निर्यात 63 प्रतिशत बढ़कर 38 हजार करोड़ के करीब पहुंचा, 80 से अधिक देशों तक पहुंची भारतीय रक्षा सामग्री; निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ी
नई दिल्ली। भारत का रक्षा उद्योग स्वदेशीकरण और वैश्विक विस्तार के नए चरण में पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2026 में देश का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.80 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह वित्त वर्ष 2025 के मुकाबले 15.6 प्रतिशत अधिक है। रक्षा निर्यात ने भी बड़ी छलांग लगाई और करीब 38 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसमें सालाना 63 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद और प्रणालियां निर्यात कर रहा है। अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रक्षा क्षेत्र पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी खरीद में बदलाव, निजी उद्योग की बढ़ती भागीदारी, स्वदेशी डिजाइन क्षमता और बड़े रक्षा कार्यक्रमों ने उत्पादन को गति दी है। सरकार ने वित्त वर्ष 2029 तक रक्षा उत्पादन को तीन लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
स्वदेशीकरण अभियान ने पकड़ी रफ्तार
रक्षा उपकरणों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के लिए स्वदेशीकरण अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है। पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों में 5,012 महत्वपूर्ण वस्तुओं को शामिल किया गया है। इनमें से 3,025 वस्तुओं का स्वदेशीकरण पूरा हो चुका है। वहीं, सृजन पोर्टल के माध्यम से स्वदेशीकरण के लिए 38 हजार से अधिक वस्तुओं की पहचान की गई। इनमें 13,900 से अधिक का स्वदेशीकरण हो चुका है।
रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025 में कुल रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई। निजी क्षेत्र का उत्पादन करीब 42 हजार करोड़ रुपये रहा। भारतीय कंपनियां अब केवल तय डिजाइन के आधार पर निर्माण तक सीमित नहीं हैं। वे डिजाइन तैयार करने, जटिल प्रणालियों को एकीकृत करने और सेना की जरूरत के मुताबिक समाधान विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।
1.90 लाख करोड़ का पूंजीगत परिव्यय
वित्त वर्ष 2027 के लिए रक्षा पूंजीगत परिव्यय करीब 1.90 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। यह पिछले वर्ष से 24 प्रतिशत अधिक है। आधुनिकीकरण के करीब 1.40 लाख करोड़ रुपये के बजट में 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उद्योग के लिए निर्धारित किया गया है।
वायुसेना के लिए तेजस एमके-2, सुखोई-30 एमकेआई के उन्नयन, अतिरिक्त एस-400 और मध्यम परिवहन विमान समेत कई कार्यक्रमों पर काम चल रहा है। सेना की योजनाओं में भविष्य के पैदल सेना लड़ाकू वाहन, भविष्य के लिए तैयार लड़ाकू वाहन, क्यूआरएसएएम, आकाश-एनजी, पिनाका और ड्रोन आधारित हथियार प्रणालियां शामिल हैं। नौसेना भी प्रोजेक्ट-75आई, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों, अगली पीढ़ी के फ्रिगेट और अन्य स्वदेशी प्रणालियों पर आगे बढ़ रही है।
वित्त वर्ष 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब 6.8 लाख करोड़ रुपये के 55 प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति दी। इसी दौरान करीब 2.3 लाख करोड़ रुपये के 503 पूंजीगत खरीद अनुबंधों पर हस्ताक्षर हुए। इससे घरेलू रक्षा कंपनियों के लिए आने वाले वर्षों में बड़े ऑर्डर की संभावनाएं बनी हैं।
अनुसंधान, गलियारों और कंपनियों से मजबूत हुआ आधार
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की 41 प्रयोगशालाएं और पांच युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं रक्षा तकनीक के विकास में जुटी हैं। आईडेक्स और एडीटीआई जैसी पहलों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानवरहित प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, उन्नत संचार और सेंसर तकनीक पर काम कर रहे स्टार्टअप को समर्थन मिल रहा है।
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के रक्षा औद्योगिक गलियारों में भी निवेश बढ़ा है। दोनों गलियारों में 9,100 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित हुआ है। इससे विनिर्माण के साथ स्थानीय आपूर्ति शृंखला को भी मजबूती मिल रही है।
देश की प्रमुख रक्षा कंपनियों के पास भी बड़े ऑर्डर हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का ऑर्डर बुक करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स ने वित्त वर्ष 2026 में करीब 29,700 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर हासिल किए, जबकि उसका ऑर्डर बैकलॉग करीब 72,300 करोड़ रुपये है। भारत डायनेमिक्स के पास 26 हजार करोड़ रुपये से अधिक और बीईएमएल के पास करीब 21,700 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है।
रक्षा उत्पादन और निर्यात में लगातार बढ़ोतरी से भारत की घरेलू सैन्य जरूरतों को पूरा करने की क्षमता के साथ वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला में उसकी भागीदारी भी बढ़ रही है।





















