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अमृत उजाला > देश > युद्ध के बाद बचती है सिर्फ राख: अमेरिका-ईरान टकराव
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युद्ध के बाद बचती है सिर्फ राख: अमेरिका-ईरान टकराव

amritujala
Last updated: June 19, 2026 6:55 PM
amritujala 2 months पहले
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युद्ध के बाद बचती है सिर्फ राख: अमेरिका-ईरान टकराव
युद्ध के बाद बचती है सिर्फ राख: अमेरिका-ईरान टकराव
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दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां बारूद की गंध कूटनीति की भाषा पर भारी पड़ती नजर आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल दो देशों का विवाद नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शांति पर पड़ सकता है। जिस समय रूस-यूक्रेन युद्ध अपने तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और उसके घाव अभी तक नहीं भर पाए हैं, उसी समय एक नया संघर्ष दुनिया को और अस्थिर बनाने की क्षमता रखता है।

युद्ध का मूल्य केवल सैनिक नहीं चुकाते

इतिहास गवाह है कि किसी भी युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों नागरिकों की जान गई और करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हुआ। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार यूक्रेन के पुनर्निर्माण की लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है।

यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष व्यापक रूप लेता है तो इसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। ईरान पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है और उसके आसपास पहले से ही कई संवेदनशील क्षेत्र मौजूद हैं। किसी बड़े सैन्य अभियान की स्थिति में तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर सीधा असर पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है युद्ध का वार

युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, उसकी कीमत पूरी दुनिया चुकाती है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान तेल, गैस और खाद्यान्न की कीमतों में भारी उछाल देखा गया था। कई देशों में महंगाई बढ़ी और विकास की रफ्तार प्रभावित हुई।

ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्रों में से एक के केंद्र में स्थित है। यदि वहां अस्थिरता बढ़ती है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर भारत सहित उन सभी देशों पर पड़ेगा जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। महंगा तेल अंततः आम नागरिक की जेब पर बोझ बनकर लौटता है।

युद्ध के घाव जल्दी नहीं भरते

किसी शहर को बमबारी से नष्ट करने में कुछ मिनट लग सकते हैं, लेकिन उसे फिर से बसाने में वर्षों नहीं, कभी-कभी दशकों का समय लग जाता है। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया और यूक्रेन इसके उदाहरण हैं। युद्ध खत्म होने के बाद भी टूटी हुई अर्थव्यवस्था, मानसिक आघात, विस्थापन और सामाजिक अविश्वास लंबे समय तक समाज को परेशान करते रहते हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियां भी उसके परिणामों को महसूस करेंगी।

दुनिया पहले से ही एक मोर्चे पर उलझी है

रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। लाखों लोग अब भी युद्ध की परिस्थितियों में जीवन जी रहे हैं। यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर उसका प्रभाव लगातार बना हुआ है।

ऐसे समय में एक और बड़े संघर्ष का उभरना दुनिया के लिए दोहरे संकट जैसा होगा। वैश्विक संस्थाओं, शक्तिशाली देशों और क्षेत्रीय संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे संवाद और कूटनीति के रास्ते को मजबूत करें, न कि हथियारों की दौड़ को।

युद्ध के शुरुआती दिनों में राष्ट्रवाद, शक्ति प्रदर्शन और विजय की बातें सुर्खियां बनती हैं, लेकिन कुछ समय बाद तस्वीर बदल जाती है। तब चर्चा शरणार्थियों, मलबे में बदले शहरों, महंगाई, बेरोजगारी और बिखरे परिवारों की होती है।

इसीलिए दुनिया को आज पहले से अधिक संवाद, धैर्य और समझदारी की जरूरत है। किसी भी पक्ष की राजनीतिक या सामरिक जीत मानवता की हार पर आधारित नहीं होनी चाहिए।

किसी विचारक की यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है— “युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं होता, वह स्वयं एक बड़ी समस्या बन जाता है।”

Ankit Awasthi

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