UPSC के 100 साल पूरे: मोदी बोले- विकसित भारत के लिए जरूरी है ‘नेशन फर्स्ट, सिटिजन्स फर्स्ट’; आयोग हर साल करीब 250 भर्ती प्रक्रियाएं कराता है
नई दिल्ली। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने UPSC की 100 साल की यात्रा को रेखांकित करते हुए आयोग की भूमिका, भर्ती प्रक्रिया और भविष्य की चुनौतियों पर बात की।
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर UPSC से जुड़े 100 ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित पुस्तक का लोकार्पण किया। साथ ही शताब्दी स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी किया। UPSC की ओर से आयोजित दो दिवसीय शताब्दी समारोह 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को भारत मंडपम में हुआ।
विकसित भारत के लिए ‘नेशन फर्स्ट’ और ‘सिटिजन्स फर्स्ट’
प्रधानमंत्री ने कहा कि विकसित भारत के लिए जिस तरह की गवर्नेंस की जरूरत है, उसमें UPSC से चयनित अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने भर्ती के संदर्भ में ‘नेशन फर्स्ट’ और ‘सिटिजन्स फर्स्ट’ को प्रमुख कसौटी बताया।
मोदी ने कहा कि प्रशासन में नागरिकों के हित को प्राथमिकता देने वाली कार्यसंस्कृति जरूरी है। उन्होंने ‘प्रो पीपल, प्रो एक्टिव और गुड गवर्नेंस’ पर जोर देते हुए कहा कि प्रशासन को केवल समस्या आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से संभावित समस्याओं को समझकर समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।
हर साल करीब 250 भर्ती प्रक्रियाएं
UPSC के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने शताब्दी समारोह के दौरान आयोग के काम के व्यापक दायरे का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि UPSC हर वर्ष करीब 250 अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं संचालित करता है। इनमें इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, अर्थशास्त्र और रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों की भर्ती प्रक्रियाएं शामिल हैं। आयोग का परीक्षा कैलेंडर करीब 18 महीने पहले तैयार किया जाता है।
उन्होंने UPSC के अगले चरण के लिए ‘ट्रस्ट, ट्रांसपेरेंसी और टेक्नोलॉजी’ को प्रमुख आधार बताया। आयोग ने मेरिट, निष्पक्षता और समान अवसर को अपनी संवैधानिक भूमिका के मूल सिद्धांतों के रूप में रेखांकित किया है।
1926 में हुई थी शुरुआत, पहले अध्यक्ष थे सर रॉस बार्कर
UPSC की ऐतिहासिक यात्रा 1 अक्टूबर 1926 को पहले Public Service Commission की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। आयोग के पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे, जो ब्रिटिश सरकार की Home Civil Service से जुड़े थे। UPSC के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार शुरुआती आयोग में अध्यक्ष के अलावा चार सदस्य थे और इसकी स्थापना ब्रिटिश भारत में सिविल सेवाओं से जुड़ी भर्ती व्यवस्था के लिए की गई थी।
1935 के Government of India Act के प्रावधानों के तहत 1 अप्रैल 1937 को केंद्र का तत्कालीन Public Service Commission Federal Public Service Commission बन गया। स्वतंत्रता के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ Federal Public Service Commission को संवैधानिक दर्जा मिला और इसका नाम Union Public Service Commission कर दिया गया।
इस तरह आयोग के नाम में दो प्रमुख बदलाव हुए—1926 में Public Service Commission से शुरुआत, 1937 में Federal Public Service Commission और 1950 में Union Public Service Commission यानी UPSC।
सुभाष चंद्र बोस और ICS परीक्षा का जिक्र
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ICS परीक्षा से जुड़े प्रसंग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में सिविल सेवा परीक्षा की प्रक्रिया अलग थी और भारतीय युवाओं के लिए ब्रिटिश शासन की व्यवस्था में प्रवेश करना बड़ी चुनौती माना जाता था।
मोदी ने UPSC की शताब्दी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ पीढ़ियां, सरकारें, तकनीक और परीक्षा के तौर-तरीके बदले हैं, लेकिन संस्था के प्रति भरोसा बना हुआ है।
समय पर परीक्षा कराने पर जोर
प्रधानमंत्री ने कहा कि परीक्षा कराने वाली संस्थाओं को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप सुधार अपनाते रहना चाहिए। परीक्षा में देरी का सीधा असर अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ता है, इसलिए परीक्षा व्यवस्था को समयबद्ध तरीके से संचालित करना जरूरी है।
उन्होंने UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों की संस्थागत क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया। मिशन कर्मयोगी के तहत विकसित iGOT प्लेटफॉर्म का उपयोग आयोगों की आंतरिक कार्यप्रणाली और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के लिए किए जाने की बात कही।
UPSC है संवैधानिक संस्था
UPSC को संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत संवैधानिक संस्था का दर्जा प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 320 में आयोग के प्रमुख कार्यों में संघ की सेवाओं के लिए परीक्षाएं आयोजित करना और सीधी भर्ती के लिए चयन प्रक्रिया संचालित करना शामिल है। आयोग पदोन्नति, भर्ती नियमों और अनुशासनात्मक मामलों जैसे विषयों पर भी निर्धारित संवैधानिक भूमिका निभाता है।
शताब्दी समारोह के दौरान देशभर के राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और UPSC से जुड़े अधिकारी मौजूद रहे। कार्यक्रम के जरिए आयोग ने अपनी 100 वर्ष की यात्रा के साथ भविष्य की भर्ती व्यवस्था में तकनीक, पारदर्शिता और संस्थागत क्षमता बढ़ाने पर भी चर्चा की।





















