Nature Conservation: डॉ. दीपक गोस्वामी का कहना है कि इस धरती पर यदि कोई सबसे बड़ा तपस्वी, दानी और निस्वार्थ सेवक है, तो वह वृक्ष है। वृक्ष बिना किसी अपेक्षा के पूरी उम्र मानव और अन्य जीवों को जीवन देने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में वृक्षों को केवल पेड़ नहीं, बल्कि देवतुल्य माना गया है। उन्होंने कहा कि वृक्ष स्वयं धूप और वर्षा सहते हैं, लेकिन दूसरों को छाया, फल, फूल और शुद्ध वायु प्रदान करते हैं। वे कभी यह भेद नहीं करते कि उनकी छाया में बैठने वाला व्यक्ति कौन है। उनका प्रेम और सेवा सभी के लिए समान होती है। यही गुण ईश्वर के स्वरूप को भी दर्शाता है।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को मिला है सर्वोच्च स्थान
डॉ. गोस्वामी ने बताया कि उपनिषदों में कहा गया है – “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, अर्थात यह संपूर्ण सृष्टि परमात्मा का ही स्वरूप है। ऐसे में वृक्षों का सम्मान करना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि ईश्वर की सृष्टि का सम्मान करना भी है। भारतीय परंपरा ने हमेशा प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की शिक्षा दी है। धरती को माता, नदियों को जीवनदायिनी और वृक्षों को जीवनदाता माना गया है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है।
जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक साथ निभाते हैं वृक्ष
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन का शायद ही कोई ऐसा चरण हो, जहां वृक्ष किसी न किसी रूप में उसके काम न आते हों। जन्म के समय शुद्ध हवा, जीवनभर फल, औषधियां, लकड़ी और छाया देने वाले वृक्ष मृत्यु के बाद भी अंतिम संस्कार तक साथ निभाते हैं। ऐसे सच्चे साथी का सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
प्रकृति से दूरी बढ़ने का परिणाम भुगत रहा है मानव
डॉ. गोस्वामी ने चिंता जताते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य ने प्रकृति से अपना संबंध कमजोर कर लिया है। अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का असर अब जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जल संकट और प्रदूषण के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने कहा कि प्रकृति किसी से प्रतिशोध नहीं लेती, लेकिन उसके नियमों की अनदेखी का परिणाम मनुष्य को स्वयं भुगतना पड़ता है।
वृक्ष सिखाते हैं निस्वार्थ सेवा का संदेश
डॉ. गोस्वामी के अनुसार प्रकृति का प्रत्येक तत्व केवल देना जानता है। सूर्य प्रकाश देता है, नदियां जल देती हैं, बादल वर्षा करते हैं और वृक्ष जीवन देते हैं। यही संदेश मनुष्य को भी अपनाना चाहिए कि जीवन की सार्थकता केवल लेने में नहीं, बल्कि देने में है।
एक पौधा लगाना भी है बड़ी पूजा
उन्होंने कहा कि मंदिर में पूजा करना और दीप जलाना निश्चित रूप से आस्था का प्रतीक है, लेकिन किसी पौधे को लगाकर उसकी देखभाल करना भी उतना ही बड़ा धार्मिक कार्य है। यदि हर परिवार हर वर्ष एक वृक्ष लगाकर उसे परिवार के सदस्य की तरह संरक्षित करे, तो आने वाले वर्षों में देश फिर से हराभरा बन सकता है।
समाज को दिया सामूहिक संकल्प का संदेश
डॉ. गोस्वामी ने लोगों से अपील की कि जन्मदिन, विवाह, पुण्यतिथि और अन्य शुभ अवसरों पर वृक्षारोपण को परंपरा बनाया जाए। साथ ही बच्चों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना विकसित की जाए। उन्होंने कहा कि पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना, जल संरक्षण करना, मिट्टी का सम्मान करना और वृक्षों की रक्षा करना ही सच्ची ईश्वर भक्ति है।
वृक्षों की रक्षा ही भविष्य की सुरक्षा
अपने संदेश के अंत में डॉ. गोस्वामी ने कहा कि जब तक पृथ्वी पर वृक्ष सुरक्षित हैं, तब तक जीवन, मानवता और प्रकृति का संतुलन बना रहेगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह नैतिक दायित्व है कि वह वृक्षों से प्रेम करे, उनका संरक्षण करे और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली की अमूल्य विरासत छोड़े। क्योंकि वृक्षों से प्रेम करना ही वास्तव में परमात्मा से प्रेम करना है।






