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अमृत उजाला > अन्य खबरें > अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस! हां, मैं मजदूर हूं!
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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस! हां, मैं मजदूर हूं!

amritujala
Last updated: May 1, 2026 12:00 pm
amritujala 3 months पहले
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अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस
हाँ मैं मजदूर हूँ।

मजदूर की अत्याधुनिक व्याख्या: आधुनिक भारत की कड़वी सच्चाई

1. परिभाषा बदल गई, पीड़ा वही रही

पहले मजदूर का मतलब था फावड़ा-कुदाल वाला इंसान। धोती, गमछा, माथे पर पसीना। आज मजदूर की शक्ल बदल गई है।

आज मजदूर हेलमेट पहनकर 45वीं मंजिल पर काँच पोंछता है। ब्लू कॉलर शर्ट में AC सर्विस करता है। नीली-काली यूनिफॉर्म में Swiggy-Zomato का बैग पीठ पर लादकर 14 घंटे सड़क नापता है। सिक्योरिटी गार्ड की ड्रेस में 12 घंटे खड़ा रहता है। कॉल सेंटर में रात-रात भर “Yes Sir, No Sir” करता है।

नाम बदल गए: गिग वर्कर, डिलीवरी पार्टनर, सिक्योरिटी एग्जीक्यूटिव, फैसिलिटी स्टाफ। लेकिन हकीकत? वो ही 18वीं सदी वाली। मालिक बदल गए, ऐप आ गए, पर मजदूरी का मूल स्वभाव नहीं बदला – समय बेचो, शरीर घिसो, महीने के अंत में उतना ही पाओ कि अगले महीने फिर शरीर घिस सको।

2. डिजिटल मजदूर: नए जमाने की बेगारी

आधुनिक भारत ने मजदूर को सबसे बड़ा धोखा “सम्मानजनक शब्दों” से दिया है।

जिसे हम “पार्टनर” कहते हैं, उसे PF नहीं मिलता। जिसे “फ्रीलांसर” कहते हैं, उसे छुट्टी लेने पर भूखा सोना पड़ता है। जिसे “एग्जीक्यूटिव” कहते हैं, उसकी सैलरी 12 हजार है और टारगेट पूरा न हो तो गाली भी वही खाता है।

ऐप बेस्ड कंपनियों ने कमाल किया। पहले ठेकेदार होता था गाँव का दबंग। अब ठेकेदार है एक एल्गोरिद्म। जो देखता तक नहीं कि बारिश है या 48 डिग्री तापमान। रेटिंग गिरी नहीं कि ID ब्लॉक। ID ब्लॉक मतलब चूल्हा बंद। न कोई नोटिस, न कोई सुनवाई।

ये 21वीं सदी की नील की खेती है। फर्क सिर्फ इतना कि नील के खेत की जगह अब पूरा शहर खेत है और हम सब मजबूर किसान।

3. बिल्डिंगें ऊँची, मजदूर की औकात नीची

मुंबई में समंदर किनारे जो चमचमाते टावर खड़े हैं, उन्हें बनाने वाला मजदूर उसी टावर के बेसमेंट में टीन की चादर के नीचे परिवार पालता है।

गुड़गांव के मॉल में 5000 की कॉफी पीने वाले को सर्व करने वाला लड़का 8×8 के कमरे में 6 लोगों के साथ रहता है। नोएडा की IT कंपनियों को चमकाने वाला हाउसकीपिंग स्टाफ खुद अंधेरी बस्ती से आता है जहाँ दिन में 2 घंटे बिजली आती है।

विकास की हर ईंट पर किसी मजदूर का नाम होना चाहिए था। पर नाम है बिल्डर का, नेता का, सेलेब्रिटी का। मजदूर? वो तो “प्रोजेक्ट कॉस्ट” में एक लाइन आइटम है – “Labour Charges”।

4. कानून किताबों में, शोषण सड़कों पर

भारत में मजदूरों के लिए कानूनों की लाइब्रेरी है। मिनिमम वेज एक्ट, फैक्ट्री एक्ट, सोशल सिक्योरिटी कोड। कागज पर सब चकाचक।

जमीन पर? 2026 में भी देश के 93% मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं। न ESI, न PF, न पेंशन, न ग्रेच्युटी। मालिक की मर्जी से काम, मालिक की मर्जी से छुट्टी, मालिक की मर्जी से सैलरी।

ठेकेदारी प्रथा ने तो कमाल ही कर दिया। कंपनी कहती है “ये हमारा कर्मचारी नहीं, ठेकेदार का है”। ठेकेदार कहता है “साहब काम कम है”। और मजदूर? वो दोनों के बीच फुटबॉल बना रहता है।

8 घंटे काम का अधिकार 1886 में शिकागो में माँगा गया था। 140 साल बाद भी भारत के सिक्योरिटी गार्ड, ड्राइवर, डिलीवरी बॉय 12-16 घंटे ड्यूटी करते हैं। ओवरटाइम? वो क्या होता है भैया?

