संकट सबसे ज्यादा, लेकिन फैसलों में भागीदारी सबसे कम; UN में उठाए सात मुद्दे
न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान ग्लोबल साउथ देशों की बैठक में वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज दुनिया जिन संकटों का सामना कर रही है, उनका असर ग्लोबल साउथ पर सबसे अधिक पड़ रहा है, लेकिन वैश्विक फैसले लेने वाली संस्थाओं में इन देशों का प्रतिनिधित्व अभी भी पर्याप्त नहीं है।
जयशंकर ने वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार और सप्लाई चेन पर दबाव, निवेश के बिखरते प्रवाह, बढ़ते कर्ज जोखिम, जलवायु संबंधी झटकों और विकास के लिए अपर्याप्त वित्तीय संसाधनों को प्रमुख चुनौतियों के रूप में गिनाया। उन्होंने ग्लोबल साउथ देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
‘ग्लोबल साउथ संकट में आगे, लेकिन निर्णय लेने में पीछे’
बैठक को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि ग्लोबल साउथ आज के वैश्विक संकटों में सबसे अधिक प्रभावित पक्षों में है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उसकी भूमिका उतनी नहीं है। उन्होंने कहा कि पुराने दौर में बनाई गई वैश्विक संस्थाएं आज भी उस समय के सत्ता-संतुलन को प्रतिबिंबित करती हैं।
उनके अनुसार, ग्लोबल साउथ को उन निर्णय लेने वाले ढांचों में स्थान मिलना चाहिए जो उसके भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले करते हैं।
ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों में मनमानी नहीं होनी चाहिए
जयशंकर ने ऊर्जा सुरक्षा को विकास के केंद्र में बताते हुए कहा कि ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों को राजनीतिक लाभ के लिए प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सप्लाई चेन, वित्त और कनेक्टिविटी में मौजूद बाधाओं को भी महत्वपूर्ण चुनौती बताया।
उन्होंने खाद्य सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए अनाज और उर्वरक की आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं के जल्द समाधान की जरूरत बताई। साथ ही उन्होंने ऐसी आर्थिक और व्यापारिक व्यवस्थाओं की वकालत की जो विकासशील देशों की उत्पादन और औद्योगिक क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करें।
समुद्री सुरक्षा से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक
विदेश मंत्री ने समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन और नाविकों तथा वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता बताया। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि तकनीकी बदलावों के कारण दुनिया में नए विभाजन पैदा नहीं होने चाहिए।
जयशंकर ने इन मुद्दों के साथ ग्लोबल साउथ की निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी को भी प्रमुख बिंदु के रूप में रखा।
भारत-CELAC व्यापार 50 अरब डॉलर के पार
संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर भारत और लैटिन अमेरिकी एवं कैरिबियाई देशों के संगठन CELAC के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी जयशंकर ने आर्थिक और विकास साझेदारी मजबूत करने की बात कही। उन्होंने बताया कि भारत-CELAC व्यापार अब सालाना 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया है, हालांकि उन्होंने इसमें और विस्तार की गुंजाइश भी बताई।
जयशंकर ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में उभरा है और इस दौरान उसकी जीडीपी दोगुने से अधिक हुई है। उन्होंने भारत की तकनीकी क्षमता, फार्मास्यूटिकल्स, कुशल मानव संसाधन और डिजिटल क्षमताओं को CELAC क्षेत्र की जरूरतों के साथ जोड़ने की संभावना बताई। दूसरी ओर, CELAC क्षेत्र में महत्वपूर्ण खनिजों, टिकाऊ ऊर्जा, कृषि और खाद्य संसाधनों के क्षेत्र में संभावनाएं हैं।
चिली, पेरू और मर्कोसुर के साथ व्यापार पर जोर
विदेश मंत्री ने भारत और CELAC देशों के बीच व्यापार एवं निवेश संबंधों को और व्यापक बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि भारत चिली के साथ प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA), पेरू के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और मर्कोसुर के साथ मौजूदा तरजीही व्यापार समझौते (PTA) के विस्तार के माध्यम से आर्थिक साझेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत ऐसे ढांचे तैयार करना चाहता है जो दोनों पक्षों के लिए लाभकारी हों और जिनमें एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं तथा प्राथमिकताओं का ध्यान रखा जाए।
ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने पर जोर
जयशंकर ने CELAC को केवल एक क्षेत्रीय संगठन के रूप में नहीं, बल्कि अधिक प्रतिनिधित्व वाली और समावेशी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत और CELAC देशों का साझा हित यह सुनिश्चित करने में है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को तय करने में ग्लोबल साउथ की आवाज अधिक मजबूत हो।





















