खरीफ बुवाई से पहले ही सक्रिय हुआ केंद्र, पराली प्रबंधन के लिए 544 करोड़ रुपये का प्रावधान
नई दिल्ली। देश में खरीफ धान की बुवाई अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन केंद्र सरकार ने फसल कटाई के बाद उत्पन्न होने वाली पराली की समस्या से निपटने के लिए अभी से तैयारी तेज कर दी है। इसी क्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें आगामी सीजन की तैयारियों और पराली प्रबंधन के स्थायी उपायों पर चर्चा हुई।
बैठक में बताया गया कि वर्ष 2026-27 के लिए फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पहली किस्त के रूप में 272.07 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इस राशि से 46 हजार से अधिक कृषि मशीनों का वितरण, 910 कस्टम हायरिंग सेंटरों की स्थापना और 141 पराली आपूर्ति श्रृंखला परियोजनाओं के विकास का लक्ष्य रखा गया है।
2018 से जारी है पराली प्रबंधन अभियान
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पराली जलाने की चुनौती से निपटने के लिए वर्ष 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना शुरू की गई थी। इसके तहत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) को अब तक 4,266.47 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की जा चुकी है। इस धनराशि से 3.54 लाख से अधिक मशीनें किसानों तक पहुंचाई गईं और 43,500 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए गए।
पराली को समस्या नहीं, संसाधन बनाने की रणनीति
बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि पराली को केवल कृषि अपशिष्ट के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित किया जाए। इसके लिए बायोमास आधारित बिजली संयंत्रों, संपीड़ित बायोगैस इकाइयों, एथेनॉल प्लांट और पेलेट निर्माण उद्योगों में पराली के उपयोग को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। सरकार का मानना है कि इससे किसानों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत भी मिलेगा।
NCR में सक्रिय होगा ‘पराली सुरक्षा बल’
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के 14 जिलों की कम से कम 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ को सक्रिय करने का निर्णय लिया गया है। इसका उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी और समय रहते रोकथाम करना होगा। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि अगस्त 2026 से पहले मशीनों का वितरण और अन्य आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली जाएं।
किसानों की पीड़ा भी समझने की जरूरत
हालांकि पराली जलाने को लेकर किसानों पर अक्सर सवाल उठते हैं, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे किसानों की मजबूरी भी एक बड़ा कारण है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सीमित समय, मजदूरों की बढ़ती लागत, मशीनों की कमी और पराली निस्तारण के पर्याप्त विकल्पों का अभाव किसानों को कई बार पराली जलाने के लिए विवश कर देता है।
कई किसान संगठनों का कहना है कि केवल दंडात्मक कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि सरकार पराली खरीद, परिवहन और उपयोग की मजबूत व्यवस्था विकसित करे तथा छोटे किसानों को मशीनें सुलभ कराए, तभी स्थायी समाधान संभव होगा।
कम अवधि वाली धान किस्मों पर जोर
बैठक में कम समय में पकने वाली और कम पानी की आवश्यकता वाली धान किस्मों को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई। सरकार का मानना है कि इससे धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच का अंतराल बढ़ेगा और किसानों को पराली प्रबंधन के लिए अतिरिक्त समय मिल सकेगा।
जागरूकता और तकनीक पर रहेगा फोकस
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पराली प्रबंधन को केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जाएगा। जन-जागरूकता अभियान, रियल टाइम निगरानी, आधुनिक तकनीक और किसानों को वैकल्पिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर समान रूप से जोर दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पराली को आर्थिक मूल्य से जोड़ा गया और किसानों को व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराए गए, तो आने वाले वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। आखिरकार स्वच्छ पर्यावरण और किसानों की आर्थिक सुरक्षा, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।