5. पलायन: गाँव से शहर, शहर से गटर तक

UP-बिहार-झारखंड-ओडिशा के गाँव खाली हो रहे हैं। क्यों? क्योंकि मनरेगा में 100 दिन का काम और 250 रुपये दिहाड़ी से पेट नहीं भरता।

शहर आता है मजदूर। सपने लेकर आता है। मिलता क्या है? फुटपाथ, झुग्गी, या लेबर कैंप। 3000 रुपये महीने का एक कमरा जहाँ न रोशनी, न हवा, न प्राइवेसी।

कोविड में हमने देख लिया। जिस दिन लॉकडाउन लगा, करोड़ों “राष्ट्र निर्माता” पैदल चल पड़े। क्योंकि शहर की चमक-धमक में उनके लिए जगह थी ही नहीं। न घर, न राशन, न इज्जत।

4 साल बीत गए। क्या बदला? स्टेशन पर भीड़ वही है। ठेकेदार का रेट वही है। बस अब उनके हाथ में स्मार्टफोन आ गया है – ताकि गरीबी की रील बना सकें।

6. औरत मजदूर: दोहरी गुलामी

पुरुष मजदूर की व्यथा एक है, स्त्री मजदूर की दो।

घरेलू कामगार बनी महिला सुबह 6 बजे 4 घर में झाड़ू-पोंछा करती है। 7000 रुपये महीने के लिए। न साप्ताहिक छुट्टी, न बीमारी में सहारा। होली-दिवाली पर बोनस माँगा तो जवाब मिलता है – “काम नहीं करना तो मत करो, लाइन लगी है”।

कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंट ढोने वाली औरत को मर्द से 50 रुपये कम मिलते हैं। क्यों? “तुम तो हल्का काम करती हो”। जबकि उसके सिर पर ईंट भी है और गोद में बच्चा भी।

गारमेंट फैक्ट्री में 9 घंटे सुई चलाने वाली लड़की को टॉयलेट जाने के लिए भी परमिशन चाहिए। प्रेग्नेंट हुई नहीं कि निकाल बाहर।

ये है “नारी सशक्तिकरण” का ग्राउंड रियलिटी वर्जन।

7. पढ़ा-लिखा मजदूर: डिग्री वाला बेरोजगार

सबसे बड़ा मजाक तो अब ये है कि BA, MA, BTech करके भी लड़के डिलीवरी बॉय बन रहे हैं।

क्यों? क्योंकि फैक्ट्री बंद हो रही हैं, सरकारी नौकरी 1 लाख पद के लिए 2 करोड़ फॉर्म। और प्राइवेट में 10-15 हजार की नौकरी वो भी 3 साल का बॉन्ड साइन करके।

तो बेहतर क्या? कम से कम डिलीवरी में “अपना बॉस खुद” वाली फीलिंग तो आती है। भले ही बॉस एक ऐप हो जो हर मिनट लोकेशन ट्रैक करता है।

भारत ने ग्रेजुएट मजदूर पैदा कर दिए। डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज। ये सबसे खतरनाक है – क्योंकि इन्हें पता है कि इनके साथ क्या हो रहा है।

8. तो अब क्या? कड़वी सच्चाई का अंत

मजदूर दिवस पर भाषण होंगे। नेता फावड़ा चलाते फोटो खिंचवाएँगे। 5 किलो राशन की स्कीम लॉन्च होगी।

पर सच्चाई ये है कि जब तक “सस्ता लेबर” भारत की USP रहेगा, तब तक मजदूर की किस्मत नहीं बदलेगी। हम दुनिया की फैक्ट्री बनना चाहते हैं मजदूर को गुलाम बनाकर। हम स्टार्टअप हब बनना चाहते हैं गिग वर्कर का खून चूसकर।

अत्याधुनिक मजदूर वो है जिसके पास स्मार्टफोन है पर स्मार्ट लाइफ नहीं। जिसके पास UPI है पर सेविंग नहीं। जो दिन भर दुनिया को कनेक्ट करता है पर खुद सबसे कटा हुआ है।

भारत माता की जय बोलने से पहले एक बार उस हाथ को सलाम कर लो जिसने तुम्हारा घर बनाया, तुम्हारा खाना पैक किया, तुम्हारी सड़क बुहार दी।

क्योंकि ये कड़वी सच्चाई है – इस आधुनिक भारत की नींव में सीमेंट से ज्यादा मजदूर का पसीना और खून लगा है। और हम उस नींव को ही भूल गए।

शब्द कम पड़ जाएँगे अगर हर मजदूर की कहानी लिखूँ। पर इतना काफी है कलेजा छलनी करने को। बाकी आप खुद अपनी बिल्डिंग के गार्ड से, ऑफिस के हाउसकीपिंग वाले भैया से, घर आने वाली मेड से पूछ लेना।

अगर वो सच बोल पाए तो।

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,सामाजिक कार्यकर्ता, मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर है।

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