महाविलोपन का खतरा: नेपाल की आपदा से हिमालय तक क्यों बढ़ रही चिंता? जानिए छठे महाविलोपन का सच

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नेपाल आपदा

हिमालयी क्षेत्र में लगातार सामने आ रही प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय बदलावों को केवल प्राकृतिक घटना मानकर नजरअंदाज करना भविष्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के बीच पृथ्वी पर तेजी से घटती जैव-विविधता को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। इसी संदर्भ में आचार्य संजय तिवारी ने कहा है कि हिमालय बार-बार मानव समाज को चेतावनी दे रहा है, लेकिन विकास और उपभोग की मौजूदा प्रवृत्ति में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखाई दे रहा।

 

तिवारी के अनुसार, वर्ष 2013 में केदार घाटी में आई विनाशकारी आपदा के बाद भी मानवीय गतिविधियों और पर्यावरणीय असंतुलन के संबंध पर पर्याप्त गंभीरता से विचार नहीं किया गया। उनका कहना है कि तिब्बत से नेपाल और उसके प्रभाव क्षेत्र तक दिखाई दे रहे पर्यावरणीय संकटों को केवल प्राकृतिक आपदा बताकर मानव गतिविधियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित निर्माण, वनों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और बदलती जलवायु ने हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र पर दबाव बढ़ाया है।

 

‘छठे महाविलोपन’ की बढ़ती चिंता

वैज्ञानिक समुदाय वर्तमान जैव-विविधता संकट को कई बार ‘छठा महाविलोपन’ (Sixth Mass Extinction) के संदर्भ में देखता है। इसे होलोसीन विलोपन अथवा प्रस्तावित एंथ्रोपोसीन विलोपन जैसे शब्दों से भी संबोधित किया जाता है। पृथ्वी के इतिहास में इससे पहले पांच बड़े सामूहिक विलुप्तिकरण हो चुके हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, इन घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन, ज्वालामुखीय गतिविधि, समुद्र के स्तर में बड़े बदलाव और क्षुद्रग्रह के टकराव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रमुख रही हैं। वर्तमान जैव-विविधता संकट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मानवीय गतिविधियां प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों के तेजी से घटने का प्रमुख कारण बन रही हैं।

 

वनों की कटाई और शहरीकरण बड़ा कारण

कृषि विस्तार, शहरीकरण, सड़क और बुनियादी ढांचे का निर्माण, खनन तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण दुनिया के कई हिस्सों में प्राकृतिक आवास तेजी से कम हो रहे हैं। इससे वन्यजीवों के रहने और भोजन प्राप्त करने के क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।इसके अलावा, कृषि में रसायनों का अत्यधिक उपयोग, जल स्रोतों का प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन भी जैव-विविधता के लिए चुनौती बन रहे हैं।

 

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा दबाव

जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ने के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हुई है। इसके प्रभाव के रूप में मौसम के पैटर्न में बदलाव, अत्यधिक वर्षा, सूखा, गर्मी की लहरें और हिमनदों में बदलाव जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं हिमालयी क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील माना जाता है। यहां तापमान और वर्षा में बदलाव का असर ग्लेशियरों, नदियों, कृषि और पर्वतीय आबादी पर पड़ सकता है।

 

वन्यजीवों के शिकार से लेकर प्रदूषण तक चुनौती

जैव-विविधता संकट के पीछे केवल जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेदार नहीं है। वन्यजीवों का अवैध शिकार और व्यापार, अत्यधिक मछली पकड़ना, जंगलों का विनाश, प्लास्टिक प्रदूषण, औद्योगिक कचरा और कीटनाशकों का इस्तेमाल भी कई प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन रहे हैं। इसके साथ ही, मनुष्य द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाई गई आक्रामक बाहरी प्रजातियां भी स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।

 

पहले हो चुके हैं पांच बड़े महाविलोपन

ऑर्डोविशियन – सिल्यूरियन महाविलोपन: लगभग 44.4 करोड़ वर्ष पहले। हिमयुग और समुद्र के स्तर में बड़े बदलावों से समुद्री जीवन प्रभावित हुआ।

 

लेट डेवोनियन महाविलोपन –  लगभग 37.2 करोड़ वर्ष पहले। समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों में ऑक्सीजन की कमी और जलवायु परिवर्तन प्रमुख कारकों में शामिल रहे।

 

परमियन – ट्राइसिक महाविलोपन: लगभग 25.2 करोड़ वर्ष पहले। इसे ‘द ग्रेट डाइंग’ कहा जाता है और यह पृथ्वी के इतिहास का सबसे बड़ा ज्ञात सामूहिक विलुप्तिकरण था।

 

ट्राइसिक – जुरासिक महाविलोपन: लगभग 20.1 करोड़ वर्ष पहले। ज्वालामुखीय गतिविधि और जलवायु परिवर्तन से अनेक प्रजातियां प्रभावित हुईं।

 

क्रेटेशियस – पैलियोजीन महाविलोपन: लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले। एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने के बाद डायनासोरों सहित बड़ी संख्या में प्रजातियां विलुप्त हो गईं।

अभी भी बचाया जा सकता है पर्यावरणीय संतुलन

 

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैव-विविधता के मौजूदा संकट को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, टिकाऊ कृषि, कार्बन उत्सर्जन में कमी, वनों और महासागरों की रक्षा तथा प्रदूषण पर नियंत्रण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं। आचार्य संजय तिवारी ने भी प्रकृति के साथ संतुलित जीवनशैली अपनाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि विकास की मौजूदा अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा। उनका कहना है कि प्रकृति को लगातार संसाधन समझकर उसका दोहन करने के बजाय मनुष्य को सह-अस्तित्व की अवधारणा अपनानी होगी।

 

हिमालय से मिल रहे संकेतों को समय रहते समझना जरूरी है। सवाल केवल आज की आपदाओं का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण और पृथ्वी के भविष्य का है। चाहें तो मैं इसका और ज्यादा दमदार न्यूज़ पोर्टल वाला संस्करण—हेडलाइन, सबहेड, इंट्रो, कोट बॉक्स और SEO टाइटल सहित भी तैयार कर सकता हूँ।

 

आचार्य संजय तिवारी

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