Hal Chhath 2026: संतान की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से रखा जाने वाला हलषष्ठी या हलछठ व्रत इस वर्ष 2 सितंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। लोक परंपरा में इसे ललही छठ, तिन्नी छठ और हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान बलराम से माना जाता है और इस दिन हल तथा कृषि से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है। ज्योतिर्विद डॉ. प्रीती पवन तिवारी, संस्थापक अध्यक्ष, ज्योतिष सेवा संस्थान के अनुसार, इस वर्ष हलछठ के दिन कई शुभ योगों का संयोग बन रहा है। वहीं इससे पहले 31 अगस्त, सोमवार को बहुला चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा।
2 सितंबर को शुरू होगी षष्ठी तिथि
पंचांग गणना के अनुसार षष्ठी तिथि का प्रारंभ 2 सितंबर 2026 को सुबह 6 बजकर 12 मिनट से होगा और इसका समापन 3 सितंबर को सुबह 4 बजकर 25 मिनट पर होगा। हलषष्ठी का मुख्य पूजन 2 सितंबर, बुधवार को किया जाएगा। पूजन के लिए सूर्योदय के बाद से दोपहर तक का समय विशेष रूप से शुभ माना गया है।
हलछठ पर बनेंगे तीन शुभ योग
ज्योतिर्विद डॉ. प्रीती पवन तिवारी के अनुसार, हलछठ के दिन कई शुभ योगों का संयोग बन रहा है। इनमें ध्रुव योग, रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग प्रमुख हैं। ध्रुव योग सुबह से रात 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इसके बाद व्याघात योग शुरू होगा, जो पूरी रात रहेगा। वहीं रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग मध्य रात्रि तक रहने की बात कही गई है। इस दिन भरणी नक्षत्र का भी संयोग रहेगा। इन शुभ योगों में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करना विशेष फलदायी माना जाता है।
भगवान बलराम से जुड़ी है हलछठ की परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार हलषष्ठी का पर्व भगवान बलराम से जुड़ा हुआ है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई के रूप में बलराम का जन्म हुआ था। उन्हें शेषनाग का अवतार भी माना जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल और मूसल है। इसी कारण हलषष्ठी के दिन हल की पूजा करने की परंपरा है। कृषि और प्रकृति से जुड़े इस पर्व में हल से जुती हुई भूमि से प्राप्त अन्न का सेवन न करने की मान्यता भी प्रचलित है।
संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं माताएं व्रत
हलषष्ठी का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए रखती हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और पूजा के बाद ही व्रत का पारण करती हैं। लोक मान्यता है कि विधि-विधान से हलषष्ठी का व्रत और पूजन करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं तथा उन्हें सुखी और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
हल से जुड़े अन्न का नहीं किया जाता सेवन
हलषष्ठी की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक इस दिन हल से जुते खेत में पैदा हुए अनाज का त्याग करना है। परंपरागत रूप से गेहूं, चावल, अरहर की दाल और ऐसे अन्य अनाजों का सेवन नहीं किया जाता, जिन्हें खेत में हल चलाकर उगाया जाता है। कई क्षेत्रों में इस दिन तिन्नी का चावल और महुआ भोजन में इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह कुछ परंपराओं में गाय के दूध, दही और घी का सेवन नहीं किया जाता तथा भैंस के दूध से बनी वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। हालांकि इन परंपराओं में क्षेत्र के अनुसार अंतर भी देखने को मिलता है।
सगरी बनाकर की जाती है पूजा
हलषष्ठी की पूजा में सगरी बनाने की विशेष परंपरा है। घर के आंगन या किसी सार्वजनिक स्थान पर छोटा गड्ढा खोदकर उसमें पानी भरा जाता है। इसे प्रतीकात्मक तालाब के रूप में तैयार किया जाता है। सगरी के आसपास पलाश, झरबेरी और गूलर की टहनियां लगाई जाती हैं। इसके साथ फूल और जलकुंभी आदि भी रखे जाते हैं। यह परंपरा प्रकृति और कृषि के प्रति भारतीय लोक जीवन के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।
माता हरछठ का किया जाता है श्रृंगार
पूजन स्थल पर मिट्टी से बनी माता हरछठ की प्रतिमा स्थापित की जाती है। माता को चुनरी, सिंदूर और चूड़ियां अर्पित कर श्रृंगार किया जाता है। पूजन के दौरान भैंस के दूध से बना दही, महुआ और सतनजा यानी सात प्रकार के अनाज से तैयार प्रसाद अर्पित करने की परंपरा है।
संतान की पीठ पर लगाया जाता है ‘छापा’
हलछठ की पूजा से जुड़ी एक अनूठी लोक परंपरा में पूजा के बाद माताएं अपनी संतान की पीठ पर महुआ के रस या हल्दी से ‘छापा’ लगाती हैं। इसे संतान की सुरक्षा और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक और लोक मान्यताओं में इसे संतान के लिए सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है।
मातृत्व के साथ प्रकृति और कृषि का पर्व
हलषष्ठी केवल संतान की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला व्रत ही नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोक जीवन में मातृत्व, कृषि और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है। भगवान बलराम के हल की पूजा से लेकर सगरी निर्माण और पारंपरिक खाद्य पदार्थों के उपयोग तक, इस पर्व की परंपराएं ग्रामीण जीवन और प्राकृतिक परिवेश से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ज्योतिर्विद डॉ. प्रीती पवन तिवारी, संस्थापक अध्यक्ष, ज्योतिष सेवा संस्थान के अनुसार, हलषष्ठी का पर्व संतान के मंगल की कामना के साथ प्रकृति और कृषि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा को भी जीवित रखता है।






















