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टेक्नोलॉजी

डिजिटल भारत की चमकदार तस्वीर के पीछे एक बड़ा और खतरनाक अंधेरा

amritujala
Last updated: मई 29, 2026 11:33 अपराह्न
amritujala 4 दिन पहले
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अमृत उजाला न्यूज डेस्क | अंकित अवस्थी | कानपुर

कानपुर में हाल ही में नगर निगम की वेबसाइट हैक होने की घटना ने यह साफ कर दिया कि डिजिटल भारत की चमकदार तस्वीर के पीछे एक बड़ा और खतरनाक अंधेरा भी मौजूद है। वेबसाइट ठप पड़ने के बाद कई ऑनलाइन सेवाएं प्रभावित हुईं और आशंका जताई गई कि साइबर अपराधी इस डेटा का इस्तेमाल लोगों को ठगने के लिए कर सकते हैं। आम नागरिकों के लिए यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि इंटरनेट की दुनिया जितनी सुविधाजनक दिखती है, उतनी सुरक्षित नहीं है।

यह घटना ऐसे समय में हुई है जब देश की नई पीढ़ी तेजी से डिजिटल दुनिया में अपनी पहचान तलाश रही है। कोई यूट्यूबर बनना चाहता है, कोई रील स्टार, कोई गेमर और कोई “इन्फ्लुएंसर”। सोशल मीडिया ने युवाओं को एक ऐसा मंच दिया है जहां मोबाइल कैमरा और इंटरनेट के दम पर कोई भी कुछ ही दिनों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। लेकिन इसी दुनिया में सबसे ज्यादा भ्रम, दिखावा और खतरे भी छिपे हुए हैं।

दरअसल “इन्फ्लुएंसर” शब्द का अर्थ ही है — ऐसा व्यक्ति जो लोगों की सोच और फैसलों को प्रभावित करे। पहले यह भूमिका बड़े फिल्म सितारे, लेखक, नेता या खिलाड़ी निभाते थे। फिर सोशल मीडिया आया और हर व्यक्ति खुद को एक संभावित ब्रांड की तरह प्रस्तुत करने लगा। अब स्थिति यह है कि कई बच्चे और किशोर कम उम्र में ही फॉलोअर्स, लाइक्स और वायरल वीडियो को सफलता का पैमाना मानने लगे हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लोकप्रियता, सच्चाई और विश्वसनीयता से बड़ी हो जाती है।

आज सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति खुद को एक्सपर्ट बताकर सलाह दे सकता है। कोई फर्जी निवेश योजना बेच रहा है, कोई आधी-अधूरी जानकारी के सहारे राजनीति समझा रहा है, तो कोई नकली लग्जरी लाइफस्टाइल दिखाकर लोगों को प्रभावित कर रहा है। धीरे-धीरे डिजिटल दुनिया दो हिस्सों में बंटती जा रही है। लोग अब सच कम और अपनी पसंद का “सच” ज्यादा देखना चाहते हैं। एल्गोरिदम भी उन्हें वही दिखाते हैं जो उन्हें पसंद हो। यही कारण है कि इंटरनेट अब जानकारी का मंच कम और मानसिक प्रभाव का हथियार ज्यादा बनता जा रहा है।

इसके साथ एक और बड़ा बदलाव आया है — निगरानी का। आज हर व्यक्ति किसी न किसी डिजिटल ट्रैक पर चल रहा है। मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी कैमरे, ऑनलाइन पेमेंट, सोशल मीडिया गतिविधियां — सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है। अपराध की जांच में पुलिस के लिए अब कई बार सिर्फ मोबाइल और कैमरे ही काफी साबित हो जाते हैं। किसी अपराधी तक पहुंचने के लिए उसके डिजिटल निशान सबसे बड़ा सुराग बनते जा रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या आम लोग, खासकर युवा, इस डिजिटल दुनिया के खतरों को समझते हैं? दुख की बात यह है कि तकनीक का इस्तेमाल करने और तकनीक को समझने में बड़ा फर्क है। आज का युवा मोबाइल तेजी से चला सकता है, लेकिन वह डेटा चोरी, फिशिंग लिंक, डीपफेक वीडियो और साइबर फ्रॉड के खतरे को हमेशा गंभीरता से नहीं लेता। यही वजह है कि हर दिन हजारों लोग ऑनलाइन ठगी का शिकार हो रहे हैं।

कानपुर समेत उत्तर भारत के कई शहरों में साइबर अपराध तेजी से बढ़े हैं। फर्जी कॉल, बैंक अधिकारी बनकर ठगी, नकली लिंक भेजकर मोबाइल हैक करना, सोशल मीडिया अकाउंट चुराना और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों ने लोगों की कमाई तक छीन ली है। सबसे ज्यादा खतरे में बुजुर्ग और नए इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। वे कई बार डर या भरोसे में आकर अपनी निजी जानकारी साझा कर देते हैं।

आज जरूरत सिर्फ डिजिटल इंडिया बनाने की नहीं, बल्कि डिजिटल रूप से जागरूक समाज बनाने की है। जैसे कभी पोलियो और स्वच्छता अभियान चलाए गए थे, उसी तरह साइबर जागरूकता को भी जन आंदोलन बनाना होगा। स्कूलों में साइबर सुरक्षा पढ़ाई जानी चाहिए। बच्चों को यह सिखाना होगा कि इंटरनेट सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, जिम्मेदारी की भी जगह है। कॉलेजों, नगर निगमों और बैंकों को मिलकर नियमित साइबर सुरक्षा कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिएं, खासकर बुजुर्गों और छोटे शहरों के लोगों के लिए।

हर व्यक्ति को कुछ बुनियादी आदतें भी अपनानी होंगी। किसी अनजान लिंक पर क्लिक न करना, अलग-अलग मजबूत पासवर्ड रखना, सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा निजी जानकारी साझा न करना, बैंकिंग जानकारी किसी से न बताना और हर जरूरी अकाउंट पर टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन लगाना अब उतना ही जरूरी हो गया है जितना घर का दरवाजा बंद करना।

नई पीढ़ी इन्फ्लुएंसर बनना चाहती है, प्रसिद्ध होना चाहती है और डिजिटल दुनिया में पहचान बनाना चाहती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन उसे यह समझना होगा कि इंटरनेट सिर्फ अवसरों की दुनिया नहीं, बल्कि भ्रम, निगरानी और अपराध का भी बड़ा मैदान है। यहां तालियां भी मिलती हैं और जाल भी बिछे होते हैं।

आने वाले समय में सबसे बड़ी लड़ाई शायद जमीन पर नहीं, बल्कि स्क्रीन के भीतर लड़ी जाएगी। इसलिए अब वक्त सिर्फ स्मार्टफोन रखने का नहीं, बल्कि स्मार्ट डिजिटल नागरिक बनने का है।

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