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अमृत उजाला > अन्य खबरें > ‘द्विचक्र वाहिनी’ खुशियों की सवारी साइकिल हमारी!
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‘द्विचक्र वाहिनी’ खुशियों की सवारी साइकिल हमारी!

amritujala
Last updated: June 3, 2026 7:45 AM
amritujala 2 months पहले
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डाक्टर दीपक गोस्वामी

साइकिल अंतिम व्यक्ति की सच्ची हितैषी है और यह बात किसी नारे से नहीं बल्कि रोज के जीवन से सिद्ध होती है। स्वास्थ्य की बात करें तो आज हर गली में मधुमेह, मोटापा, रक्तचाप और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। कारण साफ है कि शरीर चलना भूल गया है। दफ्तर तक गाड़ी, दो कदम के बाजार तक स्कूटर और सीढ़ी की जगह लिफ्ट ने हमारे फेफड़ों और मांसपेशियों को कमजोर कर दिया। साइकिल इस चक्र को तोड़ती है। रोज आधा घंटा साइकिल चलाना दिल को मजबूत करता है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, हड्डियों में जान भरता है और मानसिक तनाव को घटाता है। डॉक्टर दवा लिखने से पहले टहलने को कहते हैं, साइकिल टहलने से भी दो कदम आगे है क्योंकि यह जोड़ों पर दबाव डाले बिना पूरे शरीर को साधती है। बच्चों का बचपन मोबाइल में कैद हो रहा है, उनकी आंखें कमजोर और पीठ झुकी जा रही है। अगर हर मोहल्ले में साइकिल संस्कृति लौट आए तो बच्चों का शारीरिक विकास, संतुलन, आत्मविश्वास और आज़ादी सब एक साथ लौटेंगे। बुजुर्गों के लिए साइकिल धीमी गति का सहारा है जो उन्हें घर में बंद होने से बचाती है। कुल मिलाकर साइकिल दवा नहीं है, पर दवा की जरूरत घटा देती है और यही अंतिम व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी राहत है क्योंकि उसके पास इलाज के पैसे अक्सर नहीं होते।

समाज के स्तर पर साइकिल बराबरी का वाहन है। कार का शीशा चढ़ते ही आदमी अलग दिखता है, पर साइकिल पर बैठा मजदूर, छात्र, प्रोफेसर और दुकानदार सब एक जैसे लगते हैं। जाति, वर्ग, पद और पैसे का भेद साइकिल मिटा देती है। बेटियों के लिए तो साइकिल सामाजिक क्रांति बनकर आई। बिहार से लेकर छत्तीसगढ़ तक सरकारी योजनाओं में जब लड़कियों को साइकिल मिली तो स्कूल में उनकी उपस्थिति बढ़ी, बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर घटी, आत्मनिर्भरता बढ़ी और छेड़खानी का डर कम हुआ क्योंकि समूह में साइकिल से आना जाना सुरक्षित लगा। गांव की पगडंडियों पर साइकिल ने समय की दूरी को छोटा किया। खेत, अस्पताल, पंचायत, बाजार सब पहुंच में आ गए। शहरों में भी साइकिल सामुदायिकता लौटाती है। जब हम पैदल या साइकिल पर होते हैं तो एक दूसरे को देखते हैं, नमस्ते करते हैं, रुककर बात करते हैं। गाड़ी में बैठा व्यक्ति सिग्नल, हॉर्न और शीशे के पार ही रह जाता है। इस तरह साइकिल रिश्तों को जोड़ती है और अकेलेपन की बीमारी काटती है। अंतिम जन के पास अक्सर आवाज नहीं होती, पर जब हजारों साइकिलें एक साथ चलती हैं तो वह बिना बोले भी समाज को दिशा दे देती हैं।

