चलो अच्छा हुआ कम्युनिस्टों की विदाई तो हुई

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यशोदा श्रीवास्तव
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम की खास बात यह रही कि पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद केरलम से कम्युनिस्ट विचारधारा की विदाई हो गई। अजीब संयोग है कि कुछ माह पहले ही नेपाल से भी कम्युनिस्ट विचारधारा का खात्मा हुआ है। और अब भारत से बची-खुची इसके अवशेष अतीत होने के कगार पर है। कम्युनिस्ट विचारधारा फिलहाल भारत की राजनीति में सूट नहीं करती बावजूद इसके यह विचार धारा यहां दो चार प्रदेशों में अच्छे से फल-फूल रहा था। भारत और नेपाल दोनों ही इससे प्रभावित होते रहे हैं। फिलहाल अब भारत और इसके पड़ोसी राष्ट्र नेपाल दोनों ही इससे मुक्त हो गए हैं।
एकाध चुनावों में किसी पार्टी के पराजय को उसके समापन की दृष्टि से देखना यद्यपि कि मुनासिब नहीं है लेकिन जब हम कट्टर कम्युनिस्ट राज्य पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की ओर देखें तो कह सकते हैं कि केरलम में भी अब इस विचारधारा की वापसी नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है।
पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्ट पार्टियों के बियाबान में पहुंचाने के लिए ममता बनर्जी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए, भले ही वे सत्ता से बेदखल हो गई हों। नेपाल में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की वाह वाही इसलिए भी खूब हो रही है कि उसने नेपाल जैसे कट्टर कम्युनिस्ट देश से वामपंथ की विदाई कर दी। ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य क्या होता है,यह कह पाना मुश्किल है लेकिन उन्हें बंगाल से कम्युनिस्टों की विदाई के लिए हमेशा याद किया जाएगा। ममता बनर्जी की राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेसी रही है। कांग्रेस में रहते हुए ही उन्हें बंगाल की शेरनी कहा गया था। उसके बाद जब वे एनडीए का हिस्सा बनीं तो उन्हें आर एस एस के मुख पत्र पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय ने भी बंगाल की दुर्गा कहा। अभी कुछ समय पहले दिवंगत हुए भाजपा के बौद्धिक संपदा के धनी राज्य सभा सांसद बलवीर पुंज ने भी भरी संसद में कहा था कि हमारी दीदी ममता जी बंगाल की साक्षात दुर्गा हैं।
सन,2001 में रक्षा सौदे में रिश्वत खोरी का बड़ा मामला उजागर होने के बाद उन्होंने एनडीए से नाता तोड़ लिया था लेकिन उसी वक्त बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा था कि भाजपा अभी भी उनकी प्रमुख स्वाभाविक सहयोगी है। ममता बनर्जी इस चुनाव में भाजपा के हाथों भले ही बुरी तरह पराजित हुई हैं लेकिन कब उनके भीतर भाजपा के प्रति प्रेम उमड़ जाय,यह संभावना खत्म नहीं हुई है।
ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस तोड़कर मुकुल रॉय के साथ तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनका लक्ष्य पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्टों के साथ कांग्रेस को भी खत्म करना था। ममता बनर्जी के इस मुहिम में आरएसएस ने भी ममता बनर्जी को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताते हुए खुलकर उनका साथ दिया। नतीजा 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का सफाया कर अपनी खुद की सरकार बनाने में कामयाब हो गईं। तब से वे चार मई 2026 तक पश्चिम बंगाल की एक मात्र छत्रप बनीं रहीं। भाजपा को भी प्रत्यक्ष रूप से कोई एतराज़ नहीं था लेकिन अंदर अंदर वह बंगाल जीतने की रणनीति पर काम करती रही जिसमें अब जाकर उसे कामयाबी मिली।
ममता बनर्जी बंगाल से कम्युनिस्टों का सफाया करने के बाद भी वे भाजपा से दूर नहीं रहीं। उन्होंने 2019 में एन आर सी और सीएए के खिलाफ बहुत सारे आंदोलन जरूर किए लेकिन जब संसद में इस पर विल लाया गया तो उनके आठ सांसद संसद से गैर हाजिर होकर अप्रत्यक्ष रूप से इस विल के पास होने में मददगार की भूमिका निभाई। इतना ही नहीं 2022 में उपराष्ट्रपति पद के लिए उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मार्ग्रेट अल्वा के पक्ष में मतदान से साफ इंकार करते हुए सदन में हिस्सा ही नहीं लिया। 2022 में एक कार्यक्रम में उन्होंने आर एस एस की तारीफ में पुल बांधते हुए कहा था कि संघ दुनिया का सबसे सुव्यवस्थित संगठन है।
इस तरह देखें तो ममता बनर्जी उन्हीं के हाथों पराजित हुई हैं जिनसे उन्हें रहम की उम्मीद थी। इस बाबत कांग्रेस विधायक विरेंद्र चौधरी की टिप्पणी गौर तलब है कि पश्चिम बंगाल में न कोई जीता है न हारा है,यह सत्ता हस्तांतरण का एक स्वयंबर था जो चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से धूम धड़ाके के साथ संपन्न हुआ।
लेकिन यही बात केरलम के लिए भी तो लागू होती है। ठीक है वहां केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका अलग तरह की रही होगी, सत्ता का हस्तांतरण तो वहां भी हुआ। कांग्रेस गठबंधन कोई अपने कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से तो सत्ता छीनी नहीं है। उसने भी अपने सहयोगी दल को ही पराजित कर सत्ता में वापसी की है। भारत में वामपंथ विचार धारा की जड़ों को देखें तो इसकी शुरुआत केरलम से ही हुई है। यहां 1957 में पहली बार वामपंथ की सरकार बनी। इसके बाद 1977 में पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता रूढ़ हुई। इन दो प्रदेशों से वामपंथ के खात्मे के बाद केरल ही इनका आखिर किला बचा था,अब वह भी ढह गया। जिस तरह कभी ममता की पसंदीदा पार्टी भाजपा ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी ठीक उसी तर्ज पर केरलम में एलडीएफ को अपने ही घटक दल के हाथों मात खानी पड़ी।
सवाल यह नहीं कि कम्युनिस्टों का सफाया किसके हाथ हुआ, संतोष यह है कि नेपाल के बाद उसका यह पड़ोसी मित्र राष्ट्र भी कम्युनिस्ट मुक्त हो गया। भारत के बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य प्रदेशों में भी हल्का फुल्का कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव था लेकिन वहां पहले ही इससे मुक्ति मिल गई थी। बिहार में अब सिर्फ तीन कम्युनिस्ट विधायक हैं जबकि झारखंड में दो ही हैं। त्रिपुरा जो लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ था वहां भी मात्र 11 वामपंथी विधायक हैं। पश्चिम बंगाल में मात्र एक विधायक वामपंथी हैं। हां वामपंथियों का केरलम में अभी कुछ अवशेष जरूर बचा है लेकिन भविष्य में उसके पुनर्विस्तार की संभावना बहुत कम है क्योंकि आने वाले दिनों में यहां भाजपा और कांग्रेस ही मुख्य मुकाबले की पार्टी होगी। राहुल गांधी कहते हैं कि बंगाल में ममता बनर्जी ने भाजपा के लिए रास्ता खोल दिया है। यह बात राहुल गांधी पर लागू होती है कि उन्होंने भी केरलम में भाजपा का रास्ता खोल दिया है।

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