गणेश चतुर्थी का बदलता स्वरूप: मराठा काल से लोकमान्य तिलक तक जानें पूरा इतिहास

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विनायक चतुर्थी 2026

गणेश चतुर्थी के अवसर पर आज यह मंत्र देशभर में सुनाई देता है। भगवान गणेश की आराधना से जुड़ा यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक बन चुका है। हालांकि, गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप देकर इसे व्यापक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देने में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 

तिलक ने गणेशोत्सव को दिया सार्वजनिक स्वरूप

1893 में बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ के माध्यम से सार्वजनिक गणेश उत्सव के विचार को प्रोत्साहित किया। इसके अगले वर्ष उन्होंने ‘केसरी’ कार्यालय में गणेश प्रतिमा स्थापित कर सार्वजनिक आयोजन की शुरुआत की। उस दौर में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के जरिए लोगों को एक मंच पर लाना आसान नहीं था। ऐसे समय में गणेशोत्सव ने समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने का काम किया। तिलक ने गणेश को सभी लोगों के आराध्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए उत्सव को केवल पूजा तक सीमित नहीं रखा। गणेश पंडालों में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ भाषण, नाटक, संगीत, कविता और लोककलाओं के आयोजन होने लगे। इससे लोगों के बीच संवाद और सामाजिक भागीदारी बढ़ी।

 

सामाजिक एकता का बना माध्यम

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के सार्वजनिक आयोजन ने अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोगों को एक साथ आने का अवसर दिया। उस समय ब्रिटिश शासन राजनीतिक सभाओं और बड़े सामाजिक आयोजनों पर नजर रखता था। ऐसे माहौल में धार्मिक उत्सव के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों का एकत्र होना सामाजिक जागरूकता का माध्यम बन गया। गणेशोत्सव के जरिए देशभक्ति और सामाजिक सुधार से जुड़े विचार भी लोगों तक पहुंचने लगे। यही वजह रही कि धीरे-धीरे यह उत्सव महाराष्ट्र से बाहर भी लोकप्रिय होता गया।

 

सनातन परंपरा में गणपति का विशेष स्थान

हिंदू परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणेश जी की पूजा करने की परंपरा है। उन्हें बुद्धि, विवेक, समृद्धि और विघ्नों को दूर करने वाला देवता माना जाता है। गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। दस दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

 

गणपति स्थापना और पूजा का महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की स्थापना और पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष शुभ माना जाता है। भक्त विधि-विधान से गणेश प्रतिमा की स्थापना कर पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा के दौरान गणेश जी को दूर्वा, लाल फूल, मोदक, लड्डू, नारियल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। कई स्थानों पर षोडशोपचार पूजा की जाती है। श्रद्धालु गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश स्तोत्र और अन्य मंत्रों का पाठ करते हैं।

 

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों माना जाता है वर्जित?

धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करने से मिथ्या दोष लग सकता है। इससे व्यक्ति पर झूठा कलंक या आरोप लगने की आशंका मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमंतक मणि चोरी करने का आरोप लगा था। नारद मुनि ने उन्हें बताया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने के कारण उन्हें मिथ्या दोष का सामना करना पड़ा। इसके बाद भगवान कृष्ण ने इस दोष से मुक्ति के लिए गणेश चतुर्थी का व्रत किया। यदि भूलवश इस दिन चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो परंपरा में एक विशेष मंत्र के जाप का विधान बताया गया है—

“सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥”

गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

 

मराठा काल से चली आ रही परंपरा

गणेश उत्सव की परंपरा महाराष्ट्र में काफी पुरानी मानी जाती है। पुणे में छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से गणेश पूजा के आयोजन का उल्लेख मिलता है। गणेश जी को मराठा शासकों के बीच विशेष श्रद्धा प्राप्त थी। पेशवा काल में भी गणेशोत्सव को प्रोत्साहन मिला। बाद में पेशवा शासन के कमजोर पड़ने के साथ सार्वजनिक आयोजन का स्वरूप सीमित होता गया। परिवारों तक सिमट रहे इस पर्व को लोकमान्य तिलक ने फिर से बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया।

