हिंदी सिनेमा ने प्रकृति को हमेशा सिर्फ खूबसूरत लोकेशन की तरह नहीं देखा। कभी खेतों में लहराती फसल कहानी का हिस्सा बनी, कभी सावन प्रेम की भाषा बन गया और कभी नदी ने इंसान के सुख-दुख को अपने साथ बहते हुए दिखाया। पुराने फिल्मी गीतों में पनघट, बाग, बादल, मिट्टी और नदिया जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं। इन्हें आज के पर्यावरणीय नजरिए से देखें तो इनके पीछे भारतीय जीवन की वह तस्वीर दिखाई देती है, जहां प्रकृति और इंसान के बीच दूरी नहीं थी। “हरियाली और रास्ता” जैसे शीर्षक भी इसी रिश्ते की याद दिलाते हैं—हरियाली जीवन है तो रास्ता हमारी यात्रा।
समय के साथ फिल्मों ने प्रकृति का दूसरा चेहरा भी दिखाया। “दो बीघा जमीन” में जमीन किसान के लिए सिर्फ खेत नहीं, उसके पूरे अस्तित्व का आधार है। “मंथन” में गांव, पशुधन और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े नजर आते हैं। वहीं “लगान” में बारिश का इंतजार गांव की किस्मत से जुड़ जाता है। “स्वदेस” में मिट्टी सिर्फ जमीन नहीं, अपनी जड़ों की पहचान बनती है, जबकि “मसान” में गंगा जीवन, मृत्यु और बदलते समाज की साक्षी बनकर सामने आती है। इन फिल्मों में हर जगह पर्यावरण पर सीधा भाषण नहीं मिलता, लेकिन प्रकृति कहानी के भीतर इतनी गहराई से मौजूद है कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।
आज जब शहर तेजी से फैल रहे हैं, नदियां प्रदूषण से जूझ रही हैं, जंगल कम हो रहे हैं और मौसम का मिजाज बदल रहा है, तब सिनेमा के सामने भी एक नई जिम्मेदारी है। पर्यावरण का मतलब केवल पेड़ लगाना नहीं है। इसमें पानी, मिट्टी, हवा, जंगल, खेती, पशु-पक्षी, कचरा और जलवायु परिवर्तन जैसे सवाल भी शामिल हैं। पुराने गीतों में जिस सावन को हम प्रेम और खुशी की ऋतु के रूप में सुनते आए हैं, आज उसी सावन की अनिश्चितता किसान और आम आदमी की चिंता बन सकती है। ऐसे में फिल्मों को यह सवाल पूछना होगा कि विकास की दौड़ में हम आखिर क्या पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
हिंदी सिनेमा की खूबसूरती यही है कि वह किसी बड़े संदेश को भी इंसान की छोटी-सी कहानी के जरिए दिल तक पहुंचा सकता है। सूखी नदी का एक दृश्य, खेत की मिट्टी में बीज डालता बच्चा या पेड़ के नीचे बैठा कोई बुजुर्ग कई बार वह बात कह देता है, जिसे लंबे भाषण भी नहीं कह पाते। अब जरूरत ऐसे सिनेमा की है जो प्रकृति को केवल सुंदर दृश्य न समझे, बल्कि उसके दर्द और संघर्ष को भी महसूस करे। क्योंकि धरती कोई ऐसा दृश्य नहीं है जो फिल्म खत्म होते ही पर्दे के पीछे चला जाए। धरती बचेगी, तभी कहानी बचेगी; हरियाली बचेगी, तभी रास्ता बचेगा; और प्रकृति बचेगी, तभी मनुष्य बचेगा।






