अर्थव्यवस्था के लिए साइकिल सबसे सस्ता निवेश और सबसे बड़ा बचत खाता है। एक बार हजार दो हजार में साइकिल आ जाए तो पेट्रोल नहीं, बीमा नहीं, पार्किंग का झंझट नहीं, सर्विस के नाम पर साल में एक बार तेल और पंक्चर का खर्च। रिक्शा चालक, डिलीवरी बॉय, दूधिया, अखबार वाले, कारीगर, छोटे फेरी वाले, सबकी रोजी साइकिल से जुड़ी है। अगर पेट्रोल सौ रुपये लीटर हो जाए तो कार वाला चिंता करेगा, पर साइकिल वाला मुस्कुराकर आगे बढ़ जाएगा। शहरों में ट्रैफिक जाम की कीमत हर साल लाखों करोड़ रुपये है। समय बर्बाद, ईंधन बर्बाद, सांस बर्बाद। साइकिल लेन और साझा साइकिल प्रणाली पर खर्च असल में कमाई है क्योंकि अस्पताल का बिल घटता है, उत्पादकता बढ़ती है, प्रदूषण से होने वाला नुकसान रुकता है। भारत दुनिया में साइकिल उत्पादन का बड़ा केंद्र है। लुधियाना, पंजाब और तमिलनाडु के कारखाने लाखों परिवार पालते हैं। अगर हम साइकिल को नीति में जगह दें तो मेक इन इंडिया को पहिए लग जाएंगे। अंतिम व्यक्ति के लिए अर्थ का मतलब दो वक्त की रोटी और सम्मान है। साइकिल दोनों दिलाती है। वह उसे ग्राहक से कारीगर, यात्री से मालिक बनने का रास्ता देती है।

धर्म हमेशा सरलता, संयम और करुणा सिखाता है। गीता में अपरिग्रह की बात है, बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा, महावीर ने अहिंसा, कबीर ने सादा जीवन, गांधी ने सादगी को प्रार्थना माना। साइकिल इन सबका व्यावहारिक रूप है। इसमें संग्रह नहीं, दिखावा नहीं, हिंसा नहीं। एक साइकिल वातावरण को गंदा नहीं करती, न हवा जहरीली करती है न ध्वनि प्रदूषण फैलाती है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव है। तीर्थ यात्रा पैदल या साइकिल से करने की परंपरा पुरानी है क्योंकि कष्ट सहकर जब आदमी पहुंचता है तो अहंकार गल जाता है। अंतिम जन अक्सर धर्म के नाम पर ठगा जाता है, चढ़ावे के बोझ से दबता है। साइकिल उसे याद दिलाती है कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए सोने का रथ नहीं चाहिए, साफ मन और दो पहिए काफी हैं। लंगर, भंडारे, सेवा कार्यों में साइकिल से पहुंचने वाला स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचता है और सबसे अंत में लौटता है। इस तरह साइकिल सेवा का वाहन बन जाती है।

राजनीति का मूल काम अंतिम व्यक्ति तक न्याय, सुविधा और अवसर पहुंचाना है। भाषण से पेट नहीं भरता, सड़क बनने से जिंदगी आसान होती है। अगर शहर की योजना कार के लिए बनेगी तो गरीब हाशिए पर जाएगा। अगर योजना साइकिल और पैदल के लिए बनेगी तो गरीब केंद्र में आ जाएगा। साइकिल लेन, सुरक्षित चौराहे, पेड़ों की छाया, सार्वजनिक साइकिल स्टैंड ये सब लोकतंत्र को जमीन पर उतारते हैं। वोट मांगने नेता हेलीकॉप्टर से उतरते हैं, पर जनता से जुड़ने के लिए साइकिल यात्रा ज्यादा असरदार है। जयप्रकाश नारायण से लेकर आज के कई सरपंच तक, साइकिल ने नेताओं को जमीन से जोड़े रखा। नीति बनाने वालों को अगर महीने में एक दिन साइकिल से दफ्तर जाना अनिवार्य कर दिया जाए तो उन्हें गड्ढे, जाम, धूल और खतरे खुद समझ आएंगे। तब बजट का रुख बदलेगा। अंतिम जन की राजनीति नारों से नहीं, रास्तों से तय होती है और साइकिल वह रास्ता है जो सबको साथ लेकर चलता है।