 

भाऊसाहेब जवाले का भी रहा योगदान

सार्वजनिक गणेश उत्सव के शुरुआती प्रयासों में भाऊसाहेब लक्ष्मण जवाले का नाम भी लिया जाता है। 1892 में पुणे में सार्वजनिक रूप से गणेश प्रतिमा स्थापित करने की पहल से इस परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिली। इसके बाद तिलक के प्रयासों से गणेशोत्सव ने व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण किया।

 

स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा गणेशोत्सव

लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना का मंच बनाया। गणेश पंडालों में देश, समाज और स्वतंत्रता से जुड़े विषयों पर चर्चा होने लगी। कवि गोविंद और वीर सावरकर से जुड़े राष्ट्रवादी समूहों ने भी गीतों और कविताओं के जरिए लोगों में देशभक्ति की भावना जगाई। धीरे-धीरे यह आंदोलन महाराष्ट्र के कई शहरों तक पहुंचा। गणेशोत्सव के मंचों से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार होने लगा और युवाओं की भागीदारी बढ़ी। इस तरह धार्मिक आयोजन ने सामाजिक और राजनीतिक चेतना को भी मजबूत करने में भूमिका निभाई।

 

गोवा में अलग अंदाज से मनाया जाता है पर्व

गोवा में गणेश चतुर्थी की परंपरा भी काफी पुरानी मानी जाती है। यहां लंबे समय तक धार्मिक प्रतिबंधों के बावजूद हिंदू परिवारों ने अपनी परंपराओं को बनाए रखा। कई स्थानों पर गणेश पूजा पारिवारिक स्तर पर होती रही। महाराष्ट्र के बड़े सार्वजनिक आयोजनों के मुकाबले गोवा में गणेश चतुर्थी आज भी कई परिवारों में पारंपरिक और पारिवारिक उत्सव के रूप में मनाई जाती है। लोग अपने पैतृक घरों में एकत्र होकर गणपति की पूजा करते हैं।

 

प्राण प्रतिष्ठा से शुरू होती है पूजा

गणपति स्थापना के समय विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। मान्यता के अनुसार मंत्रोच्चार के साथ भगवान गणेश का आह्वान किया जाता है। इसके बाद षोडशोपचार पूजा की जाती है। गणेश जी को दूर्वा और लाल फूल विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं। भक्त उन्हें मोदक और अन्य मिठाइयों का भोग लगाते हैं। पूजा के दौरान भजन, मंत्र और गणेश स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है।

 

दस दिनों तक गूंजता है गणपति बप्पा का जयकारा

गणेशोत्सव कई स्थानों पर दस दिनों तक चलता है। इस दौरान घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की नियमित पूजा होती है। अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु गणेश प्रतिमा को शोभायात्रा के साथ विसर्जन के लिए ले जाते हैं। इस दौरान ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु अगले वर्ष फिर भगवान गणेश के आने की कामना करते हुए प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।

 

मोदक का है खास महत्व

भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यता में मोदक को गणेश जी का प्रिय प्रसाद माना गया है। भक्त पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि गणेश जी की आराधना करने से जीवन के विघ्न दूर होते हैं और बुद्धि, समृद्धि तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

 

गणेश विसर्जन देता है जीवन का संदेश

गणेश विसर्जन केवल उत्सव का समापन नहीं, बल्कि जीवन के एक गहरे सत्य का प्रतीक भी माना जाता है। मिट्टी से बनी प्रतिमा का जल में विलीन होना इस बात की याद दिलाता है कि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है। गणेशोत्सव हमें आस्था के साथ सामाजिक एकता, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और जीवन में आने वाले बदलावों को स्वीकार करने का संदेश भी देता है। इसी वजह से गणपति उत्सव आज धार्मिक पर्व से आगे बढ़कर भारतीय संस्कृति, सामूहिक भागीदारी और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।

 

आचार्य संजय तिवारी

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