हजारों पशु-पक्षियों को दे चुके नई जिंदगी
खेतों में मिले लावारिस अंडों से निकालते हैं चूजे, स्वस्थ होने पर पक्षियों को छोड़ देते हैं प्राकृतिक आवास में
विनोद कुमार सिंह ‘अंशु’
बाराबंकी। जहां अधिकांश लोग घायल या लावारिस पक्षियों की ओर ध्यान नहीं देते, वहीं रामसनेहीघाट तहसील क्षेत्र के बडेला गांव निवासी विवेक सिंह सूर्यवंशी ने परिंदों को नया जीवन देने का अनूठा अभियान शुरू किया है। विवेक अब तक अपनी स्वयं निर्मित इंक्यूबेटर (अंडा सेने वाली) मशीन की मदद से हजारों पक्षियों और अन्य जीवों की जान बचा चुके हैं।
खेतों या अन्य स्थानों पर लावारिस पड़े पक्षियों के अंडों को विवेक अपनी इंक्यूबेटर मशीन में सुरक्षित रखते हैं। अंडों से बच्चे निकलने के बाद उनकी पूरी देखभाल करते हैं और स्वस्थ होने पर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ देते हैं। यदि कोई घायल पशु या पक्षी मिल जाता है तो उसका उपचार भी करते हैं और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उसे जंगल में छोड़ देते हैं।
वैज्ञानिक तरीके से तैयार की मशीन
विवेक द्वारा तैयार की गई इंक्यूबेटर मशीन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। मशीन का ढांचा थर्माकोल से बनाया गया है। अंडों को आवश्यक तापमान देने के लिए 100 वॉट का बल्ब लगाया गया है। तापमान और नमी को नियंत्रित रखने के लिए ह्यूमिडिटी कंट्रोल सिस्टम का उपयोग किया गया है। प्राकृतिक वातावरण बनाए रखने के लिए मशीन के भीतर पानी से भरा एक बर्तन रखा जाता है तथा ऑक्सीजन के संचार के लिए दो वेंटिलेशन छेद भी बनाए गए हैं।
हर पक्षी के अंडे का अलग होता है समय
विवेक बताते हैं कि अलग-अलग पक्षियों के अंडों से बच्चे निकलने का समय अलग होता है। कबूतर के अंडों से 15 से 18 दिन, मोर और बतख के अंडों से 27 से 31 दिन, गौरैया के अंडों से 10 से 13 दिन तथा मुर्गी के अंडों से 18 से 22 दिन में बच्चे निकल आते हैं।
2020 में शुरू की थी मुहिम
विवेक बताते हैं कि पहले उन्होंने लोगों से सुना था कि अंडों को भूसे में दबाकर सेने से चूजे निकल आते हैं, लेकिन ऐसा करने पर अंडे खराब हो गए। इसके बाद उन्होंने अपने गुरु डॉ. वीरेन्द्र वर्मा से मार्गदर्शन लिया। वहीं से उन्हें इंक्यूबेटर तकनीक की जानकारी मिली और वर्ष 2020 से उन्होंने इस दिशा में काम शुरू किया।
10 लोगों की टीम दे रही साथ
विवेक सिंह सूर्यवंशी के इस सेवा कार्य में करीब 10 स्वयंसेवकों की टीम भी सक्रिय रूप से सहयोग कर रही है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से समाजकार्य में स्नातक तथा डीएलएड की शिक्षा प्राप्त की है। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने निराश्रित और घायल पशु-पक्षियों की सेवा को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।
विवेक का कहना है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और सेवा का भाव हो तो बिना किसी सरकारी सहायता के भी जीव-जंतुओं की रक्षा और संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है। उनका यह प्रयास समाज के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है।








