एसटीएफ ने सर्वर और डीवीआर कब्जे में लिए
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में फर्जी वाहन नंबर और कथित कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर फास्टैग बनवाकर टोल राजस्व को नुकसान पहुंचाने के मामले की जांच का दायरा बढ़ गया है। विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की जांच में अब तक 142 वाहन चिह्नित किए गए हैं। जांच के अनुसार ये वाहन कथित फर्जीवाड़े के जरिए लखनऊ के इटौंजा टोल प्लाजा से सैकड़ों बार गुजरे।
मामले में कुछ टोल कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। हालांकि उनकी संलिप्तता की पुष्टि अभी नहीं हुई है और एसटीएफ बरामद दस्तावेजों तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विश्लेषण कर रही है।
आरटीओ की ओर से तीन अप्रैल 2026 को सरोजनीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। बाद में मामले की विवेचना एसटीएफ को सौंप दी गई। एसटीएफ ने हाल में चालक मुनीश को गिरफ्तार किया। इससे पहले ट्रक मालिक रियाज, उसके भाई सिराज और इंडसइंड बैंक के दो एजेंटों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है।
टोल प्लाजा से डीवीआर और सर्वर कब्जे में
जांच के दौरान एसटीएफ ने इटौंजा टोल प्लाजा से सीसीटीवी फुटेज, वाहनों के आवागमन का रिकॉर्ड और अन्य डाटा मांगा था। रिपोर्ट के अनुसार, करीब छह महीने तक अपेक्षित डाटा उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद एसटीएफ ने अदालत की अनुमति लेकर मंगलवार को टोल प्लाजा पर छापा मारा और डीवीआर, सर्वर तथा अन्य दस्तावेज कब्जे में लिए।
जांच एजेंसी अब इन उपकरणों में उपलब्ध पुराने डाटा को रिकवर करा रही है। एसटीएफ को एक जनवरी से तीन अप्रैल 2026 तक का रिकॉर्ड चाहिए। इस डाटा के विश्लेषण से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि चिह्नित वाहनों ने कितनी बार टोल पार किया और कथित फर्जीवाड़े से राजस्व को कितना नुकसान हुआ।
कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच में
जांच के दौरान मिले साक्ष्यों के आधार पर टोल एजेंसी के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की संभावित भूमिका की पड़ताल की जा रही है। एसटीएफ को यह भी आशंका है कि किसी स्तर पर मिलीभगत के कारण सीसीटीवी फुटेज और वाहनों से संबंधित डाटा उपलब्ध कराने में देरी हुई हो सकती है।
हालांकि, यह अभी जांच का विषय है। बरामद डीवीआर, सर्वर और दस्तावेजों से मिलने वाले साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि फर्जी फास्टैग के इस्तेमाल और टोल राजस्व को हुए कथित नुकसान में किन-किन लोगों की भूमिका थी।
फर्जी वाहन नंबरों के इस्तेमाल के कारण संबंधित वाहन मालिकों और चालकों तक पहुंचना भी जांच एजेंसी के लिए चुनौती बना हुआ है। एसटीएफ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी है।





















