सड़क खुली है, बाजार खुले हैं, बसें चल रही हैं और पार्क भी खुले हैं, फिर भी बेटियों की सुरक्षा को लेकर परिवारों की चिंता कम नहीं हो रही। सवाल केवल किसी एक शहर, पुलिस थाने या घटना का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की सुरक्षा और उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का है। लेख में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि महिलाओं को भय के कारण अपनी स्वतंत्रता सीमित करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।
लेख में 28 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दिल्ली-एनसीआर में हाल की बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं पर लिए गए स्वतः संज्ञान का संदर्भ दिया गया है। साथ ही आस्था कुंज पार्क और चलती स्लीपर बस में नाबालिग से कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामलों का उल्लेख करते हुए सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। लेख के मुताबिक, महिला सुरक्षा के लिए 112, महिला हेल्पलाइन 181, वन स्टॉप सेंटर, महिला सहायता डेस्क और सुरक्षित शहर जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन असली चुनौती इन व्यवस्थाओं को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है।
लेख में महिला सुरक्षा को केवल अपराध के बाद की पुलिस कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय जोखिम वाले स्थानों की पहले से पहचान करने पर जोर दिया गया है। खराब रोशनी वाले स्थान, बार-बार शिकायत वाले इलाके, सार्वजनिक परिवहन और स्कूल-कॉलेज से जुड़े रास्तों की निगरानी तथा आपातकालीन व्यवस्थाओं की वास्तविक कार्यक्षमता को सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। साथ ही नाबालिग पीड़िताओं की पहचान की रक्षा और डिजिटल माध्यमों से आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया गया है।
लेख का निष्कर्ष है कि महिला सुरक्षा का समाधान बेटियों की आवाजाही सीमित करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों और संस्थागत व्यवस्थाओं को अधिक सुरक्षित बनाना है। इसमें सुरक्षा को कैमरों और बजट की संख्या के बजाय वास्तविक परिणामों से मापने की बात कही गई है—जैसे जोखिम वाले स्थानों में सुधार, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई, जांच की गति और पीड़िताओं को मिलने वाली सहायता। लेख के अनुसार, सुरक्षित समाज वह होगा जहां बेटियों को घर जल्दी लौटने के लिए मजबूर न होना पड़े, बल्कि उन्हें सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्र और सुरक्षित रहने का भरोसा हो। लेख के लेखक डॉ. दीपक गोस्वामी हैं, जो स्वयं को मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक एवं सामाजिक मनोविज्ञान विश्लेषक बताते हैं।





















