट गिनता था। उसकी निशानदेही पर 36 लाख रुपये मिले। कुंभ के दो महीने में रोज 10 लाख श्रद्धालु आए। दानपेटी दो घंटे में भर जाती थी। उसी दौरान सबसे बड़ी गड़बड़ी का शक जताया गया।
ढंग साफ है। निशाना सोना, चांदी, अष्टधातु की मूर्तियां, मुकुट, छत्र और दानपात्र की नकदी होती है। समय रात का, जब मंदिर बंद होते हैं। तरीका रेकी करना, निगरानी कैमरे तोड़ना, दीवार फांदना और छत से घुसना है। पहले बाहरी गिरोह थे, अब प्रबंध समिति के कर्मचारी, पुजारी और चालक भी शामिल बताए जा रहे हैं। वजह सोने-चांदी के दाम बढ़ना और सुरक्षा का कमजोर होना है।
मंदिरों के पास एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर की संपत्ति होने का अनुमान है। पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहखाने में ही इतना खजाना निकला। तिरुपति बालाजी का सालाना चढ़ावा तीन हजार करोड़ रुपये से ऊपर है। इतना धन होगा तो लालच भी आएगा। पहले तलवार वाले आए, अब सफेदपोश आए। पहले गजनी से आए, अब गली से निकलते हैं।
सवाल सुरक्षा का है। बड़े मंदिरों में केंद्रीय सुरक्षा बल, आतंक-रोधी दस्ता और उड़न-रोधी व्यवस्था है। पर चोरी रुक नहीं पा रही। क्योंकि बाहरी सुरक्षा और आंतरिक हिसाब, दो अलग चीजें हैं। राम मंदिर में बाहरी पहरा कड़ा है, पर दान गिनने वाले ही शक के घेरे में हैं। छोटे मंदिरों में तो निगरानी कैमरा तक नहीं है। पुजारी अकेला है। दानपेटी का ताला टूटना रोज की बात है।
निष्कर्ष यही है कि धर्मस्थलों का चढ़ावा हजार साल से लूट का केंद्र रहा है। महमूद गजनवी ऊंट पर लादकर ले गया। विजय शुक्ला बोरे में भरकर ले गया। लवकुश मिश्रा गोबर में छिपाकर ले गया। नाम बदले, तरीके बदले, नीयत नहीं बदली। जब तक मंदिरों में अपार धन रहेगा और हिसाब में पारदर्शिता नहीं आएगी, डाका पड़ता रहेगा। सोमनाथ से राम मंदिर तक कहानी एक ही है। बस लुटेरे का चेहरा बदल गया है।
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