मिडटर्म से पहले रिपब्लिकन उम्मीदवारों में बढ़ी बेचैनी; अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी चिंता
नई दिल्ली। अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता और उनकी आर्थिक नीतियां रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बनती दिख रही हैं। ताजा सर्वे में ट्रम्प के कामकाज से असंतुष्ट अमेरिकियों की संख्या 70% के आसपास है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी हार का संकेत नहीं माना जा सकता, लेकिन कई राज्यों में मौजूदा सर्वेक्षणों से पार्टी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ने के संकेत जरूर मिल रहे हैं।
एपी-एनओआरसी के 24 से 28 सितंबर के सर्वे में केवल 30% अमेरिकियों ने ट्रम्प के राष्ट्रपति के तौर पर कामकाज को मंजूरी दी। अर्थव्यवस्था संभालने के मामले में उनकी अप्रूवल रेटिंग 26% और जीवनयापन की बढ़ती लागत से निपटने के मामले में सिर्फ 17% रही। करीब 65% अमेरिकियों ने कहा कि मौजूदा महंगाई और ऊंची कीमतों के लिए ट्रम्प की नीतियां जिम्मेदार हैं। वहीं 64% लोगों का मानना है कि टैरिफ के मामले में ट्रम्प जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ गए हैं।
रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी क्यों बना रहे?
मिडटर्म चुनाव में कांग्रेस की सीटों के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवारों के सामने एक मुश्किल स्थिति है। एक ओर ट्रम्प अब भी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में हैं, दूसरी ओर अर्थव्यवस्था और महंगाई को लेकर मतदाताओं की नाराजगी उम्मीदवारों को स्थानीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए प्रेरित कर रही है।
कुछ रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने ट्रम्प और उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का उल्लेख अपने प्रचार से कम किया है। कुछ उम्मीदवार उनके साथ सार्वजनिक मंच साझा करने से भी बच रहे हैं। वहीं पार्टी के कुछ सांसदों ने ट्रम्प की विदेश और इमिग्रेशन नीतियों के कुछ पहलुओं पर असहमति जताई है।
ईरान युद्ध को लेकर भी रिपब्लिकन खेमे में मतभेद सामने आए हैं। कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने सैन्य कार्रवाई को जल्द समाप्त करने की मांग की है, जबकि अन्य सांसदों ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के पक्ष में मतदान किया है।
अर्थव्यवस्था और महंगाई बना सबसे बड़ा मुद्दा
ट्रम्प प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक मोर्चे पर दिखाई दे रही है। AP-NORC सर्वे में केवल 17% लोगों ने जीवनयापन की लागत से निपटने के ट्रम्प के तरीके को मंजूरी दी। अर्थव्यवस्था पर 26% अप्रूवल भी उनके लिए कमजोर आंकड़ा है। सर्वे में बड़ी संख्या में अमेरिकियों ने महंगाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को अपनी आर्थिक चिंता बताया।
अलग-अलग सर्वेक्षणों में भी अर्थव्यवस्था को लेकर मतदाताओं की चिंता सामने आई है। सितंबर में अमेरिकी उपभोक्ता विश्वास 2014 के बाद के सबसे निचले स्तरों में पहुंच गया।
ओहायो में विवेक रामास्वामी के सामने चुनौती
ट्रम्प के मजबूत समर्थन वाले ओहायो में रिपब्लिकन गवर्नर उम्मीदवार विवेक रामास्वामी के लिए भी मुकाबला आसान नहीं दिख रहा। 24 से 27 सितंबर के Marist Poll में डेमोक्रेट एमी एक्टन 50% समर्थन के साथ रामास्वामी से छह अंक आगे थीं। रामास्वामी को 44% समर्थन मिला।
इसी सर्वे में ओहायो के 42% मतदाताओं ने ट्रम्प के कामकाज को मंजूरी दी, जबकि 56% ने असहमति जताई। 41% मतदाताओं ने कहा कि कांग्रेस के चुनाव में उनका वोट मुख्य रूप से ट्रम्प के खिलाफ होगा। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह सर्वे किसी चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी नहीं करता।
कांग्रेस के चुनाव में डेमोक्रेट्स को बढ़त
राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ सर्वे डेमोक्रेट्स को बढ़त दिखा रहे हैं। सितंबर के NPR/PBS NewsHour/Marist Poll में 53% पंजीकृत मतदाताओं ने कहा कि वे अपने क्षेत्र में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को वोट देने की ओर झुकेंगे, जबकि 41% ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को चुना। इसी सर्वे में 45% मतदाताओं ने कहा कि उनका कांग्रेस वोट मुख्य रूप से ट्रम्प के खिलाफ होगा, जबकि 24% ने इसे ट्रम्प के समर्थन में वोट बताया।
हालांकि, राष्ट्रीय ‘generic ballot’ किसी खास सीट का परिणाम नहीं बताता। वास्तविक नतीजों पर उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, मतदान प्रतिशत और अलग-अलग राज्यों की चुनावी परिस्थितियां भी असर डालेंगी।
रिपब्लिकन पार्टी के सामने दोहरी चुनौती
मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनकी नीतियों पर राष्ट्रीय बहस सीधे रिपब्लिकन उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को प्रभावित कर रही है। अर्थव्यवस्था, महंगाई, टैरिफ और विदेश नीति ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मतदाताओं की राय रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल उपलब्ध सर्वेक्षण यह दिखाते हैं कि ट्रम्प को लेकर असंतोष बढ़ा है और कुछ प्रमुख चुनावी मुकाबले प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं। लेकिन नवंबर के चुनाव परिणामों के बारे में अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। मिडटर्म चुनाव में मतदाताओं का अंतिम रुख और वास्तविक मतदान ही तय करेगा कि इन सर्वे संकेतों का चुनावी असर कितना पड़ता है।





