कूटनीति में भी साइकिल की अपनी ताकत है। युद्ध तेल के लिए लड़े गए, प्रदूषण सीमा नहीं मानता, जलवायु संकट किसी पासपोर्ट को नहीं पूछता। जिस देश की जनता साइकिल अपनाती है वह देश ऊर्जा के लिए दूसरे पर कम निर्भर रहता है। आत्मनिर्भरता ही असली ताकत है। यूरोप के कई देश साइकिल को राष्ट्रीय नीति मानकर चले तो उनकी तेल की खपत घटी, स्वास्थ्य खर्च घटा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी बात वजनदार हुई क्योंकि वे उपदेश नहीं, उदाहरण देते थे। भारत अगर साइकिल को जन आंदोलन बना दे तो कॉप सम्मेलनों में हम दुनिया को रास्ता दिखा सकते हैं। गांधी की सादगी और साइकिल की मितव्ययिता एक साथ मिलकर भारत की सॉफ्ट पावर बन सकती है। पड़ोसी देशों को जोड़ने के लिए साइकिल रैलियां, युवा आदान प्रदान, सीमा के गांवों तक साझा बाजार, ये सब बंदूक से ज्यादा असरदार कूटनीति है। अंतिम जन की सुरक्षा तभी होगी जब राष्ट्रों के बीच भरोसा होगा और भरोसा तब बनता है जब जीवनशैली साझा हो।

विश्व बंधुत्व का सपना कारखानों के धुएं में नहीं, साइकिल के पहिए की सरसराहट में पलता है। साइकिल चलाने वाले को पता होता है कि हवा सबकी है, सड़क सबकी है, दुर्घटना में गिरेगा तो कोई भी उठाएगा। यह भाव ही वसुधैव कुटुंबकम है। दुनिया भर में साइकिल क्लब, साइकिल टूर, कार फ्री डे जैसे आयोजन इंसान को इंसान से जोड़ते हैं। रंग, देश, भाषा अलग हो सकती है पर थकान, प्यास, मंजिल का सुख सबका एक सा है। जब हम साइकिल से चलते हैं तो धरती को रौंदते नहीं, छूते हैं। जब हम धीमे चलते हैं तो दूसरों को सुनते हैं। यही धीमा और सुनना ही विश्व शांति की शुरुआत है। अंतिम जन अक्सर युद्ध, महंगाई और पलायन का सबसे पहला शिकार होता है। साइकिल एक ऐसा औजार है जो उसे लड़ाई से बचाकर जीवन की तरफ मोड़ता है।

इसलिए साइकिल को केवल लोहे का ढांचा मत समझो। यह स्वास्थ्य का साथी, समाज का समतल, अर्थ का आधार, धर्म का आचरण, राजनीति की परीक्षा, कूटनीति का संदेश और विश्व बंधुत्व का दूत है। अंतिम व्यक्ति के पास महल नहीं होता पर साइकिल हो तो पूरी दुनिया उसकी हो जाती है। दो पहिए उसे स्कूल ले जाते हैं, अस्पताल पहुंचाते हैं, रोजगार देते हैं, इज्जत देते हैं और सबसे बड़ी बात, उसे यह एहसास देते हैं कि वह भी मुख्यधारा का हिस्सा है। जिस दिन हर नीति, हर योजना, हर शहर और हर गांव के केंद्र में अंतिम जन को रखकर साइकिल को जगह मिल जाएगी, उस दिन विकास का पहिया सचमुच सबके लिए घूमेगा। साइकिल चीखती नहीं, चुपचाप बदलाव लाती है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इसी ताकत के कारण वह अंतिम जन की सबसे सच्ची हितैषी है, आज भी और हमेशा के लिए।

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