भारत में प्रेस की आजादी, लड़ाई अभी जारी है

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भारत में प्रेस की आजादी
लड़ाई अभी जारी है

डाक्टर दीपक गोस्वामी
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।

भारत में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के तहत संरक्षित है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा है। कागज पर यह आजादी पूर्ण दिखती है क्योंकि कोई सीधी सेंसरशिप नहीं है। मगर जमीनी हकीकत कड़वी है और कागज से बहुत दूर है।

पिछले एक दशक के आंकड़े देखें तो तस्वीर साफ होती है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2024 में भारत 180 देशों में 159वें स्थान पर था। 2014 में यह 140वें पर था। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि भारत में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, पुलिस की कार्रवाई और राजनैतिक दबाव लगातार बढ़ा है। 2014 से 2023 के बीच 100 से ज्यादा पत्रकारों की हत्या, हमला या गिरफ्तारी के मामले दर्ज हुए। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर जैसे राज्यों से सबसे ज्यादा घटनाएं सामने आईं। कश्मीर में 2019 के बाद कई पत्रकारों पर UAPA और PSA लगाए गए। फहद शाह, सज्जाद गुल, आसिफ सुल्तान महीनों जेल में रहे। उनकी रिपोर्टिंग ही उनका जुर्म बन गई।

कानूनी हथियार अब नया सेंसर बन गए हैं। मानहानि, राजद्रोह, UAPA, IT एक्ट की धारा 66A जो रद्द हो चुकी है, फिर भी पुलिस इस्तेमाल करती है। ED और IT के छापे भी प्रेशर टूल हैं। न्यूज़क्लिक के दफ्तर और पत्रकारों के घर पर 2023 में छापे पड़े। बीबीसी के दिल्ली-मुंबई दफ्तरों पर 2023 में IT सर्वे हुआ। वह भी तब जब बीबीसी ने गुजरात दंगों पर डॉक्यूमेंट्री रिलीज की थी। सरकार का तर्क टैक्स अनियमितता था, पर टाइमिंग ने पूरी दुनिया में सवाल खड़े किए।

डिजिटल मीडिया पर लगाम कसने के लिए 2021 में IT Rules लाए गए। इन नियमों के तहत सरकार फैक्ट-चेक यूनिट बनाकर किसी भी खबर को “फेक” घोषित कर सकती है। एडिटर्स गिल्ड और इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन इसे सुप्रीम कोर्ट ले गए। कोर्ट ने फिलहाल उस प्रावधान पर रोक लगाई है। पर नियम अभी जिंदा हैं। इसके अलावा धारा 69A के तहत हजारों वेबसाइट, ट्विटर अकाउंट, यूट्यूब चैनल ब्लॉक किए जाते हैं। अक्सर बिना सुनवाई और बिना सार्वजनिक कारण बताए।

जमीनी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की आर्थिक कमर भी तोड़ी जाती है। छोटे अखबारों और वेब पोर्टलों को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है अगर वे सत्ता के खिलाफ लिखते हैं। DAVP की नीति बदलकर विज्ञापन को हथियार बना दिया गया है। बड़े मीडिया घराने कॉर्पोरेट के हैं। रिलायंस के पास Network18, अडानी के पास NDTV का बड़ा हिस्सा, ज़ी-ABP जैसे चैनल भी सियासी पहुंच वाले लोगों के हैं। जब मालिक का धंधा सरकार की नीतियों पर टिका हो तो संपादकीय आजादी अपने आप सिकुड़ जाती है। नतीजा है गोदी मीडिया शब्द का चलन। प्राइम टाइम डिबेट में सवाल सत्ता से नहीं, विपक्ष से पूछे जाते हैं।

जिला और कस्बा स्तर पर हालात और खतरनाक हैं। स्थानीय खनन माफिया, शराब ठेकेदार, विधायक के गुर्गे सीधे धमकी देते हैं। 2021 में यूपी के गाजीपुर में पत्रकार रमेश को जिंदा जला दिया गया। 2022 में मध्य प्रदेश में सुरेश को रेत माफिया ने ट्रैक्टर से कुचल दिया। ज्यादातर मामलों में पुलिस FIR तक दर्ज नहीं करती। करती है तो कमजोर धाराओं में। गवाह मुकर जाते हैं। पत्रकार का परिवार मुआवजे के लिए भटकता रहता है।

महिला पत्रकारों के लिए खतरा दोगुना है। ऑनलाइन ट्रोलिंग, रेप की धमकी, फोटो मॉर्फ करके वायरल करना रोज की बात है। राणा अय्यूब, बरखा दत्त, स्वाति चतुर्वेदी को संगठित नफरत का सामना करना पड़ा। रिपोर्टिंग के दौरान छेड़छाड़ और भीड़ द्वारा घेरने की घटनाएं बढ़ी हैं। न्यूजरूम में भी हालात अच्छे नहीं। इंटरनल कंप्लेंट कमेटी कागजों पर हैं, पर डर से शिकायत कम दर्ज होती है।

कश्मीर और पूर्वोत्तर में प्रेस की हालत सबसे खराब है। कश्मीर में 2019 के बाद इंटरनेट शटडाउन सबसे लंबा चला। अखबार छपे पर बंटे नहीं। पत्रकारों के प्रेस कार्ड रिन्यू नहीं हुए। विदेशी पत्रकारों को परमिट देना बंद कर दिया गया। मणिपुर हिंसा 2023 में रिपोर्टिंग करने गए कई पत्रकारों को मॉब ने रोका, कैमरे तोड़े। लोकल पत्रकारों पर दोनों तरफ से दबाव था कि वही लिखो जो हमारा नैरेटिव हो।

फिर भी यह पूरी सच्चाई नहीं है। दबाव के बीच डिजिटल मीडिया ने नई जगह बनाई है। द वायर, स्क्रॉल, न्यूज़लॉन्ड्री, द न्यूज मिनट, कारवां जैसी संस्थाएं खोजी पत्रकारिता कर रही हैं। रवीश कुमार का यूट्यूब चैनल, अजीत अंजुम, पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे पत्रकारों ने अपना प्लेटफॉर्म खड़ा किया। इनकी रीच अब कई टीवी चैनलों से ज्यादा है। जनता चंदा देकर इन्हें जिंदा रख रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जुबैर, मोहम्मद जुबैर, सिद्धीक कप्पन जैसे मामलों में जमानत देकर निचली अदालतों को भी संदेश दिया है कि पत्रकारिता जुर्म नहीं है।

पर समस्या यह है कि अपवाद नियम नहीं बनते। बड़े मीडिया हाउस में नौकरी का डर, तबादले का डर, प्रमोशन रुकने का डर हर रिपोर्टर के सिर पर लटका है। बीट रिपोर्टर को पता है कि फलां मंत्री या अफसर के खिलाफ स्टोरी करने पर ब्यूरो चीफ फोन करके रोकेगा। सेल्फ-सेंसरशिप अब सबसे बड़ा सेंसर है। एडिटर तय करता है कि कौन सी खबर फ्रंट पेज पर जाएगी और कौन सी सिंगल कॉलम में अंदर मरेगी। मालिक तय करता है कि एडिटर कौन रहेगा।

पाठक की भूमिका भी कमजोर हुई है। टीआरपी और क्लिक की दौड़ ने खबर को प्रोडक्ट बना दिया है। धर्म, पाकिस्तान, सेलिब्रिटी, क्राइम की खबरें चलती हैं क्योंकि लोग वही देखना चाहते हैं। नीति, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य पर ग्राउंड रिपोर्ट को व्यूज नहीं मिलते। जब मांग ही नहीं तो सप्लाई क्यों होगी। इस तरह सर्कस पूरा होता है। सत्ता दबाव डालती है, मालिक झुकता है, एडिटर समझौता करता है, रिपोर्टर चुप रहता है, पाठक ताली बजाता है।

कानून का डर भी एकतरफा है। 2023 में नया भारतीय न्याय संहिता आया। इसमें राजद्रोह की जगह देशद्रोह शब्द आया पर प्रावधान और सख्त हैं। गलत या फेक न्यूज फैलाने पर 3 साल तक सजा है। पर “गलत” कौन तय करेगा, यह साफ नहीं। पुलिस के पास अब और ताकत है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक दंतहीन संस्था है। उसके पास सजा देने का अधिकार नहीं। शिकायत पर सिर्फ चेतावनी दे सकती है। न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी भी सेल्फ-रेगुलेशन बॉडी है। चैनल खुद ही मेंबर हैं, खुद ही जज।

अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बेअसर दिखता है। अमेरिकी विदेश विभाग की ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट, एमनेस्टी, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स हर साल भारत की आलोचना करते हैं। भारत सरकार उसे “पश्चिमी पूर्वाग्रह” कहकर खारिज कर देती है। चीन, रूस, तुर्की का हवाला देकर कहा जाता है कि हम उनसे बेहतर हैं। पर लोकतंत्र की तुलना तानाशाही से नहीं, अपने ही संविधान से होनी चाहिए।

तो क्या रास्ता है। पहला, पत्रकारों की एकजुटता। जब जुबैर गिरफ्तार हुए तो देशभर के पत्रकार सड़क पर आए थे। ऐसा हर बार हो। दूसरा, जनता का सीधा फंडिंग मॉडल। अगर 10 लाख लोग 100 रुपये महीना दें तो कोई भी संस्थान सरकार या कॉर्पोरेट का मोहताज नहीं रहेगा। तीसरा, अदालतों का सक्रिय होना। जमानत नियम है, जेल अपवाद है, यह सिद्धांत पत्रकारों पर भी लागू हो। चौथा, मीडिया शिक्षा। स्कूल-कॉलेज में न्यूज लिटरेसी पढ़ाई जाए ताकि पाठक प्रोपेगेंडा और खबर में फर्क कर सके।

भारत में प्रेस पूरी तरह गुलाम नहीं है, पर पूरी तरह आजाद भी नहीं है। वह एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां एक रास्ता सत्ता की गोद में जाता है और दूसरा जेल की सलाखों तक। बीच का रास्ता पतला है, कांटों भरा है, पर उसी पर चलने वाले कुछ पत्रकार अभी भी लोकतंत्र को जिंदा रखे हुए हैं। उनकी कलम तोड़ने की कोशिश रोज होती है, पर जब तक एक भी रिपोर्टर सवाल पूछने की जिद रखता है, तब तक उम्मीद बाकी है। यह उम्मीद ही प्रेस की असली ताकत है और इसी ताकत से डरकर उसे कमजोर करने की साजिशें रची जाती हैं। जमीन की सच्चाई यही है कि आजादी छीनने वाले जितने ताकतवर हैं, उसे बचाने वाले उतने ही जिद्दी। लड़ाई बराबर की है, और लंबी भी।

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